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गर्ग नहीं ‘आप’ के पाठक हैं मैदान में

Aap party for tickets

आप पार्टी के पूर्व विधायक विजेन्द्र गर्ग के साथ पार्टी का सलूक यह होगा शायद उन्हें उम्मीद नहीं होगी। पर हुआ वो भी अपनों के ही हाथों। राजेंद्र नगर विधानसभा से विधायक रहे गर्ग की पिछले पाँच साल तक खासी पहचान रही पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के चहेते होने के चलते राघव चड्डा को पिछले चुनावों में गर्ग की विधानसभा से उम्मीदवार बना दिया । खैर चड्डा जीते वो भी वोटों की अच्छी गिनती से। अब घुटने तो पेट को नाते ही हैं सो पार्टी ने पंजाब में फ़तह की तो पार्टी की गुद्दी चढ़ गई और साथ ही केजरीवाल के चहेते यानी राघव चड्डा की । सो पंजाब से राज्यसभा की सीट ख़ाली होते ही चड्डा को राज्यसभा भेज दिया गया। चड्डा की तरक़्क़ी हुई तो शायद चड्डा से ज़्यादा गर्ग खुश हुए होंगे। पर ये ख़ुशी चड्डा को लेकर कम, ख़ाली हुई अपनी राजेंद्र नगर विधानसभा सीट से उप चुनाव लड़ने की उम्मीद से ज़्यादा थी। अब उम्मीद पर तो राजनीति ही टिकती है सो गर्ग को भी इस सीट से चुनाव लड़ने की उम्मीद बनी रही और एक हफ्ते पहले तक। यानी 22 मई तक अपने ये नेताजी विधानसभा चुनावों के लिए क्षेत्र में कार्यक्रम करते रहे। कभी जनसंपर्क अभियान तो कभी इलाक़े में सभाएँ करते रहे। और तो और वे अपने वोटरों को समझाते रहे कि मैं पहले की तरह आपके साथ मिलकर विकास के लिए काम करूँगा। और हर दुख मैं आपके साथ खड़ा रहूँगा, एक बार सेवा का मौक़ा दें पर पार्टी की अंदरूनी राजनीति ने गर्ग की सारी उम्मीदें चंद दिनों में काफ़ूर कर दी।

और प्रभारी बनाए गए दुर्गेश पाठक पर दांव लगाने पर फ़ैसला कर डाला। अब आख़िरी दौर तक पाठक ही पार्टी के उम्मीदवार रहेंगे ऐसी ही उम्मीद मानी जा रही है। अब इस सीट को लेकर पार्टी का फ़ैसला कब तक टिकाऊ रहता है इससे बड़ा सवाल लोगों के बीच में यह है कि क्या पार्टी अपनी इस सीट पर क़ब्ज़ा बनाए रखेगी ? या क्या विधानसभा में नई पहचान बनाने को आतुर दुर्गेश पाठक सीट निकाल लेंगे? पर दुर्गेश पाठक की जीत के लिए विधायक रहे गर्ग और राघव चड्डा की मदद भी ज़रूरी होगी । या यूँ कहिए कि आप पार्टी की जीत इस बात पर भी निर्भर करेगी कि पाठक पार्टी के ही भितरघात से खुद को कैसे निकालेंगे। राघव चड्डा और गर्ग में 36 का आँकड़ा माना जाता है तभी पाठक से पहले तक यह चर्चा चली थी कि चड्डा टिकट के समय गर्ग की ख़िलाफ़त करेंगे। और अगर पाठक पर ही पार्टी की मुहर होती है तो राजनीति के गलियारों में चड्डा और गर्ग के बीच विवाद पर मुहर मानी ही जानी है।

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