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जो जीता वो सिकंदर, हारा वो बाज़ीगर

Rajendra Nagar assembly election

राजेंद्र नगर विधानसभा के उप-चुनाव में भाजपा,आप या फिर कांग्रेस किसे उम्मीदवार बनाती है यह तो फिलाहल इंतज़ार की बात है पर दावा तीनों पार्टियों की साख का ज़रूर है। भाजपा में कोई अगर टिकट मिलने की पूरी आस में है तो कोई यह भी दावा कर रहा है कि वह टिकट की दौड़ में है ही नहीं। पर यह ज़रूर है कि टिकट के ये दावेदार एक-दूसरे को निपटाने के फेर में ज़रूर बताए जा रहे है। किसी को टिकट मिलने के बाद जीत चुनौती नज़र आ रही है तो किसी की चिंता अपने बनते बिगड़ते बजट से भी ताल्लुक़ रखे हुए है। पिछले एक विधानसभा चुनाव में तो इनमें से एक राष्ट्रीय पार्टी के एक उम्मीदवार को आख़िरी दौर में जब यह लगने लगा कि वे चुनाव हार रहे हैं तो उन्होंने खर्च करना तो बंद कर ही दिया साथ ही दुकानदारों से चुनाव के नाम पर उगाही भी शुरू कर दी।

खैर वे चुनाव हारे पर बजट संतुलित करने में कामयाब रहे पर कोई इसे ग़लत कहें तो नेता कहते हैं कि इसमें बुराई भी क्या ? यानी जब जीतने का भरोसा ही नहीं था फिर भी अगर पार्टी टिकट थमा देती है तो इसमें उम्मीदवार की गलती भी क्या ? कांग्रेस की तो बात ही क्या ? पिछला विधानसभा चुनाव लड़ने और हारने के बाद ये नेताजी ऐसे ग़ायब हो लिए थे जैसे गधे के सिर से सींग।पर हाँ अब चुनावी हलचल फिर शुरू हुई है तो नेताजी फिर प्रकट हुए हैं,टिकट मिलती है या नहीं यह दूसरी बात है। रही बात आप पार्टी के उम्मीदवार की सो दावेदारों की संख्या कोई ज़्यादा नहीं। एक तो पूर्व विधायक गर्ग का तो दावा उनके चेले कर ही रहे हैं दूसरे वे कर रहे हैं जिन्हें राघव चड्डा से 36 का आँकड़ा होने के चलते गर्ग को टिकट मिलने की उम्मीद नहीं है।

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कहने वाले तो यहां तक कहते मिल जाएँगे कि राघव अपने परिवार के किसी व्यक्ति को इस सीट से चुनाव लड़ाने की कोशिश में हैं। खैर! विधानसभा से किस पार्टी से किसे टिकट मिलती है और किसकी कोशिश हो जाती है बेकार यह अलग बात है पर यह ज़रूर मानिए कि कार्यकर्ता अपने उम्मीदवार की हार-जीत में अपना पसीना बहा देता है और पार्टी के नेता यही तौलते रह जाते हैं कि किस नेता का और कौनसा गुट चुनाव में हावी रहता है और इससे अपने क्या नफ़ा-नुक्सान हैं।और तो और पार्टियों का राष्ट्रीय नेतृत्व भी यही गुणा -भाग लगाता रह जाता है कि इस हार-जीत के प्रदेश में और बाक़ी प्रदेशों में होने वाले चुनावों में क्या असर रह सकता है। अब भले कोई यह कहे कि चुनाव में टिकट मिलने से लेकर जीत-हार तक खेल राजनीति के साथ-साथ उम्मीदवार का अपने बजट से भी ताल्लुक़ रहता है तो कोई ग़लत भी क्या माने ? आख़िर नतीजों के बाद की भी राजनीति होती ही है ना। तभी हारी हुई सीट पर कभी उम्मीदवारों की कमी शायद किसी पार्टी में नहीं होती। या यूँ कहिए कि हार कर भी जो जीते रहते हैं उसे ही राजनीति का बाज़ीगर भी लोग कहते हैं। यक़ीन मानिए राजेंद्र नगर विधानसभा में आने वाले चुनाव में यही होना है।

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