अजित द्विवेदी All Article

विपक्ष को बदलना होगा विमर्श!

भाजपा विरोधी पार्टियों में एकजुट होने की होड़ मची है। सभी विपक्षी पार्टियां एकजुटता यानी महागठबंधन को रामबाण औषधि मान रही हैं। सबको लग रहा है कि अगर एकजुट हो गए तो भाजपा को रोका जा सकता है, जैसा कि बिहार में रोका गया था। लेकिन हैरानी की बात है कि कोई भी पार्टी यह नहीं देख रही है कि बिना एकजुटता के ही दिल्ली में भाजपा को आम आदमी पार्टी ने तीन सीटों पर और पढ़ें....

भगवान भरोसे नहीं छोड़ सकते कश्मीर!

जम्मू कश्मीर के हालात बेकाबू हो रहे हैं। मुश्किलों के कई स्तर बन गए हैं और समाधान की पहल किसी स्तर पर होती नहीं दिख रही है। तीन साल पहले जिस उम्मीद के साथ जम्मू कश्मीर में पीडीपी और भाजपा की सरकार बनी थी, वह उम्मीद धीरे धीरे खत्म हो रही है। ऐसा लग रहा था कि घाटी के लोगों की बात करने वाली और काफी हद तक अलगाववादियों की पसंद वाली पार्टी पीडीपी के और पढ़ें....

सरकार से ज्यादा पार्टी की उपलब्धि!

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के तीन साल पूरे होने जा रहे हैं। 26 मई को सरकार तीन साल पूरे करेगी। सरकार और पार्टी दोनों स्तरों पर तीन साल का जश्न मनाने की तैयारी चल रही है। जवाबदेही के साथ जश्न मनाया जाएगा। सरकार के खाते में भी कुछ उपलब्धियां हैं। काफी अरसे से लंबित वस्तु व सेवा कर, जीएसटी कानून अब अमल में आने वाला है। सरकार ने इसे संसद के दोनों सदनों से और पढ़ें....

भाजपा की विस्तार रणनीति का आधार!

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने पार्टी की विस्तार यात्रा पर निकले हैं। वे कश्मीर से कन्याकुमारी तक यात्रा करेंगे। केंद्र में और 13 राज्यों में सरकार होने के बाद आराम से बैठने की बजाय अमित शाह अगर नए राज्यों में पार्टी का आधार मजबूत करने निकले हैं तो राजनीति के प्रति उनकी गंभीरता और समर्पण को समझा जा सकता है। वे पश्चिम बंगाल गए और ममता बनर्जी के क्षेत्र में जाकर और पढ़ें....

सरकार के प्रतीकात्मक कदम, कई खतरे!

राजनीति में प्रतीकों का इस्तेमाल एक कला है। जो पार्टी या नेता किसी प्रतीक के जरिए ज्यादा से ज्यादा मतदाताओं को अपना मैसेज पहुंच पाए, वह सफल होता है। लेकिन अगर सरकारें प्रतीकात्मक कदम उठाने लगें तो यह एक खतरनाक प्रवृति की ओर इशारा होता है। सरकार को अपना काम समग्रता में करना चाहि। उसकी नीतियां समस्या के हर पहलू को ध्यान में रख कर बनाई जानी चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि सरकार किसी और पढ़ें....

मजबूरी में बनेगी विपक्षी एकता !

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उत्तर प्रदेश के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों- अखिलेश यादव व मायावती ने विपक्ष के जिस महागठबंधन का आह्वान किया है, उसकी राह की मुश्किलों का अंदाजा उन्हें भी होगा। आजाद भारत के राजनीतिक इतिहास में विपक्षी पार्टियों की बिना शर्त एकजुटता की बहुत कम मिसालें हैं। यह एकदम आपात स्थितियों में हुआ है। आपातकाल के बाद 1977 में ऐसा हुआ था, जिसके बारे में अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था और पढ़ें....

योगी का लक्ष्य क्या?

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ और उनकी सरकार किस लक्ष्य की ओर बढ़ रही है? योगी सरकार के फैसले और मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी छवि को चमकाने वाली निजी राजनीति को देखते हुए यह सवाल बेहद प्रासंगिक है। यह बहुत बारीकी से देखने की बात है कि योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बनने के बाद राजकाज में इतने मगन नहीं हुए हैं कि राजनीति को छोड़ दें। वे सरकारी कामकाज और राजनीति दोनों एक साथ कर और पढ़ें....

आधार की अनिवार्यता, निजता के सवाल!

भारत में एक अरब से ज्यादा लोगों को यूनिक आईडी ऑथोरिटी की ओर से आधार कार्ड उपलब्ध कराए जा चुके हैं। यह किसी भी सरकार के लिए गर्व का विषय हो सकता है। भारत जैसे देश में हर नागरिक को पहचान का एक अलग और अनोखा नंबर देना एक बेहद महत्वाकांक्षी अभियान था, जिसे बहुत सहजता से भारत में पूरा किया जा रहा है। अब तो जन्म लेते हुए बच्चे को आधार नंबर देने का और पढ़ें....

राष्ट्रपति चुनाव से सधेगी राजनीति!

भारतीय जनता पार्टी के अंदर और देश की आगे की राजनीति के समीकरण ठीक करने का एक मौका राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति पद का चुनाव भी है। इससे पहले भी पार्टियां इन पदों पर उतारे जाने वाले उम्मीदवारों के जरिए राजनीति को साधने का प्रयास करती थीं। लेकिन आमतौर पर उन चुनावों में अपना उम्मीदवार जिताने की मजबूरी के तहत भी उम्मीदावार तय किए जाते थे। मिसाल के तौर पर कांग्रेस ने प्रतिभा पाटिल को और पढ़ें....

गठबंधन का वैचारिक आधार क्या?

क्या भारत फिर गठबंधन की राजनीति के उस दौर में जा रहा है, जिसकी शुरुआत 1989 में हुई थी? 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति की लहर में कांग्रेस पार्टी 415 सीट जीत गई थी। तब किसी ने नहीं सोचा था कि पूर्ण बहुमत की सरकार देने वाला यह आखिरी चुनाव होगा। इसके बाद तीन दशक तक किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला। इसके बाद लोकसभा के सात चुनावों में और पढ़ें....

अजित द्विवेदी

अजित द्विवेदी

ajit@nayaindia.com

Ajeet Dwivedi is the Editor(News) of NAYA INDIA and brings over 16 years of experience as a reporter and editor. Ajeet started his journalistic career as a reporter at Jansatta in 1996. In 1997, he joined Samvad Parikrama- News and Feature Agency serving as the reporter for the agency’s various publications. In 2000 he started working as News Coordinator and content developer for Netcom India Pvt Ltd. From 2003 to 2007, he was associated with Dainik Bhashkar has as an Assistant Editor, where apart from the opinion page he was also in charge of planning special features and stories for Bhashkar’s Sunday review page. After a successful stint in the print industry, in 2007, he took the leap and ventured into electronic media and joined India News. There he was not only an Executive Editor but was also part of the core team instrumental in establishing the channel. In 2010, Ajeet came onboard NAYA INDIA as Editor. He helps oversee NAYA INDIA’s editorial content and writes weekly columns on contemporary issues which stare India in the face.

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