height of the sensex सेंसेक्स की ऊंचाई सिर्फ हजार कंपनियों की है -देश की नहीं !
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सेंसेक्स की ऊंचाई सिर्फ हजार कंपनियों की है- देश की नहीं !

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यह वैसा ही हैं जैसा की देश की गरीबी -बेरोजगारी और भूख तथा बीमारी और दरिद्रता के अनचाहे पहाड़ पर सेंसेक्स का चाँदी का वर्क  लगा कर सब कुछ सुंदर ही सुंदर दिखया जाये| अखबार हो या की खबरिया चैनल सभी स्टॉक एक्स्चेंज के साठ हज़ार के मंसब पर पहुचने को देश के विकास का संकेत और आर्थिक उन्नति का आधार बताते नहीं थकते| पर ऐसा हैं नहीं| स्टॉक एक्सचेंज केवल देश की दस हज़ार उन कंपनियाओ की नब्ज़ हैं जो उनके यानहा रजिस्टेरेड हैं| इनकी स्म्रधी और रईसी केवल लाख लोगो तक ही पाहुचती हैं| देश के 125 करोड़ की आबादी का व्यापारियो के इस खेल से कोई ना मतलब हैं और ना ही कोई असर हैं| इसको यू समझाए की जिनके पास इतनी बचत हैं की वे अपनी रोजर्रा की ज़िंदगी की जरूरतों और बच्चो की अध्ययन और स्वास्थ्य संबंधी आकस्मिक जरूरतों के लिए पर्याप्त वीटिया प्रबंध हैं – ऐसे ही लोग स्टॉक एक्सचेंज के शेयर मार्केट के खेल में शामिल होते हैं| अब ऐसे लोग आपके अगल बगल कितने मिलेंगे ? जरा खोज कीजिये ! जैसे शतरंज का खेल -या घुड़दौड़ में दांव लगाना उन लोगो का काम हैं , जिनहे घर चलाने के लिए काम करने की जरूरत नहीं हैं| height of the sensex

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जिस देश में 30 प्रतिशत से ज्यादा आबादी गरीबी की रेखा के नीचे रहती हो और जिस देश को अंतर्राष्ट्रीय हाँगर इंडेक्स में 101 नंबर पर स्थान हो उस देश की आर्थिक हैसियत को सेंसेक्स से नापना स्त्ताधारियों और उनके उद्योगपतियों का शगल हो सकता हैं| जो समाज में मौजूद आर्थिक विषमता की खाई को और बढ़ाता हैं| कोविद काल में जब देश के सभी वर्गो की आय और आर्थिक स्थ्ति खराब हुई थी —तब सरकार चलाने वाले दो घरानो अंबानी और अदानी की संपती में छलांग लगाती हुई बढ़ोतरी हुई| ऐसा सेंसेक्स का बाज़ार बताता हैं !

अब त्योहार के अवसर पर देश में बाज़ार के क्या हाल हैं < यह पता करना मुश्किल नहीं हैं| कोविद काल से ज्यादा जींसों की मंहगाई ने 125 करोड़ लोगो को मार रखा हैं| खाने – पीने की वस्तुओ के दाम इस समय अतिहासिक रूप से सर्वाधिक ऊंचे पायदान पर हैं| खनिज तेल यानि पेट्रोल और डीजल के भाव तो रोज ऐसे बदते हैं –जैसे भागवत की कथा करने वाले पंडित जी यजमान से नवग्रह की पुजा कराते वक़्त हर स्थान पर सवा -सवा रुपया करके काफी जेब खाली करा लेते हैं| वैसे 60 रुपये प्रति लीटर जब पेट्रोल का दाम था तब कुछ पैसो की बदोतरी भी आम आदमी की शिकायत का कारण होती थी| परंतु आज सैकडा पार पेट्रोल और डीजल प्रति लीटर का भाव होने पर देश की आबादी की बेबसी ही हैं| ना कोई विरोध और ना कोई आंदोलन —लगता हैं जनता अपने कर्मो का फल भोगने के लिए तैयार है !

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इस स्टॉक एक्सचेंज का खेल वैसे ही है जैसे सरकारो के विकास के बड़े – बड़े विज्ञापन , जिनमे नेता या अधिकारी भविष्य की उन्नति का दावा करते हैं , परंतु वर्तमान दुर्व्यसथा की हालत को बताने की हिम्मत नहीं दिखा पाते| उदाहरण के लिए प्रधान मंत्री मोदी की ग्रामीण छेत्रों में उज्जवल्ला योजना के तहत पहली बार गॅस की भरी टंकी या सिलेन्डर और चूल्हा बंता गया था| आज साल भर बाद वे ग्रामीण फिर कांदा और जलावन की लकड़ी से चूल्हा जला रहे हैं| क्यूंकी 800 रुपये का गॅस सिलेन्डर भरने की हैसियत इन किसानो की नहीं हैं !!! परंतु पेट्रोल पम्पो पर मोदी ज की इस योजना का गुणगान वनहा लगे होर्डिंग पर जरूर हैं| जैसे उज्ज्वला का सिलेन्डर गावों में जितना सफल हैं  उतना ही सेंसेक्स से देश का विकास हैं| अर्थात दोनों ही सत्य या हक़ीक़त नहीं हैं|

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2- दो घरानो का देश के व्यापारिक जगत में एकाधिकार

देश के दो औद्योगिक घराने अब व्यापार के छेत्र में एकाधिकार करने की ओर अग्रसर हैं| नेहरू – इन्दिरा काल में एकाधिकार को रोकने के लिए कानुना था , जिससे बाज़ार में स्वास्थ्य प्रतियोगिता निश्चित की जाती थी| उन औद्योगिक घरानो को किसी नए उद्योग अथवा व्यापार शुरू करने के पूर्व केंद्र से अनुज्ञा लेने पड़ती थी| इस प्रतिबंध का उद्देश्य यह था की बाज़ार में स्वास्थ्य प्रतियोगिता बनी रहे और जो बड़े है -वे बड़े उद्योगो में निवेश करे ना की माध्यम और छोटे उद्योगो और व्यापार में घुस कर वनहा के व्यापारियो को गलकाटू प्रतिशपरधा में फंसा दे|

परंतु नरसिम्हा राव के काल में विदेशी निवेश को खुली छूट देने और एकाधिकार को प्रतिबंधित करने के नियमो इतना शिथिल  किया गया की उद्योग की बड़ी पूंजी से छोटे -छोटे व्यापार करने वाले लोगो को या तो खरीद लिया गया अथवा बाजार में नुकसान सहकार भी अपना माल या सेवाए बेच कए प्रतिद्व्न्दी को बाहर कर दिया| दूरसंचार के छेत्र की सरकारी कंपनी को सरकार ने जानबूझ कर कमजोर किया  परिणाम स्वरूप बीएसएनएल को प्रतियोगिता में भाग लेने से रोकने का शासकीय आदेश दिया गया|

आज हम देख रहे हैं की अंबानी खुदरा पंसारी की दुकान यानि की बाज़ार में व्यापार करे| अब वे जेव्व्लरी हो या सोने के गहने हो अथवा फैशन के कपड़े हो सभी मौजूदा कंपनियो को खरीदते जा रहे हैं| अभी अभी ही उन्होए दो फैशन की बड़ी कंपनियो के शेयर खरीद कर उनकी आपसी प्रतिस्पर्धा को समाप्त कर दिया|

फलस्वरूप अब उनका इस व्यापार पर एकाधिकार  हो गया| वैसे अंबानी घराने की लालसा को सरकार नियंत्रित करे– ऐसा तो कोई सोच भी नहीं सकता| क्यूंकी टेक्सटाइल से शुरू हुए इस घराने अब खनिज तेल के धंधे में सऊदी अरब की कंपनी आरामको  को शामिल कर के भारत सरकार की राष्ट्रीय कंपनियो को खुली चुनौती दे दी हैं| वैसे ही मोदी सरकार नवरतन  यानि की सार्वजनिक छेत्र के संस्थानो को सफेद हाथी बताते हुए अथवा सरकार को व्यापार नहीं करना चाहिए के सिधान्त को बघारते हुए , मोदी सरकार बन्दरगाह और हवाई अड्डे तो अदानी घराने को सौंप ही चुकी हैं| अब वह दिन दूर नहीं जब  भारतीय  कंपनीया सिर्फ अंबानी और अदानी के नाम से जानी जाएंगी| यह भारत का अंबानी और अदानी करण होगा , जो अत्यंत दुर्भ्ग्यपूर्ण होगा| क्यूंकी व्यापार के लिए सरकार गिरवी हो जाएगी|

लेखक: विजय तिवारी 

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