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Good News : कुत्ते सूंघ कर करेंगे कोरोना या कैंसर के मरीजों की पहचान, भारत में यहां प्रशिक्षण केंद्र खोलने की तैयारी…

नई दिल्ली | अगर हम आपको यह कहे कि आपको कोरोना टेस्ट या फिर कैंसर के लिए किसी प्रकार का टेस्ट कराने की जरूरत नहीं है कुत्ते सूंघ कर बता देंगे कि आपको ऐसी कोई बीमारी है या नहीं. यह सुनने में जरूर अटपटा लगता है लेकिन आने वाले दिनों में यह सच होने वाला है. पंजाब के गुरु अंगद देव वेटरनरी एंड एनिमल साइंस यूनिवर्सिटी इस प्रकार के विशेष नस्ल वाले कुत्तों को प्रशिक्षित करने की तैयारी की जा रही है. यहां बता दें कि दुनिया के कई देश कोरोना टेस्ट के लिए कुत्तों का इस्तेमाल कर भी रहे हैं. अपना कार्यकाल पूरा करने वाले वाइस चांसलर डॉ इंद्रजीत सिंह ने कहा कि कुत्तों ने सूंघने की विशेष क्षमता होती है उनका कहना है कि इंसानों से करीब 1000 गुना अधिक कुत्ते सूंघ सकते हैं.

ऐसे कर सकेंगे संक्रमण की पहचान

डॉ इंद्रजीत सिंह ने कहा कि यदि विशेष नस्ल के कुत्तों को बार-बार सी विशेष बीमारी से संक्रमित व्यक्ति के कपड़े या फिर बदन की बदबू सूंघा दी जाए तो वह आसानी से इस तरह की गंध को पहचान सकता है. श्री सिंह ने कहा कि इसके लिए कुत्तों को विशेष ट्रेनिंग दी जाती है इसके बाद इनका प्रयोग आप व्यक्ति के संक्रमण को जानने के लिए भी कर सकते हैं. उन्होंने बताया कि पंजाब में इसके लिए डॉग ट्रेनिंग कम ब्रीडिंग सेंटर की तैयारी भी शुरू कर दी गई है.

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इजराइल में किया जा रहा है कुत्तों का इस्तेमाल

सीएमसी अस्पताल के कम्युनिटी मेडिसिन डिपार्टमेंट हेड डॉक्टर लॉरेंस ने भी कहा कि यह पूरी तरह से संभव है. उन्होंने कहा कि विशेष प्रशिक्षण देकर गुप्ता को इस लायक बनाया जा सकता है. डॉक्टर क्लोरेंस ने कहा कि इजरायल में कुत्तों द्वारा संक्रमण का पता लगाने की प्रक्रिया शुरू की गई है. हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो सकता है कि यह प्रक्रिया कितनी सही है. लेकिन आने वाले समय में कुत्ते का प्रयोग संक्रमण की जांच के लिए किया जा सकेगा इसमें कोई शक नहीं है.

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राजनीति

अभिषेक बनर्जी कहां राष्ट्रीय राजनीति करेंगे?

Abhishek Banerjee Mamata Banerjee

नेताओं का आत्मविश्वास अक्सर हैरान करने वाला होता है। कई बार नासमझ नेता कोई बयान देते हैं, जैसे ई श्रीधरन ने कहा कि वे केरल के मुख्यमंत्री बनेंगे, तो ऐसे बयानों की अनदेखी करनी होती है। लेकिन कई बार बहुत जानकार और सीजन्ड नेता इस तरह के बयान देते हैं। जैसे ममता बनर्जी ने कहा है कि उनकी पार्टी अब राष्ट्रीय राजनीति करेगी। उन्होंने अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को राष्ट्रीय महासचिव बनाया है। नई जिम्मेदारी मिलने के बाद अभिषेक ने कहा कि वे पार्टी को पूरे देश में ले जाएंगे और चुनाव लड़ेंगे। अब सोचें, अभिषेक बनर्जी पार्टी को कहां राष्ट्रीय राजनीति करेंगे? क्या वे अगले साल उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में पार्टी को चुनाव लड़ाएंगे? इससे उनको क्या हासिल होगा?

तृणमूल कांग्रेस पहले भी इस तरह राष्ट्रीय राजनीति करने का प्रयास कर चुकी है। झारखंड में इधर-उधर के नेताओं को जुटा कर तृणमूल को खड़ा करने का प्रयास हुआ था। ममता बनर्जी भी रैली करने पहुंची थीं। लेकिन अंत नतीजा क्या हुआ? इधर-उधर से आए सारे नेता फिर इधर-उधर चले गए। बिल्कुल यहीं कहानी त्रिपुरा में भी दोहराई गई थी। ममता बनर्जी के पश्चिम बंगाल में तीसरी बार चुनाव जीत जाने के बाद भी इसमें कुछ बदलाव नहीं आया है। अब भी वे बंगाल की ही नेता हैं। इसका कारण यह है कि उन्होंने पहले कभी शरद पवार की तरह राष्ट्रीय राजनीति नहीं की है और न निजी तौर पर खुद को राष्ट्रीय नेता की तरह प्रोजेक्ट किया है। वे हमेशा बांग्ला अस्मिता के ईर्द-गिर्द राजनीति करती रहीं। इसलिए उनके लिए मुश्किल है कि पूर्वोत्तर के इक्का-दुक्का राज्यों को छोड़ कर कहीं और राजनीतिक रूप से सफल हों। अभिषेक अगर बहुत मेहनत करेंगे तो कुछ जगहों पर कांग्रेस को नुकसान पहुंचा सकते हैं, पर तृणमूल का कोई फायदा नहीं करा सकते हैं।

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