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क्या करेगी आज़ाद की ‘आज़ाद’ पार्टी

आज़ाद भले ही कुछ भी कहें लेकिन यह साफ है कि गुलाम नबी आज़ाद ने अपनी नई पार्टी के नाम में ‘आज़ाद’ शब्द जोड़ कर अपने ‘दबदबे’ को ज़ाहिर करने की कोशिश की है । यही नही आज़ाद का इरादा कांग्रेस आलाकमान को यह दर्शाने का भी है कि गुलाम नबी आज़ाद एक बड़ी ‘ताकत’ हैं और अपने नाम से बकायदा एक पार्टी भी खड़ी कर सकते हैं ।

जैसी की संभावना थी गुलाम नबी आज़ाद ने आख़िर कांग्रेस से अलग होने के बाद अपनी पार्टी का गत 26 सितंबर को ऐलान कर ही दिया । ‘डेमोक्रेटिक आज़ाद पार्टी’ के नाम से गठित की गई इस नवगठित पार्टी के गुलाम नबी आज़ाद खुद चेयरमैन बने हैं । ‘डेमोक्रेटिक आज़ाद पार्टी’ में ‘आज़ाद’ शब्द ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा है ।असल में गुलाम नबी आज़ाद अपनी पार्टी के नाम में ‘आज़ाद’ शब्द को शामिल करने के मोह से  अपने आप को बचा नही सके हैं । ऐसा करके आज़ाद ने अपनी खुद की ‘ताकत’ को बतलाने की कोशिश की है । हालांकि गुलाम नबी आज़ाद का दावा है कि ‘आज़ाद’ शब्द का उनके अपने नाम से कोई संबंध नही है । उनका कहना है कि ‘आज़ाद’ का मतलब ‘स्वतंत्र’ होता है इसलिए उनकी नई पार्टी पूरी तरह से स्वतंत्र सोच वाली होगी और उसमें सभी धर्मों का सम्मान  होगा ।

आज़ाद भले ही कुछ भी कहें लेकिन यह साफ है कि गुलाम नबी आज़ाद ने अपनी नई पार्टी के नाम में ‘आज़ाद’ शब्द जोड़ कर अपने ‘दबदबे’ को ज़ाहिर करने की कोशिश की है । यही नही आज़ाद का इरादा कांग्रेस आलाकमान को यह दर्शाने का भी है कि गुलाम नबी आज़ाद एक बड़ी ‘ताकत’ हैं और अपने नाम से बकायदा एक पार्टी भी खड़ी कर सकते हैं । यह भी साफ है कि ‘आज़ाद’ शब्द के बिना ‘डेमोक्रेटिक आज़ाद पार्टी’ को आम लोगों तक ले जाना बेहद मुश्किल होता । ‘आज़ाद’ शब्द से कुछ हद तक पार्टी का नाम प्रचारित करने में मदद मिल सकती है ।

हालांकि गुलाम नबी आज़ाद की नवगठित डेमोक्रेटिक आज़ाद पार्टी सच में कितनी बड़ी ताकत बनेगी यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा मगर जिन नेताओं के भरोसे आज़ाद ने पार्टी का गठन किया है, उनके पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए अभी से ही राजनीतिक पंडित पार्टी के भविष्य को लेकर शंकित हैं । आज़ाद समर्थक इन नेताओं की ज़मीनी हकीकत और ताकत क्या है यह कोई और जाने न जाने खुद आज़ाद भी बख़ूबी जानते हैं । उन्हें अपने इन समर्थक नेताओं की ताकत का अंदाज़ा 2014 में ही हो गया था जब उन्होंने पहली बार अपने गृह राज्य जम्मू-कश्मीर से लोकसभा का चुनाव लड़ा था । आज़ाद को इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार जितेंद्र सिंह से करारी हार का सामना करना पड़ा था ।

इस हार ने गुलाम नबी आज़ाद की राजनीति पूरी तरह से बदल कर रख दी थी । आज़ाद के उस समय के राजनीतिक कद के हिसाब से यह बहुत बड़ी हार थी और इसी हार के बाद से कांग्रेस आलाकमान के सामने आज़ाद की राजनीतिक ताकत कम होना आरंभ हो गई थी।

आज़ाद के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले जितेंद्र सिंह अपने राजनीतिक जीवन का पहला चुनाव लड़ रहे थे ।मगर आज़ाद को हराने की वजह से जितेंद्र सिंह का राजनीतिक कद अचानक से बढ़ा और आज जितेंद्र सिंह दिल्ली में मंत्री हैं ।

जो बोया था उसी की फसल काट रहे

2014 के लोकसभा चुनाव में प्रदेश कांग्रेस के जिन नेताओं को गुलाम नबी आज़ाद की हार के लिए ज़िम्मेवार माना गया था लगभग वही नेता अब डेमोक्रेटिक आज़ाद पार्टी के गठन में आज़ाद के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं । दरअसल यह आज़ाद की मजबूरी ही है कि अपनी पार्टी का गठन करने के लिए आज उन्हें ज़मीनी रूप से कमज़ोर इन्हीं नेताओं की मदद लेनी पड़ रही है । गुलाम नबी आज़ाद ने 45 वर्षों की राजनीति में जो बोया था आज वही फसल काट रहे हैं।

इसमें कोई शक नही कि छोटे-बड़े लगभग 100 नेताओं ने आज़ाद के समर्थन में कांग्रेस को छोड़ दिया है। लेकिन इन नेताओं में अधिकतर तो कागज़ी शेर हैं और इन सबका ज़मीनी स्तर पर कोई आधार शेष बचा नही है । अगर ऐसा नही होता तो पिछले लगभग दो से तीन  चुनाव इन नेताओं ने बुरी तरह से हारे नही होते। आज़ाद लगातार दावा तो कर रहे हैं कि उनके साथ सभी पूर्व कांग्रेस विधायक आ गए हैं । मगर आज़ाद यह नहीं बता रहे कि उनके साथ जाने वाले विधायकों ने अपना आखिरी चुनाव कब जीता था।

दरअसल आज़ाद के अधिकतर समर्थक नेता ठीक उसी तरह की राजनीति करते रहे हैं जिस  राजनीति के खुद आज़ाद आदि रहे हैं । जिस तरह से आज़ाद कई वर्षों से कांग्रेस आलाकमान को धौंस दिखाते रहे हैं कि पूरे जम्मू-कश्मीर में उनका व्यापक स्तर पर आधार है और जम्मू-कश्मीर के वे निर्विवाद रूप से एकमात्र नेता हैं । ठीक उसी तर्ज पर आज़ाद के समर्थक गुट के नेता भी आज़ाद को हमेशा से यकीन दिलाते रहे हैं कि वे सभी अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों को संभाले हुए हैं । जिस तरह से आज़ाद कई सालों से दिल्ली में अपने बंगले के ड्राइंग रूम में बैठकर जोड़-तोड़ करते रहे हैं ठीक उसी तर्ज पर उनके समर्थक नेताओं ने भी अपने निर्वाचन क्षेत्रों को वर्षों से छोड़ रखा है और जम्मू या श्रीनगर जैसे बड़े शहरों में बैठकर राजनीतिक तिकड़म करने की कोशिश करते रहे हैं।

दरअसल इन वर्षों में आज़ाद समर्थक इस कदर आज़ाद पर निर्भर रहे हैं कि उन्होंने आज़ाद की तरह ही राजनीति करने की आदत पड़ चुकी है । बहुत से आज़ाद समर्थक नेता आज़ाद की तरह ही उठना-बैठना व कपड़े तक पहनना तक शुरू कर चुके हैं । अधिकतर आज़ाद समर्थक नेताओं की दुनिया आज़ाद से शुरू होती रही है और आज़ाद पर ही आकर खत्म होती रही है ।

आज़ाद पर इन नेताओं की निर्भरता ने एक निरक्षर, कमजोर, और ‘बैसाखियों’ के सहारे चलने वाले नेताओं की फौज तैयार कर डाली है । इस वजह से कई वर्षों से लगातार प्रदेश कांग्रेस का नुक्सान हो रहा था और एक परिपक्व, आत्मविश्वास से भरा नेतृत्व प्रदेश कांग्रेस में उभर नही सका। प्रदेश कांग्रेस में नए व योग्य लोगों को कभी भी गुलाम नबी आज़ाद ने कभी आगे नही आने दिया। यही शायद आज़ाद का मकसद भी था ।

जम्मू-कश्मीर कांग्रेस में आज़ाद के इस एकछत्र ‘साम्राज्य’ का भले ही आज़ाद को खूब फ़ायदा मिला हो मगर प्रदेश में कांग्रेस को बहुत नुकसान पहुंचा । आज़ाद ने हमेशा ऐसे नेताओं को प्रोत्साहित किया जिन पर भ्रष्टाचार सहित कई गंभीर आरोप लगते रहे हैं। किसी भी ज़मीनी और पढ़े-लिखे नेता को आगे आने का मौका नही दिया। जम्मू बार एसोसिएशन के पूर्व प्रधान स्वर्गीय भूपेंद्र सिंह सलाथिया जैसे लोकप्रिय, जुझारू व पढ़े लिखे लोगों को किस तरह से आज़ाद ने मझधार में छोड़ दिया उसे जम्मू-कश्मीर में सब जानते हैं। आज़ाद ने कभी चाहा ही नही कि जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस ताकतवर बने।

दरअसल जैसे-जैसे गुलाम नबी आज़ाद का दिल्ली में कद बढ़ता गया वैसे-वैसे जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस कमज़ोर होती चली गई । प्रदेश में कांग्रेस के कमज़ोर होने में ही आज़ाद के अपने हित छुपे हुए थे । जितना अधिक प्रदेश कांग्रेस में गुटबाजी का ज़ोर रहता उतना ही दिल्ली में आज़ाद का रौब व रुतबा बढ़ता जाता। एक तरह से कांग्रेस आलाकमान को यह पक्का यकीन दिला दिया गया था कि बिना आज़ाद के जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस चल ही नही सकती। कई सालों से गुलाम नबी आज़ाद बड़ी चलाकी से यह खेल खेलते रहे ताकि जम्मू-कश्मीर को लेकर कांग्रेस आलाकमान उन्हीं पर ही निर्भर रहे।

सभी अध्यक्ष हुए आज़ाद का शिकार

उल्लेखनीय है कि कांग्रेस आलाकमान ने जिस किसी को भी जम्मू-कश्मीर प्रदेश कांग्रेस की बागडोर सौंपी आज़ाद ने बड़ी चालाकी से अपने समर्थक गुट द्वारा उसका विरोध करवा दिया। बीते लगभग तीन दशकों के दौरान जम्मू-कश्मीर प्रदेश कांग्रेस के जितने भी अध्यक्ष बने सबको आज़ाद से कोई मदद नही मिल सकी। आज़ाद द्वारा ऐसे हालात बनाए जाते रहे कि प्रत्येक कांग्रेस अध्यक्ष पर ‘असफल’ रहने की मुहर लगती चली गई ।

यहां तक कि जब-जब कांग्रेस आलाकमान ने आपसी लड़ाई समाप्त करने के उद्देश्य से आज़ाद के ही कट्टर समर्थक नेताओं को प्रदेश कांग्रेस का जिम्मा सौंपा तब-तब आज़ाद ने अपना असहयोग बनाए रखा और अपने गुट की मदद से विरोध करवाना भी जारी रखा। आज़ाद के कट्टर समर्थक रहे पीरज़ादा महोम्मद सैयद और स्वर्गीय चौधरी महोम्मद असलम  इसके बड़े उदाहरण रहे हैं। आज़ाद के करीबी होने के बावजूद दोनों के अध्यक्ष का कार्यकाल आज़ाद खेमे के कारण ही सफल नही हो सका ।

मुफ्ती महोम्मद सईद, गुलाम रसूल कार, महोम्मद शफी कुरैशी, चौधरी महोम्मद असलम, पीरज़ादा महोम्मद सईद, सैफुद्दीन सोज़ और गुलाम महोम्मद मीर के रूप में प्रदेश अध्यक्षों की एक लंबी सूची है जो गुलाम नबी आज़ाद की राजनीति का शिकार हुए। ताज़ा मामला हाल ही में प्रदेश अध्यक्ष बने विकार रसूल वानी का है। आज़ाद का करीबी होने के बावजूद आज़ाद ने ऐसे संकेत दिए जैसे कि वे वानी को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने से खुश नही हैं। आज़ाद ने वानी की नियुक्ति के फौरन बाद नाराज़गी में पहले प्रचार समिति से त्यागपत्र दिया व बाद पार्टी ही छोड़ दी ।

कुछ हद तक अपने-अपने कार्यकाल के दौरान पूर्व प्रदेश अध्यक्ष स्वर्गीय गुलाम रसूल कार, स्वर्गीय महोम्मद शफी कुरैशी और सैफुद्दीन सोज़ ने आज़ाद का मुकाबला करने की कोशिश की मगर उनके लिए भी यह सब करना कभी आसान नही रहा। गुलाम रसूल कार और मंगत राम शर्मा की जोड़ी ने नब्बे के दशक में आज़ाद का खुलकर विरोध किया और नए व ज़मीनी लोगों को कांग्रेस से जोड़ने की कोशिश की । कुछ समय के लिए बाद में सैफुद्दीन सोज़ ने भी नए लोगों को प्रदेश कांग्रेस में आगे लाने का प्रयास किया और उन्हें मौके भी दिए । मगर आज़ाद के बेवजह के हस्तक्षेप के कारण बाकी अध्यक्ष ऐसा नही कर पाए। यही वजह है कि प्रदेश कांग्रेस में नब्बे के दशक के नेता ही आज भी सक्रिय हैं ।

कई बड़े सवाल हैं जिनका जवाब शायद ही कभी आज़ाद दें । आज कांग्रेस नेतृत्व और राहुल गांधी की कार्यशैली की नुक्ताचीनी करने वाले आज़ाद ने अपने गृह प्रदेश में कांग्रेस के भीतर एक अलग गुट क्यों बनाए रखा और किसी भी प्रदेश अध्यक्ष को अपना समर्थन क्यों नही दिया ? क्या 1990 से लेकर 2022 तक बने सभी प्रदेशाध्यक्ष नाकाबिल थे और सिर्फ आज़ाद ही सर्वगुण संपन्न थे ? आज़ाद अपनी पुरानी पार्टी कांग्रेस को मंथन करने की सलाह देते हैं मगर ज़रूरत उन्हें खुद को लेकर आत्ममंथन करने की ज़्यादा है।

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