Kalidas Samman state honor प्रतिभाओं को राजकीय सम्मान
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प्रतिभाओं को राजकीय सम्मान

भोपाल। यह इत्तफाक है कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में भारत रंग महोत्सव के सिलसिले में देश के दो दर्जन वरिष्ठ रंगकर्मी व रंग निदेशक, लेखक एकत्र थे और हम लोगों के बीच मध्यप्रदेश सरकार के कालिदास सम्मान की चर्चा हो रही थी, ठीक उसी समय प्रदेश के प्रतिष्ठित सम्मानों की घोषणा भोपाल में हुई। सब इस बात पर खुश थे कि इस साल का कालिदास सम्मान राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व निदेशक और देश के ख्यातिनाम रंग निदेशक वामन केन्द्रे को प्रदान किया गया। सम्मान और पुरस्कार की पूरी सूची हमारे सामने थी और मेरे कमरे में चर्चा कर रहे नौजवान रंगकर्मियों को यह संतोष था कि मोटे तौर पर सही प्रतिभाओं को सम्मानित किया गया। ऐसा तो हमेशा ही होता है कि इन्हंे भी सम्मानित किया जाना था जैसी आवाजें उठे लेकिन इस बार की सम्मान सूची में इक्का-दुक्का नामों पर आपत्ति नहीं आश्चर्य जरूर व्यक्त किया गया परन्तु नामों के चयन पर संतोष ही व्यक्त किया गया।

चाहे वह मध्यप्रदेश शासन का सम्मान हो या किसी अन्य राज्य का या संगीत नाटक अकादमी जैसी संस्थाओं का, सरकारी सम्मानों के प्रति सृजनकर्मियों में उत्साह का भाव हमेशा देखा जाता रहा है जो इन पुरस्कारों या सम्मानों की प्रतिष्ठा का परिचायक है। एक वर्ग जरूर ऐसे सम्मानों से परहेज की बात करता है लेकिन इन सम्मानों की प्रतिष्ठा पर उन्हें भी आपत्ति नहीं रही है। मध्यप्रदेश शासन के कालिदास सम्मान का विशेष स्थान देखा गया है और रंगमंच की दुनिया में इस सम्मान पाने की आकांक्षा प्रायः हर रंग निदेशक में देखी गई है।

मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा जिन लोगों को सम्मान प्रदान किया गया है उन्हें देखकर यह कहा जा सकता है कि कुछ अपवादों को छोड़कर राजनीतिक पक्षधरता के आधार पर इन नामों का चयन नहीं किया गया है। साथ ही अपात्र लोगों को भी सम्मानों की सूची से दूर रखा गया है। इसके लिये सम्मानों के लिये गठित चयन समिति तथा उन्हें नियंत्रित करने वाली सत्ता को साधुवाद दिया जाना चाहिए। जहां तक राजनीतिक पक्षधरता या किसी विचारधारा के साथ जुड़े होने का सवाल है तो मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं रही। आग्रह सिर्फ यही रहा कि गुणवत्ता से किसी तरह का समझौता राजनीतिक पक्षधरता के नाम पर न किया जाये।

आजादी के बाद से बीसवी सदी की समाप्ति तक थोड़े अंतराल को छोड़ दे ंतो एक ही राजनीतिक दल की सरकारें केन्द्र व राज्यों में रही है और उसी विचारधारा से जुड़े लोग सांस्कृतिक संस्थाओं में नियुक्त होते रहे व सम्मानों के भी हकदार माने गये। 21वीं सदी में समीकरण बदले और छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश में 15 बरस तक गैर कांग्रेसी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ समर्थित भारतीय जनता पार्टी की सरकारें रही। लिहाजा सांस्कृतिक संस्थाओं में नियुक्तियों तथा सम्मानों की हकदारी की पात्रता भी बदलती दिखी। संघ समर्थकों तर्क होता था कि जब कांग्रेस की सरकारों में उनकी विचारधारा वालों को संरक्षण प्रोत्साहन मिलता रहा तो अब हमारी सरकारों में हमारी विचारधारा के लोगों को सम्मानित पुरस्कृत करने व सांस्कृतिक संस्थाओं में उनकी भागीदारी पर आपत्ति क्यों की जाना चाहिए।

उनका तर्क सही हो सकता है लेकिन केवल विचारधारा के आधार पर संस्कृति के क्षेत्र में गुणवत्ता और सृजनशीलता को तो नहीं नकारा जा सकता। चाहे वह कांग्रेस की सत्ता हो, या भाजपा की या किसी और विचारधारा वाली सरकार हो, उसकी आलोचना इस आधार पर नहीं की जानी जाहिए कि उसने अपने पक्षधर लोगों को संस्कृति के क्षेत्र में मौका दिया। अलबत्ता आलोचना इस बात की होनी चाहिए कि जब राजनीतिक पक्षधरता के नाम पर अपात्रों को संरक्षण प्रोत्साहन दिया जाये। राज्य के संस्कृति विभाग के सम्मानों की सूची यह आष्वस्त करने वाली लगती है कि अपात्रों को इसमें स्थान नहीं मिल पाया है। प्रादेशिक शिखर सम्मान की श्रेणी में अधिकांश नाम राजधानी भोपाल से होना जरूर खटकता है, नामों के कारण नहीं एक ही स्थान के कारण। यदि इसमें प्रदेश के अन्य शहरों की प्रतिभाओं को स्थान मिलता तो और अच्छा लगता।

इस वर्ष के सम्मान घोषित होने के पहले सम्मानों को लेकर यह खबर फैल गई कि दो अलग-अलग सम्मानों के लिये गठित चयन समिति के सदस्यों ने एक दूसरे का नाम दो सम्मानों के लिये चुन लिया। इस संबंध मंे अधिकृत रूप से कोई जानकारी नहीं आई लेकिन यह अपुष्ट खबर अच्छा खासा विवाद पैदा करने वाला बन गया था। यह अच्छा हुआ कि जब सम्मानों की अधिकृत घोषणा हुई तो वह अपुष्ट खबर अफवाह साबित हुई। 

सम्मानों की घोषणा के साथ बधाईयों का दौर चल पड़ा। किशोर कुमार सम्मान से सम्मानित मशहूर पटकथा लेखक अशोक मिश्र को हम सबने बधाईयां दे डाली और उन्होंने खुशी-खुशी बधाईयां स्वीकार भी लिया। दो दिन बाद सुबह एक अखबार में खबर छपी कि सम्मान पाने अशोक मिश्र वे नहीं बल्कि कोई अनाम सा कामेडियन है। मैं भौंचक रहा गया। इसी बीच अशोक का फोन आया, यह जानने के लिये कि माजरा क्या हैं और क्या वह अशोक मिश्र मैं नहीं हूं क्या? अखबार वाली जानकारी उस तक भी पहुंच रही होगी। मैंने संबंधित अधिकारियों से वास्तविकता जानी तो पता चला कि कामेडियन वाली जानकारी भी वैसी ही थी जैसी जूरी के सदस्यों द्वारा एक दूसरे के नाम चयन की। जब मैंने यह तथ्य अशोक को बताया तब स्थितियां साफ हुई कि ऐसा कुछ भी वास्तव में नहीं हुआ जो संस्कृति विभाग के सम्मानों की गरिमा को आघात पहुंचाये।

सरकार के सम्मानों व पुरस्कारों का सिलसिला लगभग आधी सदी से चला आ रहा है। यह सिलसिला जब से शुरू हुआ साल दर साल इसमें विस्तार ही होता गया। फिर चाहे वह सरकार किसी पार्टी की हो या कोई भी मुख्यमंत्री रहा हो, हरेक ने नये-नये नाम जोड़कर सम्मान की सूची को लंबा ही किया। बावजूद इसके यह शिकायत हमेशा ही बनी रहती है कि बहुत से  नाम सम्मान सूची में आने से रह गये जिन्हें सम्मान सूची में स्थान मिलना था। ऐसी स्थिति में इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि क्या कोई सम्मान ऐसा है जिसे अब भी जारी रखना जरूरी है। यदि नहीं तो उसे बंद करने में सरकारों को संकोच नहीं करना चाहिए। यह भी विचार किया जाना चाहिए कि जिस उद्देश्य से इन सम्मानों की स्थापना हुई, क्या वे उस उद्देश्य को पूरा कर भी रहे हैं या वे महज परंपरा बन कर रह गये हैं। यानि जिन क्षेत्रों में ये सम्मान दिये जा रहे हैं वे उस विधा की रचनात्मकता को और समृद्ध करने में कितना योगदान दे रहे हैं।

इस बात पर भी विचार कर पहल करने की जरूरत है कि प्रदेश में संस्कृति के विभिन्न विधाओं में लम्बे समय तक सक्रिय रहने वाले सृजनकर्मियों को भी किसी तरह सम्मानित किया जाये।

राजकीय सम्मान तो घोषित हो गये लेकिन इस बात को लेकर सम्मान पाने वालों में यह स्पष्ट नहीं है कि यह सम्मान उन्हें मिलेगा कब। इसका कारण भी है। दो साल पहले कांग्रेस सरकार ने 2-3 सालों के सम्मानों की घोषणा सरकार गिरने के कुछ पहले ही की। नई सरकार ने कांग्रेस सरकार की सम्मानों की सूची को न तो निरस्त किया और न उसमें कोई बदलाव किया लेकिन सम्मान वितरण समारोह नहीं हो सका। कोरोना महामारी के चलते इस साल दो सालों के सम्मानों की घोषणा तो कर दी लेकिन अभी तक समारोह की तिथि तय नहीं। अब तक होता यह रहा है कि अलग-अलग अवसरों पर इन सम्मानों से सम्मानित किया जाता है। बेहतर यह हो कि सभी सम्मानों को किसी एक बड़े समारोह में सम्मानितों को प्रदान किया जाये और इसके लिये सबसे अच्छा दिन राज्य का स्थापना दिवस हो सकता है। स्थापना दिवस के अवसर पर संस्कृति से संबंधित सम्मानों का अलंकरण समारोह आयोजित किया जाये और फिल्मी कलाकारों के प्रदर्शन के बजाय सम्मानित कलाकारों के कला प्रदर्शन से स्थापना दिवस को गरिमामय बनाया जा सकता है।

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