Corona Virus Crisis | वायरस से पहले घायल भारत! - Naya India
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Corona Virus Crisis | वायरस से पहले घायल भारत!

New Delhi | 25 मार्च से 15 मई के 52 दिनों में भारत में लोग इतना पैदल चले हैं, गर्मी में इतने झुलसे हैं, इतने प्यासे-भूखे रहे हैं, थके हैं, टूटे, मरे हैं कि मानवता की याददाश्त में महामारी से पूर्व की ऐसी दास्तां ढूंढे नहीं मिलेगी। कोविड-19 का वायरस लोगों को मारने लगे उससे पहले ही भारत में वह मूर्खता, वह असंवेदनशीलता दिखी, जिससे असंख्य परिवार, गरीब, दिहाड़ी पर जिंदगी जीने वाले लोग, मजदूर चलते-चलते, रोते-रोते बुरी तरह गर्मी में सूखे, घायल हुए। इन लोगों के आंसू कितने बहे, मां-बापऔर उनके साथ छोटे-छोटे मासूम कदमों में बच्चों पर क्या गुजरी, कितने मरे-घायल हुए, कितने भूख-प्यास से तड़पे इसका 21वीं सदी की सूचना क्रांति, टेक्नोलॉजी, टीवी चैनलों, अखबार या इंस्टाग्राम और सोशल मीडिया व भारत की सरकारों के पास कोई संग्रहित-इकठ्ठा रिकार्ड नहीं मिलेगा।

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न करूणा, न संवेदना और न ख्याल!
मानों तालाबंदी के बाड़े को तोड़ कर घर के लिए निकले चेहरे इंसान न हो भेड़-बकरी हों। यदि भारत के नेताओं, भारत की व्यवस्था, भारत की सरकारों में इनका बतौर नागरिक, बतौर इंसान मान-मूल्य होता तो कैसे वह सब होता जो 52 दिनों में भारत की सड़कों पर, हाईवे पर, रेल की पटरी पर हुआ है? पचास-सौ या हजार किलोमीटर पैदल चलते परिवार-दर-परिवार, रेला-दर-रेला की दास्तां ने भारत की व्यवस्था, भारत के दिल-दिमाग को झिंझोड़ा नहीं, दहलाया नहीं। पता नहीं इनके फोटो, इनकी इमेज देख कितनों की नींद में कुछ चिंता आई होगी, नींद उड़ी होगी? कितनों ने इन पैदल यात्रियों की, परायी जगह की तालेबंदी में फंसे लोगों की तकलीफ को, उनके आंसू, उनके घाव, उनकी पीड़ा को फील किया होगा?

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नया इंडिया’ आज मां भारती के झुलसे, अभी भी झुलसते, भूखे-प्यासे लोगों, उन मासूम बच्चों के सिसकने की खबरों पर फोकस बना प्रस्तुत है। ताकि सनद रहे कि 21वीं सदी के साल 2020 में भारत कितना पैदल चला था, कैसे पैदल चला था, कैसे लोग मौत की दस्तक में अपने घर की सुरक्षा में दौड़े थे। लाखों-करोड़ों लोगों का घर की शरण में लौटना प्रमाण है कि इन नागरिकों को भारत की व्यवस्था, व्यवस्था के भाषणों, बातों, प्रबंधों पर विश्वास नहीं है। और उनका विश्वास सही भी साबित हुआ। उन्होंने जाना-बूझा कि प्यासे-भूखे, थके, टूटे, मरे बाल-बच्चों के साथ पैदल चले जा रहे हैं और सरकारों ने आ कर यह नहीं कहा, पैदल क्यों जा रहे हो हम तुम्हें तुम्हारे घर पहुंचाते हैं। सो, गौर करें उन फोटों, उन खबरों पर जो 52 दिनों की त्रासदी को समेटे हुए हैं। फोटो पर गौर करें, खबरों का अर्थ बूझें और लेख-विश्लेषण से विचार करें कि कोविड-19 अपने बाद भारत को क्या बनाए हुए होगा।

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जिगर का टुकड़ा, सूटकेस और मां


बच्चा पैदल चल कर थक गया है। पर मंजिल दूर है। मां क्या करे? उसने सूटकेस पर बच्चे को लेटाया और सूटकेस को सड़क पर घसीटते हुए वह बढ़ने लगी। सूटकेस और बेटे के दोगुने भार को खिंचती हुई! लेकिन महिला की रफ्तार धीमी नहीं होती है। वह महिला, परिवार के साथ उत्तर प्रदेश के आगरा से होते हुए अपने घर जा रहे मजदूरों के समूह के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही है।

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जब रिपोर्टर ने महिला से पूछा कि कहां जाना है तो मां ने कहा ‘झांसी’। राज्य सरकारों की ओर से चलाई गई विशेष बस सेवा के जरिए वे लोग घर क्यों नहीं जा रहे? उसने सवाल अनसुना किया। महिला बहुत थकी, टूटी दिख रही है। मजदूरों का यह ग्रुप पत्रकारों से बिना बात किए हुए आगे बढ़ जाता है।बच्चा थका-हारा सूटकेस से चिपका हुआ है। मजदूरों का समूह पंजाब से पैदल चल कर आ रहा है और झांसी जाएगा। इनका सफर कोई800 किलोमीटर का होगा। पूरे देश में प्रवासी मजदूर पैदल ही अपने घरों को लौटने को मजबूर हैं। मजदूरों का कहना है कि उनके पास काम बचा नहीं था। खाने को खाना नहीं मिल रहा था। ऐसे में वे अपने घरों की ओर जा रहे हैं।

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