political leaders change the party अब दल बदल बेहिचक
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अब दल बदल बेहिचक

Confusion over defection in Goa

भोपाल। वह जमाना अब बीत गया जब दल बदलने वाले पर गिरगिट की तरह रंग बदलने का तंज कसा जाता था अवसरवादी कहा जाता था अब तो दल बदल कर यदि विधायक सांसद या मंत्री बन गया तो फिर वह नेता सफल माना जाता है चुनावी मौसम मैं आया राम गया राम की स्थिति अब आम हो गई है इस दल बदलने उन लोगों के लिए टिकट के विकल्प भी उपलब्ध करा दिए जिन्हें उनकी पार्टी में टिकट मिलना संभव दिखाई नहीं दे रहा है।

दरअसल परिवर्तन चहूओर आता है समाज में व्यवस्था में परिवर्तन आए हैं तो राजनीति में भी ऐसे परिवर्तन आए हैं जिनकी पहले कभी राजनीतिज्ञ कल्पना भी नहीं कर सकते थे और अब आगे और भी परिवर्तन देखने को मिलेंगे क्योंकि राजनीति की गाड़ी अब सिद्धांतों की बजाए सफलता की पटरी पर दौड़ रही है फिर साम दाम दंड भेद से जीत हासिल करना राजनीति में सफलता का पर्याय होता जा रहा है यही कारण है कि जब जब चुनावी मौसम आता है दलबदल की शुक्रिया तेज हो जाती है जैसा की अभी उत्तर प्रदेश में दलबदल प्रतिदिन हो रहा है यह बात और है कि अभी तक भाजपा के पक्ष में दलबदल होता रहा है लेकिन इस बार भाजपा छोड़कर जाने वालों में मंत्री और विधायकों की लाइन लग गई है स्वामी प्रसाद मौर्य से हुई इस्तीफो की शुरुआत थमने का नाम नहीं ले रही और संभावनाएं जताई जा रही है कि लगभग 13 विधायक इस्तीफा देंगे भले ही आज यह इस्तीफे भाजपा के लिए झटके कहे जा रहे हो लेकिन इस तरह के दल बदल की शुरुआत भी उत्तर प्रदेश में भाजपा ने 2017 के चुनाव में की थी जब उसके 312 विधायकों में से 54 विधायक दूसरे दलों से आकर जीते थे तब पार्टी ने लगभग 70 दलबदलू को टिकट दिया था इसी तरह पश्चिम बंगाल में भी दलबदल करने वालों को भाजपा ने टिकट दिए थे हालांकि उनमें से अधिकांश चुनाव हार गए थे।

बहरहाल देश के विभिन्न हिस्सों में हो रहे दलबदल का असर मध्य प्रदेश की राजनीति में भी परवान चढ़ा जब ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ 22 विधायकों ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा जिनमें छह मंत्री भी थे और सत्ता परिवर्तन करा दिया इसके बाद हुए उपचुनाव में अधिकांश दलबदल करने वाले नेता ना केवल चुनाव जीते वरन् भारी बहुमत से जीते इसी तरह जब 4 सीटों पर उपचुनाव हुए उसमें से जोबट में कांग्रेश से सुलोचना रावत को भाजपा मैं शामिल कर उम्मीदवार बनाया और वे चुनाव जीती इसी तरह पृथ्वीपुर में दो हजार अट्ठारह में सपा के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ चुके डॉक्टर शिशुपाल को भाजपा ने प्रत्याशी बनाया और वह भी चुनाव जीत गए।

इसके बाद अब प्रदेश में दबी जबान से वे सब नेता अभी से कहने लगे हैं कि यदि पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो फिर दल बदल कर चुनाव लड़ने में भी कोई संकोच नहीं है ऐसे नेता केवल बात नहीं कर रहे हैं बल्कि प्रतिद्वंदी दल में अपनी संभावनाएं अभी से तलाशने लगे हैं और यदि उत्तर प्रदेश में दलबदल करने वाले नेताओं को इस बार सफलता मिल गई तो फिर 2023 में मध्यप्रदेश में विधानसभा के आम चुनाव के दौरान बेहिचक बेधड़क दलबदल देखने को मिलेगा जो मध्य प्रदेश की राजनीति में नई शुरुआत माना जाएगा और यह दलबदल देर सवेर प्रदेश में तीसरे विकल्प की संभावनाओं को भी जन्म देगा उसके लिए अन्य परिस्थितियां भी धीरे धीरे बनने लगी है जातीय गठबंधन ओं का उभार अभी दिखाई देने लगा है जयस और भीम आर्मी जैसे संगठन गठबंधन करके तीसरे विकल्प की तैयारी कर रहे हैं तो पिछड़ा वर्ग भी हुंकार भर रहा है 2018 के चुनाव में सपाक्स ने बहुत कम समय में ही अपने अस्तित्व का भान करा दिया था।

कुल मिलाकर देश के राजनीतिक वातावरण में आ रहे बदलाव का असर मध्य प्रदेश की राजनीति पर भी पडने लगा है अभी तक भले ही दो दलीय ध्रुवीकरण मतदाताओं का भाजपा और कांग्रेस के बीच में होता आया है लेकिन अब जिस तरह की सुगबुगाहट शुरू हो गई है और दलबदल वालों का जलवा और रुतबा दिखाई दे रहा है उससे अब प्रदेश में भी बेहिचक दल बदल के लिए नेता तैयार बैठे हैं बस उन्हें जीतने की उम्मीद सामने वाले दल में नजर आनी चाहिएI

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