सत्येन्द्र रंजन All Article

साफ-सुथरे चुनाव की चुनौती

चुनाव सुधार पुराना विषय है, लेकिन हाल के विधानसभा चुनावों के बाद इससे जुड़े कई नए सवाल उठे हैं। इस पर बीते 22 मार्च को राज्य सभा में विस्तृत बहस हुई। चुनाव किसी प्रातिनिधिक लोकतंत्र (representative democracy) का सर्व-प्रमुख पहलू है। प्रातिनिधिक लोकतंत्र में शासन निर्वाचित प्रतिनिधि चलाते हैं। उन्हें वैधता (legitimacy) इसी बात से प्राप्त होती है कि मतदाताओं के बहुमत या सर्वाधिक मतदाताओं ने उन्हें चुना है। जो लोग निर्वाचित प्रतिनिधि की विचारधारा और पढ़ें....

संवैधानिक गणतंत्र के गिने-चुने दिन?

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का नतीजा आते ही जम्मू-कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस के प्रमुख उमर अब्दुल्ला ने ट्विट किया कि विपक्ष को अब 2019 को भूल कर 2024 की तैयारी करनी चाहिए। उनकी इस राय से इत्तेफ़ाक रखने वाले लोगों की कोई कमी नहीं होगी। इसलिए कि उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम ने देश के राजनीतिक मानस पर एक खास प्रभाव डाला है। इसके दो प्रमुख कारण हैं। पहला तो यह कि ये चुनाव नोटबंदी की और पढ़ें....

तो सिर्फ अल्पसंख्यकों पर निर्भर कांग्रेस!

गोवा का चुनाव नतीजा जानने के लिए अभी एक महीने से ज्यादा इंतजार करना होगा। लेकिन इस छोटे-से राज्य में चुनाव से पहले लोगों और पर्यवेक्षकों से मिलते-जुलते यह संकेत मिलता रहा कि वहां कांग्रेस का भविष्य अल्पसंख्यक वोटों की गोलबंदी पर निर्भर है। यह कथन आम जुबान पर था कि अगर कैथोलिक मतों का दो-तिहाई से ज्यादा हिस्सा पुरानी रवायत के मुताबिक कांग्रेस को मिला, तो 40 सदस्यीय विधानसभा में वह बहुमत पा सकती और पढ़ें....

उप्र पर सियासी कोहरा घना

हर जगह साजिश देखने की आदत से बाज आया जाए, तब भी समाजवादी पार्टी की अंदरूनी कलह को लेकर संदेहों का निवारण नहीं होता। झगड़े का कितना असली था और कितना सियासी मकसद साधने के लिए बढ़ाया गया, इस बारे में कुछ भी निश्चित रूप से कहना मुश्किल है। अखिलेश और शिवपाल यादव गुटों में जारी तनातनी के बीच उप्र के मुख्यमंत्री के संचार अभियान सलाहकार स्टीव जार्डिंग का एक ई-मेल लीक हुआ। उसमें अखिलेश और पढ़ें....

जयललिता का विराट बन जाना!

ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो जयललिता जयराम द्रविड़ राजनीति का विलोम थीं। बीसवीं सदी के आरंभ के साथ आगे बढ़े द्रविड़ आंदोलन का मूल स्वर ब्राह्मणवाद विरोधी था। इसने हिंदी विरोधी तेवर अपनाया। तमिल भाषा और संस्कृति के गौरव पर जोर दिया। ई.वी. रामास्वामी नायर पेरियार, सी.एन, अन्ना दुरै, एम करुणानिधि और एक हद तक एम.जी रामचंद्रन भी इसी सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक आंदोलन के कर्णधार थे। जबकि जयललिता ब्राह्मण थीं। उनका जन्म मैसूर (कर्नाटक) में हुआ, द्रविड़ और पढ़ें....

डोनल्ड ट्रंप पर बंटा अमेरिका

अमेरिकी आबादी के एक हिस्से के लिए डोनल्ड ट्रंप के शासनकाल में रहने को सोचना इतना भयानक है कि कैलीफोर्निया जैसे उदार राज्य में अमेरिका से अलग होने की चर्चा शुरू हो गई है। यहां ये उल्लेखनीय है कि अफ्रीकी-अमेरिकी समुदाय से आए ओबामा के राष्ट्रपति बनने तथा उदारवादी- आधुनिक मूल्यों के प्रसार के साथ कंजरवेटिव माने जाने वाले टेक्सास राज्य में भी अमेरिका से अलग होने की मांग उठी थी। अमेरिका में ऐसी मांगों और पढ़ें....

विकास कैसा, कैसी समझ?

1970 के दशक में बड़े होते हुए यह चर्चा हम अक्सर सुनते थे कि कहां “विकास” पहुंचा है और कहां नहीं। तब इसका तात्पर्य अक्सर सड़क और बिजली से होता था। अगर आसपास कोई फैक्टरी लग गई हो या रेल लाइन भी पहुंच गई हो, तो उस स्थान को और भी ज्यादा “विकसित” बताया जाता था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखें तो उस दौर में “विकास” को मापने का एकमात्र पैमाना सकल घरेलू उत्पाद की मात्रा और पढ़ें....

कश्मीरः संभव नहीं समाधान, अमन?

बुरहान वानी के मारे जाने से पहले उनके पिता मुजफ्फर वानी ने अंग्रेजी अखबार द हिंदुस्तान टाइम्स को एक इंटरव्यू दिया था। बुरहान वानी को कश्मीर में नए दौर के अलगाववाद और उग्रवाद का प्रतीक बताया गया है। उसके पिता ने बुरहान की सोच और रूझानों को पूरी स्पष्टता के साथ सामने रखा। इससे साफ है कि बुरहान वानी कट्टरपंथी इस्लाम के तहत जिहाद की जो समझ है, उससे प्रेरित था। उसके पिता के मन और पढ़ें....

गांधी के अंतर्विरोध

मोहनदास करमचंद गांधी ने दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के बाद अपनी पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ गोपालकृष्ण गोखले को भेंट की थी। गोखले ने पढ़ने के बाद इस किताब को निराशाजनक बताया। उन्होंने उम्मीद जताई कि आगे चलकर इसमें व्यक्त अपने अनेक विचारों को गांधीजी बदल लेंगे। गोखले का जोर समाज सुधार पर अधिक था। वे आधुनिकतावादी माने जाते थे। जबकि ‘हिंद स्वराज’ में गांधीजी ने आधुनिक औद्योगिक सभ्यता की हर निशानी की आलोचना की है। और पढ़ें....

वक्त राजनीतिक ध्रुवीकरण का

सोलह मई 2014 (जिस दिन सोलहवीं लोकसभा के चुनाव परिणाम घोषित हुए) के बाद भारत में सबसे प्रमुख घटनाक्रम वैचारिक ध्रुवीकरण का अधिक-से-अधिक स्पष्ट होना रहा है। पिछले 23 महीनों में अधिकांश विचारधाराएं दो धुरियों पर गोलबंद होने की तरफ बढ़ी हैं। एक धुरी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हिंदुत्ववादी अथवा हिंदू राष्ट्रवाद में यकीन करने वाली ताकतों की है। 2014 के जनादेश ने इस विचारधारा के नुमाइंदों को देश की राजसत्ता पर ला बैठाया। ऐसा और पढ़ें....

सत्येन्द्र रंजन

सत्येन्द्र रंजन

satyendra.ranjan@gmail.com

Ranjan has been a journalist for 23 years and is a Contributing Writer at Naya India. His writings focus on the analysis of the week’s most important issues, from socio-political issues, business affairs, international affairs to sports. He started his career as a Sub Editor in Jansatta, and then moved onto working with Netjaal.com, Dainik Bhashkar, and thereon at NDTV. Since 2009, Ranjan has been writing extensively for various publications usually centred around democratic struggles and social justice. He resides in Delhi and is currently a Senior Associate Fellow at the Centre for Study of Developing Societies (CSDS). He is also a regular guest lecturer at IGNOU and Jamia Milia Islamia University.

© 2016 nayaindia digital pvt.ltd.
Maintained by Netleon Technologies Pvt Ltd