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शनिवार फुरसत

पटरी से तो खूब दौड़ती अपनी फिल्में!

यह अपने आप में दिलचस्प संयोग है कि 1886 में जब ल्यूमियर बंधुओं ने बंबई के वाटसन होटल में एक रुपए के टिकट पर चलती फिरती तस्वीरें दिखा कर लोगों को चमत्कृत किया, तब से ट्रेन फिल्मों का हिस्सा बनी हुई है। ल्यूमियर बंधुओं के खजाने में कुछ चलती फिरती और पढ़ें....

गीता फोगाट अपने को मानती असफल!

रियलिटी टेलीविजन शो 'खतरों के खिलाड़ी' सीजन-8 में नजर आने वाली भारतीय महिला पहलवान गीता फोगाट का कहना है कि वह स्वयं को सबसे असफल इंसान मानती हैं। राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान गीता ने यह भी कहा कि इस शो के जरिए वह और पढ़ें....

दक्षिण की फिल्में हमेशा रहीं आगे

पहली ‘बाहुबली’ के 765 दिन बाद आए उसके दूसरे भाग की बाक्स आफिस पर रिकार्ड तोड़ सफलता को लेकर तो कोई संदेह था ही नहीं। भव्यता और तकनीकी श्रेष्ठता में एक बार फिर खुद को उसने बेहतर साबित कर दिया है। खालिस रूप से हिंदी में बनने वाली फिल्मों को और पढ़ें....

पूर्वोत्तर भारत में भी कबड्डी लीग

प्रो कबड्डी लीग के पांचवें सीजन की शुरुआत होने वाली है और ऐसे में इसके आयोजकों की कोशिश देश के कोने-कोने तक इस लीग को लेकर जाने की है।  कबड्डी के आयोजकों की कोशिश विशेष रूप से पूर्वोत्तर भारत में पैर जमाने की है। आई-लीग को जीतने वाली नई टीम और पढ़ें....

बदल रही फिल्मों की पहचान

अक्षय कुमार को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने पर मचे निरर्थक बवाल को छोड़ दिया जाए तो इस बार के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों ने हिंदी फिल्मों का स्वरूप बदलने की एक तरह से पुष्टि की है। ‘पिंक’ और ‘नीरजा’ जैसी फिल्मों को अलग-अलग वर्ग में मिले पुरस्कार से साफ और पढ़ें....

हमेशा सराही गई नई कोशिश

‘शोले’ ने हिंदी फिल्मों का मिजाज और अंदाज बिगाड़ने में खासी भूमिका निभाई। नए विषय तलाशने की सिलसिला कम हो गया लेकिन उसके पहले के सालों में कई ऐसी फिल्में जिन्होंने मनोरंजन की दकियानूसी परिभाषा को बदला और दर्शकों को अलग तरह की फिल्मों से परिचित कराया। सामाजिक मुद्दों पर और पढ़ें....

फिल्मी दुनिया पर फिल्म बनाना मुश्किल

पिछले साल फिल्मी दुनिया के काले-सफेद सच को उजागर करने वाली दो फिल्में लगभग साथ-साथ आईं। एक तो महेश भट्ट फैक्टरी की राज-3 और दूसरी मधुर भंडारकर की ‘हीरोइन’। इनमें से ‘हीरोइन’ ज्यादा महत्वपूर्ण और विवादास्पद रही तो इसलिए कि संघर्ष करके चोटी पर पहुंची आम लड़की के अनुभवों के और पढ़ें....

टूटती नहीं फिल्मी भेड़चाल

पिछले कुछ सालों में हिंदी फिल्मों में एक अलग तरह का बदलाव महसूस हुआ है। पारपंरिक तौर तरीकों को त्याग कर नए विषयों को नए नजरिए से परिभाषित करने की फिल्मकारों में रूचि जागी है। लेकिन यह हो रहा है सीमित स्तर पर। ज्यादातर फिल्मों में मौलिकता की जगह नकल और पढ़ें....

यह एकादशी दिव्य फल प्रदात्री

पौराणिक मान्यतानुसार वैष्णवों के लिए प्रत्येक महीने के कृष्ण व शुक्ल में पड़ने वाली एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियाँ होती हैं, लेकिन जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर छब्बीस हो जाती है। वैष्णव इन सभी एकादशी की तिथियों में विविध और पढ़ें....

बायोपिक फिल्में, गोरखधंधा अजब!

विशाल भारद्वाज की योजना तो चालीस के दशक की स्टंट क्वीन नाडिया पर फिल्म बनाने की थी। ‘रंगून’ में नाडिया, जूलिया हो गईं। उसका अंदाज नाडिया वाला ही रहा और संदर्भ भी पुराना लेकिन विशाल भारद्वाज ने ‘रंगून’ को नाडिया के फिल्मी सफर तक केंद्रित रखने की बजाए उसे नया और पढ़ें....

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