महंगाई, बेरोजगारी और अनाज का संकट

चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में साढ़े 13 फीसदी की विकास दर का आंकड़ा देखने के बाद भी यह कहना कि देश की अर्थव्यवस्था गहरे संकट में हैं, थोड़ा जोखिम भरा काम है।

धर्मस्थलों का विवाद कब थमेगा?

अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद ऐसा लगा था कि अब सब कुछ ठीक हो जाएगा। अब किसी धर्मस्थल को लेकर कोई विवाद नहीं होगा।

भारत जोड़ो यात्रा से क्यों चिंतित है भाजपा?

कांग्रेस को भी अंदाजा नहीं रहा होगा कि उसकी भारत जोड़ो यात्रा को शुरुआत में ही इतना अच्छा रिस्पांस मिलेगा और यात्रा से भाजपा में चिंता व डर का भाव पैदा होगा।

कर्तव्य पथ पर किसको चलना है?

रायसीना की पहाड़ियों पर बने राष्ट्रपति भवन से इंडिया गेट तक जाने वाली सड़क का नाम राजपथ से बदल कर कर्तव्य पथ कर दिया गया है।

स्वागत है राहुल गांधी!

राहुल गांधी पदयात्रा पर निकले हैं। भारत के ज्ञात इतिहास की यह सबसे लंबी पदयात्रा है। वे साढ़े तीन हजार किलोमीटर पैदल चलेंगे।

विपक्ष के सामने कुआं और खाई

अगले लोकसभा चुनाव की तैयारियों में लगी विपक्षी पार्टियां इस बुनियादी सवाल पर बंटी हैं कि उनका प्रधानमंत्री पद का दावेदार कौन होगा।

कांग्रेस को निरंतरता की जरूरत

कांग्रेस पार्टी ने रामलीला मैदान में बड़ी रैली की है। महंगाई पर हल्ला बोल रैली में भीड़ जुटी थी और अब कांग्रेस नेता निश्चिंत होकर कुछ दिन आराम कर सकते हैं।

क्षेत्रीय पार्टियों के लिए मुश्किल समय

चाहे सुनियोजित योजना के तहत हो या स्वाभाविक राजनीतिक गति की वजह से हो लेकिन कई राज्यों में प्रादेशिक पार्टियां कमजोर हो रही हैं।

चुनाव हार जाना गुनाह नहीं है

यह कांग्रेस का दुर्भाग्य है कि आज हर आदमी उसकी कमियां बता रहा है, सुधार कोई नहीं सुझा रहा है। यह भी दुर्भाग्य है कि लोग या तो कांग्रेस के संपूर्ण विरोध में खड़े हैं या संपूर्ण समर्थन में।

सहकारी संघवाद क्या ऐसा होता है?

लेकिन क्या सहकारी संघवाद ऐसा होता है, जैसा देश में दिख रहा है? पूरे देश सहकारी संघवाद की क्या स्थिति है उसकी तस्वीर सिर्फ एक राज्य-झारखंड के घटनाक्रम से दिखाई दे रही है।

कांग्रेस के लिए फैसले की घड़ी

अब कांग्रेस को तय करना है कि पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष कौन होगा? कांग्रेस को यह भी तय करना है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में उसकी क्या रणनीति होगी?

सियासी ड्रामे का ओवरडोज!

आम आदमी पार्टी का बनना और एक राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित होना एक बेहद नाटकीय घटनाक्रम रहा है।

कथनी और करनी का विरोधाभास

सार्वजनिक जीवन में काम करने वाले किसी भी नेता की बातों का असर तभी होता है, जब उसकी कथनी और करनी में अंतर न हो।

प्रतीकों के खेल में मोदी बेजोड़

राजनीति धारणा और प्रतीकों का खेल है। इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि प्रतीकों के जरिए धारणा बनाने का खेल है। इस खेल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेमिसाल खिलाड़ी हैं।

परिवारवाद या अवसर की असमानता?

भारतीय जनता पार्टी के सामने देश की वामपंथी पार्टियों की चुनौती नहीं है और न नई राजनीति शुरू करने के नाम पर दो राज्यों में सरकार बना चुकी आम आदमी पार्टी की है।

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