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अब हौबे खेला: ममता बनर्जी के लिए मंच तैयार कर रहे हैं टिकैट, दीदी बोली – सब साथ आएं और बनाएं यूनियन ऑफ स्टेट्स

कोलकाता | किसान आंदोलन के सूत्रधार माने जाने वाले राकेश टिकैत निकल ममता बनर्जी से मुलाकात की थी. इस मुलाकात के पहले से ही सियासी अटकलें तेज हो गई थी. मुलाकात के बाद यह बात खुलकर सामने भी आ गई कि ममता बनर्जी अब सीधे प्रधानमंत्री मोदी से मुकाबला करना चाहती हैं. ममता बनर्जी ने इस संबंध में अपनी मंशा भी साफ कर दी है. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने देश की सभी गैर भाजपा की सरकारों को साथ आने का न्योता दिया है. इसके साथ ही सीएम ममता ने संविधान के आर्टिकल 1 का हवाला देते हुए यूनियन ऑफ स्टेट्स का प्रस्ताव भी दिया है. ममता बनर्जी का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा की तानाशाही को रोकने के लिए हम सब को एक होना ही होगा.

सामूहिक परिवार बनाएं,  नेतृत्व के लिए भूल जाएं मेरा नाम

इसमें कोई शक नहीं है कि यदि सभी राजनीतिक पार्टियां एक होती हैं तो ममता बनर्जी के अलावा शायद ही कोई दूसरा नाम सामने आएगा. कांग्रेस के हालात ऐसे नहीं है कि अभी वह प्रधानमंत्री मोदी की टक्कर में कोई नेता दे सके. कांग्रेस भले ही राहुल गांधी पर एक बार फिर से गेम खेलना चाहे लेकिन इसके लिए शायद ही कोई दूसरी पार्टी तैयार होगी. मतलब साफ है यदि ममता बनर्जी के बयान के अनुसार कोई सामूहिक परिवार भाजपा के खिलाफ खड़ा होता है तो उसका नेतृत्व ममता बनर्जी ही करने वाली है. हालांकि ममता बनर्जी ने साफ कहा है कि आप मेरा नाम भूल जाए लेकिन सब साथ खड़े हो जाइए.

टिकैत से मुलाकात के बाद आया बड़ा बयान

किसान आंदोलन में मुख्य भूमिका निभा रहे राकेश टिकैत ने कल बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात की थी. इसी के बाद ममता ने सबको साथ आने का न्योता दिया है. जाहिर सी बात है कि राकेश जी के भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने का कार्य कर रहे हैं और वे सभी गैर भाजपाई पार्टियों को एक साथ लाने की कोशिश में भी जुटे हैं. मुलाकात के बाद ममता बनर्जी ने यह भी कहा कि जनवरी के बाद से अब तक भारत सरकार एक बार भी किसानों से बात नहीं कर पाई है. उन्होंने कहा कि मतलब साफ है केंद्र सरकार या चाहती ही नहीं की किसान आंदोलन से जुड़ा मुद्दा खत्म हो वह तो बस अपनी तानाशाही में लगी हुई है.

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बंगाल विधानसभा चुनाव में दी थी मात

बता दें कि बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी. एक के बाद एक कई रैलियों को प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संबोधित किया था. इसके बाद भी भाजपा बंगाल में कुछ खास नहीं कर पाई . बंगाल के लोगों ने एक बार फिर से ममता बनर्जी पर ही विश्वास जताया. ऐसे में माना जा रहा है कि यदि सच में कोई सामूहिक परिवार भविष्य में बनता है तो उसका नेतृत्व करने की क्षमता सिर्फ और सिर्फ ममता बनर्जी में ही है.

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बेबाक विचार | लेख स्तम्भ | संपादकीय

आपकी राजनीति क्या है?

कांग्रेस की भी आज मुश्किल यही है कि उसकी राजनीतिक दृष्टि साफ नहीं है। आज बड़ी संख्या में लोग राहुल गांधी को पसंद करने लगे हैं। लेकिन बात पार्टी और उसकी सियासत की आती है, तो उन्हें भरोसा करने लायक कुछ नहीं मिलता। पवार एंड कंपनी के साथ ये बात और भी ज्यादा लागू होती है।

मीडिया को मसाला मिल गया है। शरद पवार के घर पर कई विपक्षी नेताओं और कुछ जानी-मानी शख्सियतों की बैठक से कयासों के दौर अभी कई रोज चलेंगे। तीसरा मोर्चा- चौथा मोर्चा जैसी चर्चाएं पहले ही शुरू हो चुकी हैँ। ये बैठक एनसीपी सुप्रीमो की चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर से दो मुलाकातों के बाद हो रही है, तो जाहिर इसमें मसाला और भी पड़ा है। हालांकि किशोर ने एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में यह साफ कहा कि उनकी राय में तीसरा मोर्चा एक नाकाम प्रयोग है। ऐसी कोशिश भारतीय जनता पार्टी को पराजित करने में सफल नहीं होगी। लेकिन ऐसे प्रयासों से किशोर के नाम जुड़ते रहे हैँ। पिछले साल बिहार चुनाव के पहले भी ऐसी चर्चाएं मीडिया में जोरों पर थीं कि किशोर यशवंत सिन्हा और कन्हैया कुमार के साथ मिल कर बिहार में तीसरा विकल्प तैयार करने की कोशिश में हैं। नतीजा सिफर रहा। अब दिल्ली की बैठक में उनकी कितनी भूमिका है, यह भी कयास का ही विषय है। लेकिन ऐसी बैठकें कुछ हासिल करेगी, यह मानने की कोई वजह नहीं हो सकती।

इसका कारण यह नहीं है कि इस प्रयास के पीछे भाजपा और कांग्रेस से समान दूरी की अप्रसांगिक सोच है। बल्कि असल वजह यह है कि सिर्फ चेहरों के साथ अगर राजनीति करनी हो, वह भी राज्य स्तरीय चेहरों को सामने रख कर तो राष्ट्रीय स्तर पर उसका कोई असर नहीं होगा। कोरोना महामारी के कारण नरेंद्र मोदी की छवि धूमिल जरूर हुई है, लेकिन आज भी वे विपक्ष के तमाम क्षत्रप चेहरों से कहीं बहुत ज्यादा शक्तिशाली चेहरा हैं। बेशक मोदी भाजपा की आज बहुत बड़ी ताकत हैँ। लेकिन भाजपा को हाल के वर्षों में जीत की मुख्य वजह सिर्फ उनकी ताकत नहीं है। बल्कि भाजपा इसलिए जीतती क्योंकि उसके पास एक खास राजनीति है। ये राजनीति हिंदुत्व या दमित हिंदू भावनाओं की अभिव्यक्ति देने वाली ताकत के रूप में है। सवाल है कि पवार के घर पर जुटे नेताओं की क्या राजनीति है? दरअसल, कांग्रेस की भी आज मुश्किल यही है कि उसकी राजनीतिक दृष्टि देश की जनता के सामने साफ नहीं है। आज ऐसे लोगों की बड़ी संख्या है, जो व्यक्तिगत रूप से राहुल गांधी को पसंद करने लगे हैं। लेकिन बात पार्टी और उसकी सियासत की आती है, तो उन्हें भरोसा करने लायक कुछ नहीं मिलता। पवार एंड कंपनी के साथ ये बात कांग्रेस से भी ज्यादा लागू होती है।

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