1856 से पहले हिंदू-मुस्लिम मिलजुल कर रहते थे: सुप्रीम कोर्ट - Naya India
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1856 से पहले हिंदू-मुस्लिम मिलजुल कर रहते थे: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। अयोध्या में विवादित भूमि के बहुप्रतीक्षित फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को कहा कि 1856-57 में ढांचे के पास हुए दंगों से पहले हिंदू और मुस्लिम सहअस्तित्व के साथ मिलजुल कर रहते थे। सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को दिए अपने फैसले में अयोध्या में विवादित 2.77 एकड़ भूमि हिंदू पक्ष को देकर राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया और मुस्लिम पक्ष को मस्जिद के निर्माण के लिए कहीं अन्य जगह पांच एकड़ भूमि देने का फैसला सुनाया।

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसने भारत के अस्तित्व के समय से चले आ रहे विवाद का समाधान सुनाया। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय पीठ ने कहा, विवाद से जुड़ी घटनाएं मुगल साम्राज्य, औपनिवेशिक काल और वर्तमान संवैधानिक शासन से जुड़ी हुई हैं। शीर्ष अदालत ने पाया कि एक परिसर में दो धर्मो की मान्यताएं थीं। पीठ ने कहा, उनका सहअस्तित्व एक समय, विशेषकर 1856 से पहले स्वीकार्य था।

हिंदू और इस्लामिक परंपराओं को अपनाते हुए स्थल की विशेष बात इसे अपनी अलग पहचान देता है। पीठ ने ढहाई गई मस्जिद की धार्मिक और स्थापत्य परंपरा के बारे में बताते हुए कहा, “विवादित स्थल ने विश्वासों और हिंदू, मुस्लिमों की प्रथाओं, विश्वासों और परंपराओं का सह अस्तित्व देखा है। शीर्ष अदालत ने कहा, मंदिर और मस्जिद के गुणों से मिश्रित तत्कालीन ढांचे की धार्मिक और स्थापत्य परंपरा में हिंदू और मुस्लिम तत्वों का मिश्रण दिखता है।

भिन्न स्थापत्य तत्व काफी मात्रा में थे, तो उन्हें आसानी से पहचान लिया गया। शीर्ष अदालत ने कहा, वे समकालिक संस्कृति के प्रतीक थे। वराह, गरुड़, जय और विजय के साथ काले कसौटी स्टोन खंबे जैसी विशेष आकृतियों से पता चलता है कि वे शुरुआत में हिंदू मंदिर की सजावट के लिए थे और यहां देवताओं की पूजा होती थी। कोर्ट ने कहा कि वहीं तीन गुंबदों, वजू, पत्थर पर उकेरा गया अल्लाह, मिंबर और मेहराब से वहां मस्जिद के सबूत मिलते हैं। इनसे पता चलता है कि विवादित स्थल एक मस्जिद के तौर पर बनाया गया था।

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भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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