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किसानों के अलावा अपने दल के लोगों को भी नहीं समझा पाये मोदी जी…?

Chronology return agricultural laws

भोपाल। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने राष्ट्र के नाम संदेश में स्वीकार किया था की वे क्रशि कानूनों के फायदे किसानो को नहीं समझा पाये। परंतु उनके मंत्री और साथी भी नहीं समझ सके ! क्यूंकि चाहे राज्यपाल कालराज मिश्रा हो या प्रदेशों के मंत्री भी बयान दे रहे हैं कि उचित समय पर ये कानून वापस लाये जाएँगे ? अब सत्तारूढ़ पार्टी के मंत्री और संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति भी इस बारे में भ्रम फैला रहे हैं। जिससे आंदोलनकारी किसान प्रधानमंत्री के वचनों को सत्य नहीं मान रहे। अगर साल भर तक चले किसान आंदोलन के लोग सार्वजनिक रूप से अविश्वासनीय बता रहे हैं। उनके अनुसार राज्यों में होने वाले विधानसभा के चुनावों के मद्देनज़र किसान वर्ग को संतुष्ट करना चाह रहे हैं। उनका कहना हैं कि फसलों के न्यूनतम मूल्य का कानूनी निर्धारण और आंदोलन के दौरान शहीद हुए 700 किसानों को मुआवजा और आंदोलनकारियों के खिलाफ पुलिस द्वारा दर्ज मुकदमे भी वापस करना उनकी मांगों में हैं। जिसे केंद्र सरकार को राज्यों में अपनी सरकारों से मानने का निर्देश देना पड़ेगा। तभी शायद किसान अपने घरों को वापस जाएँ। kisan andolan farmers protest

2. प्रधानमंत्री के वादे पर भरोसा न करने का एक कारण और है। वह हैं कि जिस ताबड़तोड़ तरीके से इसे पारित करवाने में स्वर्गीय अरुण जेटली ने काम किया था, उसी से सरकार की नीयत पर संदेह हुआ था। विपक्ष की बारंबार मांग पर की इसे सिलैक्ट कमेटी में विचार करने भेजा जाये, को सरकार ने ठुकरा दिया। इसे वित्त विधेयक की तरह नहीं वरन साधारण विधेयक की भांति पारित कराया था। जो की संसदीय नियमों के विपरीत था। लोकसभा में बीजेपी के नेत्रत्व वाले बहुमत ने नियमों को तोड़ कर इस विधेयक को संकरी गली से पारित कर दिया था ! राज्यसभा में भी बहुमत नहीं होते हुए सरकारी पार्टी ने तिकड़म लगा कर वहां से पारित कराया! आखिर क्यंू इतनी जल्दबाज़ी? बाद में यह तथ्य सामने आया कि गौतम अदानी की कंपनियों को अधिकार और सुविधा देने के लिए ही यह सब प्रपंच सरकार ने किया, क्यूंकि मोदी जी की और अदानी जी के गहरे संबंधों की जानकारी समस्त देश को हैं। मोदी समर्थक इसे देश के लिए वरदान मानते हैं जबकि मोदी विरोधी इसे सत्तारूढ़ दल की दुधारु गाय मानते हैं।

3. इसीलिए जब हरियाणा में किसानों को इस विध्यक की शक्तियों के बारे में बताया गया, तब किसान चेते। उन्होंने जमीन जाने के भय से इस कानून का विरोध करना शुरू किया। बड़ी संख्या में पंजाब – हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसानों ने भारतीय किसान यूनियन सहित तेरह से भी ज्यादा किसान संगठनों ने दिल्ली में डेरा डाला। उसके बाद उनकी जद्दोजहद चलती रही और साल भर से कुछ कम दिनों तक तक यह आंदोलन चला। तब प्रधानमंत्री जी को किसान आंदोलन की सुध आई। इस दौरान 700 से अधिक इंसान अपने घरों से दूर अंतिम साँस लेने पर मजबूर हुए। इस दौरान मोदी जी के शोक संदेश सैकड़ों लोगो की प्राकृतिक मौत पर शोक संदेश भेजते रहे, परंतु इन किसानों की मौत पर केंद्र सरकार अथवा उसके मंत्रियों ने शोक व्यक्त करने की ज़हमत नहीं उठाई। फिर कौन सी ऐसी घटना घटी जिसने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राष्ट्र के नाम माफीनामा देना पड़ा ! परंतु न तो किसान और ना ही जनता समझ पायी कि इतना बड़ा अबाउट टर्न किस कारण हुआ ? यह कहना कि मोदी जी सदाशयता हैं ? जो कि उनके व्यक्तित्व से नहीं झलकती। फिर लोगों को समझ में आया कि उप चुनावों में बीजेपी की पराजय और उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र ही यह फैसले हैं ! पेट्रोल की कीमतों में कमी – और खेती से जुड़े तीनों कानून को वापस लिया गया हैं। इसलिए यह वक़्त की मांग ही थी जिसने मोदी जी को झुकने पर मजबूर कर दिया।

4. किसानों की मांग के बाद ताबड़तोड़ तरीके से श्रम कानूनों में संशोधन अथवा यह कहें कि प्रस्तावित विधेयक काम की घंटे में वृद्धि – नौकरी पर रखने और निकालने की मालिक को अबाध शक्ति देना एवं मुआवजा निर्धारण के आधार में नियोक्ता को खुली छूट देना आदि। मोदी जी और उनकी पार्टी को अब यह एहसास हो गया कि साड़े सात साल में उनकी तोड़फोड़ की और दलबदल की राजनीति से ज्यादा लोक कल्याण करना होता हैं। परंतु अमेरिका के विवादास्पद राष्ट्रपति ट्रम्प की भांति इनके समर्थक भी रिटायर अफसर और बेरोजगार युवक ही हैं। जिन्हें राजनीति के नाम पर या तो हिन्दू और मुसलमान का विवाद करना और मुसलमानों को नफरत का शिकार करना। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जो 32 संगठनों की आत्मा हैं, जिसमें भारतीय जनता पार्टी भी एक हैं। जो विगत के इतिहास से टुकड़े – टुकड़े में निकाल कर उन्हें अपनी तरह से परिभाषित करते हैं। और मूल उद्देश्य होता है देश की वर्तमान समस्याओं से जनता का ध्यान भटकाना।

5. उपरोक्त कारणों से आंदोलनकारी किसान अभी भी दिल्ली मे जमे रहेंगे, ऐसी उम्मीद हैं। यह भी सुना जा रहा हैं कि श्रमिक यूनियन से हाथ मिलकर किसान आंदोलन अब आम आदमी की समस्याओं के हल निकालने की कोशिस कर सकते हैं। जिस प्रकार मोदी जी ने पेट्रोल की कीमतों में कमी की फिर सरकार केआर रिजेर्व कोटा से तेल निकाल कर बाजार में डालने की भी घोषणा की हैं। उससे यह पक्का हो चला हैं कि विधानसभा चुनावों की घंटी सत्तारूढ़ दल को परेशान किए हैं। लेकिन केंद्र सरकार को लोक कल्याण के लिए अभी कई फैसले लेने होंगे अन्यथा मोदी जी की कुर्सी भी हिल सकती हैं।

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