अजित द्विवेदी All Article

राष्ट्रपति चुनाव से सधेगी राजनीति!

भारतीय जनता पार्टी के अंदर और देश की आगे की राजनीति के समीकरण ठीक करने का एक मौका राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति पद का चुनाव भी है। इससे पहले भी पार्टियां इन पदों पर उतारे जाने वाले उम्मीदवारों के जरिए राजनीति को साधने का प्रयास करती थीं। लेकिन आमतौर पर उन चुनावों में अपना उम्मीदवार जिताने की मजबूरी के तहत भी उम्मीदावार तय किए जाते थे। मिसाल के तौर पर कांग्रेस ने प्रतिभा पाटिल को और पढ़ें....

गठबंधन का वैचारिक आधार क्या?

क्या भारत फिर गठबंधन की राजनीति के उस दौर में जा रहा है, जिसकी शुरुआत 1989 में हुई थी? 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति की लहर में कांग्रेस पार्टी 415 सीट जीत गई थी। तब किसी ने नहीं सोचा था कि पूर्ण बहुमत की सरकार देने वाला यह आखिरी चुनाव होगा। इसके बाद तीन दशक तक किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला। इसके बाद लोकसभा के सात चुनावों में और पढ़ें....

हर विचारधारा के अकेले प्रतिनिधि मोदी!

भारत में आजादी के बाद से बुनियादी रूप से तीन राजनीतिक विचारधारा काम करती रही है। कांग्रेस पार्टी आजादी की लड़ाई की विरासत और राष्ट्रवाद की प्रतिनिधि पार्टी थी। इसके साथ जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी ने अपने समय में अपने अपने हिसाब का समाजवाद मिलाया हुआ था। बाद में पीवी नरसिंह राव और मनमोहन सिंह ने राष्ट्रवाद की उस विरासत में उदार आर्थिक नीतियों को शामिल किया। हालांकि समाजवाद की एक अंतर्धारा हमेशा कांग्रेस और पढ़ें....

इस जीत के मायने गहरे

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की जीत को किसी एक और राज्य की जीत मान कर विश्लेषण नहीं किया जा सकता है। उत्तर प्रदेश भारत का सिर्फ कोई एक राज्य नहीं है और वहां का चुनाव किसी एक राज्य के चुनाव की तरह नहीं लड़ा गया था। यह देश की राजनीति पर संभवतः सबसे ज्यादा असर डालने वाला विधानसभा चुनाव था। तभी इसकी भारी भरकम जीत के बाद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और पढ़ें....

एक्जिट पोल में फिर जीती भाजपा!

भारतीय जनता पार्टी एक्जिट पोल में एक बार फिर जीत गई है। पिछले करीब 15 साल से यानी जब से चुनाव पूर्व सर्वेक्षण और एक्जिट पोल का जोर बढ़ा है, तब से लगभग हर चुनाव में भाजपा एक्जिट पोल में जरूर जीतती है। बहुत कम ऐसे मौके आए हैं, जब भाजपा को एक्जिट पोल नतीजों में हारते हुए दिखाया गया हो। एक्जिट पोल से जुड़ी एक और खास बात यह है कि जहां भी मुकाबला क्षेत्रीय और पढ़ें....

बदल क्यों जाती अभिव्यक्ति की बहस?

दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में बोलने की आजादी के पक्ष और विपक्ष की जो बहस पिछले महीने शुरू हुई, वह अभिव्यक्ति की आजादी से शुरू होकर राष्ट्रवाद के रास्ते से होते हुए स्त्री विमर्श पर पहुंच गई है। इससे पहले जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में भी जो बहस देश की एकता और अखंडता को दी गई चुनौती से शुरू हुई थी, वह भी राष्ट्रवाद और देशद्रोह की बहस में तब्दील हो गई और अंततः और पढ़ें....

कांग्रेस को कौन अपने गले बांधेगा!

हर चुनाव को देश की राजनीति या किसी खास पार्टी या सरकार के लिए बेहद अहम बताने का एक राजनीतिक चलन है। यह एक राजनीतिक जुमला है कि अमुक चुनाव अमुक पार्टी के लिए या नेता के लिए बेहद अहम है। लेकिन कई चुनाव सचमुच अहम होते हैं। जैसे अभी पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं। ये चुनाव कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए बेहद अहम हैं। खास कर कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी और पढ़ें....

कांग्रेस को चमत्कार ही बचा सकता!

कांग्रेस पार्टी जिस नई राजनीति को गले लगा रही है, क्या वह उसके बचने का एकमात्र रास्ता है? ऐसा कई राजनीतिक जानकार भी मान रहे हैं और कांग्रेस के नेता तो खैर यह मान कर बैठे हैं कि भारतीय जनता पार्टी और उसमें भी नरेंद्र मोदी को रोकने का एकमात्र रामबाण नुस्खा गठबंधन है। इस नुस्खे से कांग्रेस ने बिहार में भाजपा को रोक दिया था और अब उत्तर प्रदेश में इस नुस्खे की परीक्षा और पढ़ें....

नोटबंदी को लेकर भरोसे में सरकार!

केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी दोनों नोटबंदी को लेकर बड़े भरोसे में हैं। आठ नवंबर को पांच सौ और एक हजार रुपए के नोट बंद करने के बाद हुए उपचुनावों और अलग अलग राज्यों में हुए शहरी व स्थानीय निकाय चुनावों में मिली जीत ने भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भरोसा बढ़ाया है। हालांकि उसकी असली परीक्षा पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में होनी है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने जिस अंदाज में नोटबंदी और पढ़ें....

चुनाव आयोग की निरीहता!

भारतीय चुनाव आयोग की कमजोरी और निरीहता वैसे तो हर चुनाव में किसी न किसी रूप में जाहिर होती रहती है, लेकिन इस बार यह कमजोरी ज्यादा खुल कर दिखी है। आयोग के निष्पक्ष होने या स्वतंत्र चुनाव कराने की उसकी क्षमता पर कई गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। साथ ही यह भी पता चला है कि सरकारें या पार्टियों के नेता या चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार उसकी कितनी कम परवाह करते हैं। आमतौर पर चुनाव और पढ़ें....

अजित द्विवेदी

अजित द्विवेदी

ajit@nayaindia.com

Ajeet Dwivedi is the Editor(News) of NAYA INDIA and brings over 16 years of experience as a reporter and editor. Ajeet started his journalistic career as a reporter at Jansatta in 1996. In 1997, he joined Samvad Parikrama- News and Feature Agency serving as the reporter for the agency’s various publications. In 2000 he started working as News Coordinator and content developer for Netcom India Pvt Ltd. From 2003 to 2007, he was associated with Dainik Bhashkar has as an Assistant Editor, where apart from the opinion page he was also in charge of planning special features and stories for Bhashkar’s Sunday review page. After a successful stint in the print industry, in 2007, he took the leap and ventured into electronic media and joined India News. There he was not only an Executive Editor but was also part of the core team instrumental in establishing the channel. In 2010, Ajeet came onboard NAYA INDIA as Editor. He helps oversee NAYA INDIA’s editorial content and writes weekly columns on contemporary issues which stare India in the face.

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