अत्यधिक जोखिम निवारण के होंगे बुरे परिणाम: रिजर्व बैंक गवर्नर

नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर शक्तिकांत दास का मानना है कि वित्तीय संस्थाओं द्वारा अत्यधिक जोखिम निवारण के बुरे परिणाम हो सकते हैं, जबकि महामारी और लॉकडाउन के बाद अर्थव्यवस्था बदहाली के दौर से गुजर रही है। दास ने आरबीआई की हालिया वित्तीय स्थायित्व रिपोर्ट के आमुख में कहा है कि भारत का वित्तीय तंत्र मजबूत है।

उन्होंने इसमें लिखा है कि मौजूदा माहौल में मध्यवर्ती वित्तीय संस्थाओं को सक्रियता के साथ पूंजी बढ़ाने की आवश्यकता है और शीर्ष प्राथमिकता के आधार पर उनको अपने में लचीलापन लाने की जरूरत है।

उन्होंने लिखा, “बदले हालात में दूरदर्शिता के साथ जोखिम प्रबंधन की जरूरत है जबकि अत्यधिक जोखिम निवारण का सबके लिए बुरे परिणाम होंगे। आरबीआई गवर्नर का यह बयान इसलिए अहम है क्योंकि इस बात की चिंता जाहिर की गई है कि बैंक अभी तक जोखिम लेने को तैयार नहीं हैं और एमएसएमई को सॉवरेन गारंटी वाले ईसीएलजीएस कर्ज के सिवा अन्य कर्ज देने में आमतौर पर आनाकनी करते हैं।

वित्तीय स्थायित्व रिपोर्ट, जुलाई-2020 से यह भी प्रदर्शित होता है कि 2019-20 की पहली छमाही में पहले की काफी घट चुके बैंक क्रेडिट में बाद में और गिरावट आई।
रिपोर्ट के अनुसार, बैंक क्रेडिट में कमी से जोखिम निवारण का साफ संकेत मिलता है। आरबीआई गवर्नर ने यह भी कहा कि मौजूदा दौर में वित्तीय बाजार के कुछ सेगमेंट और रियल सेक्टर की गतिविधि के बीच अलगाव बढ़ता जा रहा है। उन्होंने कहा कि भारत में ऐसे समय में महामारी ने कहर बरपाया जब आर्थिक विकास दर नरम थी और आगे मांग कमजोर जबकि वैश्विक आधिक्य के कारण आपूर्ति अधिक थी। दास ने कहा, राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन से हाल में धीरे-धीरे सुधार के संकेत मिलने लगे हैं।

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