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कॉमेंट्स (4)

  1. Abhijit Tiwary

    आपके कॉलम की प्रतिदिन प्रतीक्षा रहती है ! आपने जिस तरह से हमारे इतिहास , हमारी मजबूती और कमज़ोरी ,हमारी तासीर एवं हिन्दुओं की दुखती नब्ज़ को परखा,जाना-पहचाना और आलोचना की है , वैसा किसी भी दक्षिणपंथी बुद्धिजीवी ने करने की कोशिश नहीं की है ! आज सत्ता-लोलुप पत्रकार जिन पर भाजपा इठलाती है , वो कल तक मोदी और भाजपा को पानी पी-पी के कोसते थे ! ये सब बरसाती मेढक हैं जिनसे सावधान रहना चाहिए ! आपकी कॉलम ने समाज और राजनीति को देखने-समझने की एक अलग दृष्टि विकसित की है ! नया इंडिया को मैंने बुकमार्क कर रखा है और रोजाना पढता हु !
    पर आपके सेंट्रल हॉल प्रोग्राम को बहुत मिस करता हु ! आपसे अनुरोध है आप एक वीडियो चैनल भी यूट्यूब पर शरू करे जिससे आपके साक्षात् दर्शन हो और आपके तार्किक ओजपूर्ण वाणी में विश्लेषण सुनने का मौका मिले !

    Reply
  2. Anurag Bhardwaj

    दिल से बहुत बहुत बधाई!!!

    ‘कोउ नृप हो हमे का हानी’ और राजा को अवतार मानना तो अंतर्विरोध प्रतीत होता है। विकेंद्रिकीकृत व्यवस्था में गाँव को ही दुनिया बनाना भी एक विचार हो सकता है।

    Reply
  3. शंकर

    वैसे, विवेकानन्द, श्रीअरविन्द, टैगोर के लिखते-बोलते समय भी स्थिति अधिक भिन्न नहीं थी। यदि उन्हें विदेशियों ने महत्व न दिया होता, तो उनका नाम भी देशवासियों ने वैसे ही याद न रखा होता जैसे श्रद्धानन्द, अनिर्बन, निराला, अज्ञेय या राम स्वरूप जैसे अनेक मनीषियों का नहीं सुना है।
    सो, बंधुवर, आप की स्थिति उन जैसी ही है। अतः चाहें तो आप अपने आप को उसी उँची लीग में मान सकते हैं… कर्म करना ही अपने हाथ है। फल विधि हाथ। जिस तुलसीदास को आपने याद किया, उन्होंने तब के बादशाह को नाम का भी महत्व नहीं दिया, अपना काम करते रहे।
    परिणाम अनेक तत्वों के संयोग से घटित होता है। इसीलिए उस की इच्छा न रखने का कृष्णादेश है। फिर, यह तो कलियुग है।
    अंततः देश-समाज की आयु में पाँच-सात सौ साल कुछ नहीं होते। इसलिए जो तमस भारत पर सदियों से तारी है, उसे सात वर्ष में बदलते देखना चाहते हैं आप?
    मंगलकामनाएं!

    Reply

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