Bangladesh Independence की सच्ची कहानी : वह सगत सिंह राठौड़ थे जिनकी वजह से भी पूर्वी पाकिस्तान आज बांग्लादेश है

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जयपुर | मोदीजी एक दिन पहले बोल गए कि बांग्लादेश की स्वाधीनता में उनका भी किंचित योगदान है। रहा होगा, बहुतों का रहा है। इसीलिए तो इंदिरा गांधी ने दुनिया के नक्शे से पूर्वी पाकिस्तान का निशान और नाम दोनों मिटा दिया। नया राष्ट्र मिला बांग्लादेश, लेकिन एक कहानी लेफ्टीनेंट जनरल सगत सिंह राठौड़ की भी है, जिनकी वजह से भारतीय सेना का जज्बा पूर्वी पाकिस्तान में घुसकर वहां बांग्लादेश नाम के एक नए मुल्क की स्थापना के लिए प्रभावी हो सका। परन्तु हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सम्बोधन में सगत सिंह अन्य में सिमटकर रह गए।

पीएम मोदी द्वारा सगतसिंह का नाम सायास या अनायास भुला दिया जाना कोई नई बात नहीं है, पहले की सरकारों ने भी इस महान कमांडर को उनके महान कामों के बदले भूल जाना ही बेहतर समझा। आपकी जानकारी में रहे कि भारत की ओर से जनरल सगत सिंह बांग्लादेश के पहले प्रशासक थे। 1970 में उनको परम विशिष्ट सेवा मैडल, 1972  मिला, लेकिन देशहित में सीनियर्स की जिद भरी मांगों की नाफरमानी की कीमत सगत को हमेशा चुकानी पड़ी। परन्तु इसका उन पर और उनके काम पर कोई फर्क नहीं पड़ा।

बांग्लादेश की स्वतंत्रता पर शेख हसीना के पिता और मुक्ति संग्राम के नायक शेख मुजीबुररहमान को गार्ड आफ आनर जनरल सगत के नेतृत्व में दिया गया था। हालांकि जयपुर में सेना ने उनके नाम पर खातीपुरा से हसनपुरा जाने वाली सड़क का नामकरण किया और उनकी एक आदमकद प्रतिमा भी खातीपुरा तिराहे पर लगाई है। इस महान यौद्धा की कहानी भारतीय सैन्य अकादमी में तो पढ़ाई जाती है, लेकिन स्कूल—कॉलेजों से दूर ही है।

जयपुर में उनकी मूर्ति अनावरण समारोह में सेना के अधिकारियों ने कहा कि लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह- जो 1961 में पुर्तगालियों से गोवा को मुक्त कराने, 1971 में बांग्लादेश के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा गए। उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया जाना चाहिए। परन्तु हमारे प्रधानमंत्री ने उनका नाम तक नहीं लिया।

जब दिल्ली में भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी, रक्षा मंत्री बाबू जगजीवन राम, रक्षा सचिव बीबी लाल ने यह सुना कि सगत सिंह राठौड़ अपनी पूरी बटालियन को मात्र पांच हैलीकॉप्टरों के सहारे एक रात में मेघना नदी के पास उतार लिया है। किसी को भरोसा नहीं हुआ, इसलिए खुशी से झूमने से पहले इन सभी ने खबर की कई बार पुष्टि करवाई। इसके बाद ही पाकिस्तानी सेना के हौसला टूट गया और यहां तक टूट गए कि जब सगतसिंह की बिग्रेड ने ढाका को घेर लिया तो वहां 93000 पाकिस्तान सेना थी और भारतीय सैनिकों की संख्या मात्र तीन हजार थी।

मेजर जनरल राजेंद्र नाथ, जिन्होंने 1971 के युद्ध को पूर्वी मोर्चे पर लड़ा था। उनके शब्दों में कहें तो ढाका दो तरफ से नदियों द्वारा अच्छी तरह से कवर होते हुए सुरक्षित था। इसलिए सेना हेलीकॉप्टरों के अलावा कहीं से पहुंच ही नहीं सकती थी। बकौल नाथ लेफ्टिनेंट जनरल सगत दुनिया का अब तक का सबसे बेहतरीन कमांडर था। अगर सगतसिंह के पास 1971 की लड़ाई में 4 कोर की कमान नहीं होती

तो बांग्लादेश अब भी पूर्वी पाकिस्तान होता।

सगतसिंह एक ऐसे अफसर थे, जिनके नाम से पाकिस्तान ही नहीं बल्कि चीन और पुर्तगाल की सेना भी कांपती थी। सगतसिंह के बेटे एक साक्षात्कार में बताते हैं कि उस समय सगतसिंह चौथी बटालियन के प्रमुख के तौर पर असम के तेजपुर में तैनात थे। पाकिस्तानी सेना का जुल्म बढ़ने लगा। बांग्लादेशी भारत आने लगे और त्रिपुरा में शरणार्थी संकट बढ़ने लगा। सगतसिंह को त्रिपुरा मूव का आदेश हुआ। त्रिपुरा में कोई भी साधन सेना के पास नहीं था, जिससे व्यवस्थाओं को प्रभा​वी किया जा सके।

सगतसिंह ने वहां पहुंचे बांग्लादेशी शरणार्थियों से आह्वान किया कि मैं आपको खाना खिलाउंगा, देखभाल करूंगा और मेडिकल हैल्प दूंगा। आप मेरी मदद कीजिए। आपको जानकर हैरत होगी। वहां एक प्रभावी सेटअप तैयार हुआ और मुक्तिवाहिनी व भारतीय सेना का संयुक्त प्रयास प्रारंभ होने से पहले ही सगतसिंह ने पूर्वी पाकिस्तान से डलाई, गंगासागर ओर खुलना को आजाद भी करा लिया था।

जब बुरी तरह चिढ़ गए अरोड़ा और सगतसिंह ने इनकार कर दिया
ढाका में एंट्री का एक ही पाइंट था करीब साढ़े तीन किलोमीटर चौड़े पाट वाली मेघना नदी को पार करना। जिसके सभी पुल पाकिस्तानी आर्मी ने उड़ा दिए थे। सगतसिंह को आदेश मिला कि आप इस किनारे अगले आदेश का इंतजार करेंगे। सगतसिंह रुके नहीं, उन्होंने अपने मित्र पाली के बागावास निवासी एयर वाइस मार्शल ​चंदनसिंह से बात की और पांच एमआई हेलीकॉप्टर के सहारे एक रात में हजारों जवानों को नदी पार करा दी।

जब चौथी बटालियन के ढाका के पास राजपुरा पहुंचने की खबर हुई तो लेफ्टीनेंट जनरल अरोड़ा, जिन्होंने बाद में पाकिस्तान के समर्पण समझौत पर नियाजी के साथ हस्ताक्षर किए। वे चिढ़ गए और बोले तुम्हें रुकने का कहा था। सगतसिंह ने कहा आपने जो कहा मैंने उससे ज्यादा कर दिया है। अरोड़ा बोले वापस लौटो, लेकिन सगतसिंह ने कहा कि यह नहीं हो सकता और फोन पटक दिया। एक एमआई हैलीकॉप्टर में पांच लोग बैठ सकने की क्षमता थी, लेकिन सगत के आदेश पर 17—17 को ले जाया गया और पूरी पलटन उस पार उतर गई। दुनिया के सैनिक इतिहास में सगतसिंह का यह कदम बखूबी दर्ज हुआ। यह भारत का पहला हैलीबॉर्न आपरेशन कहलाता है।

जनरल सगत की जीवनी लिखने वाले मेजर जनरल वीके सिंह का कहना है “वह सबसे अच्छा मुकाबला करने वाला नेता था जिसे कभी कोई वीरता पुरस्कार नहीं मिला।” सैनिकों को एयरलिफ्ट करने की अपनी योजना के बारे में उन्होंने कहा, “वायु सेना मुख्यालय ने कहा कि वे किसी अज्ञात स्थान पर उतरने का जोखिम नहीं लेंगे। ग्रुप कैप्टन चंदन सिंह का भरोसा था सगतसिंह पर इसलिए इसलिए, बिना अनुमति के, वे एक अज्ञात स्थान पर उतर गए।”

वह नहीं होते तो बांग्लादेश भी नहीं होता
मेजर चंद्रकांत सिंह जो सैन्य इतिहासकार हैं वे बांग्लादेश की आजादी का पूरा श्रेय जनरल सगत सिंह को देते हैं। उनके अनुसार ढाका पर कब्जे की योजना न तो हमारे सेना मुख्यालय में बनाई गई थी और न पूर्वी कमान के मुख्यालय में। यानि भारतीय सेना द्वारा पूर्वी पाकिस्तान में ढाका पर कब्जा करने की कोई योजना थी ही नहीं। उस समय सगत सिंह ने ही ढाका की ओर बढ़ने की योजना प्रस्तुत की। कोलकाता फोर्ट विलियम में कमांडिंग जनरल अफसर रहे लेफ्टिनेंट जनरल जे.एस. अरोड़ा ने इसका विरोध किया था। इसके बावजूद सगत पांच हैलीकॉप्टरों के सहारे मेघना नदी पार कर गए। मेघना ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी है। पुल उड़ाने के बाद पाकिस्तान के सैनिक निश्चिंत थे कि यह नदी कभी पार नहीं हो सकती। जबकि उन्होंने यहीं मात खाई।

सगत सिंह की प्लानिंग और सैनिकों के जज्बे के आगे उफनती नदी खामोश नजर आई। युद्ध शुरू होने के नौंवे दिन अपने सैनिकों समेत सगतसिंह ढाका के बाहरी इलाके में पहुंच गए। दो दिन बाद उन्होंने गुलशन कब्जा लिया। बाद में भारतीय सेना ने ढाका को पूरी तरह से घेर लिया और पर्चे गिरवाए। इससे मजबूर होकर 90 हजार पाकिस्तानी सैनिकों को सरेंडर करना पड़ा। सगत की योजना से सफल हुए और उसी योजना का विरोध करने वाले अरोड़ा ने ही फिर सरेंडर समझौते पर हस्ताक्षर किए।

नहीं दिया वीरता पुरस्कार
मेजर जनरल वी के सिंह बताते हैं, 1971 की लड़ाई में सगतसिंह का प्रदर्शन सबसे अच्छा था। उन्हें कोई वीरता पुरस्कार नहीं दिया गया। अन्य तमाम लोगों को वीर चक्र और महावीर चक्र जैसे मैडल मिले, लेकिन सगत सिंह को नहीं। उनको तो प्रमोशन तक नहीं दिया गया। आर्मी चीफ़ न सही उनको आर्मी कमांडर बनाया जा सकता था, परन्तु उन्हें यह पद नहीं दिया गया। ड्यूटी को लेकर उनकी अपने ऊपर के अधिकारियों से अक्सर नोक-झोंक होती रहती थी। इसके चलते उन्हें प्रमोट नहीं किया गया।

चीन तो आज तक कांपता है
यह 1965 में सगत सिंह डिविजन कमांडर थे। लेफ्टिनेंट जनरल अरोड़ा कोर कमांडर और बाद में थलसेना प्रमुख और फील्ड मार्शल बने लेफ्टिनेंट जनरल सैम मानेकशॉ पूर्वी कमान के कमांडर थे। चीन ने सिक्किम के नाथू ला और जेलप ला से कब्जा हटाने की बात कही। नाथू ला की रक्षा की जिम्मेदारी सगतसिंह की कमान वाली 17 माउंटेन डिविजन की थी। 27 माउंटेन डिविजन के हिस्से जेलेप ला था। उपर से आदेश आया कि पोस्ट खाली कर दिया जाए।27 माउंटेन डिविजन ने जेलेप ला को खाली कर दिया लेकिन सगत ने नाथूला को खाली करने से साफ इनकार कर दिया।

सगत सिंह नाथू ला की रणनीतिक अहमियत को जानते थे। उनको पता था कि वहां से यातुंग घाटी पर दूर तक नजर रख सकते हैं और सटीक हमला किया जा सकता है। दो साल इस सूझबूझ का फायदा हुआ। 27 अगस्त, 1967 को चीनी सैनिकों ने नाथू ला की ओर बढ़ना शुरू किया और कई भारतीय सैनिक मार दिए। चीन को यह भरोसा था कि भारत हमला नहीं करेगा। सगत सिंह ने रिस्क लिया और बगैर कोई इंतजार करते हुए चीनी सैनिकों पर तोप से गोलाबारी का आदेश दे दिया। यहां दोनों सेनाओं के बीच संघर्ष शुरू हुआ जो करीब 11 सितंबर, 1967 तक चला। करीब तीन सौ से अधिक चीनी मारे गए। पहली बार चीन ने सीजफायर की मांग की।

चीन ने सोचा था कि 1962 वाली स्थिति होगी और आसानी से नाथू ला पर कब्जा कर लेंगे। लेकिन इस बार उनका मुकाबला सगत सिंह से हुआ था जिन्होंने चीनी सैनिकों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। इस प्रयास से सगतसिंह ने 1962 में खोई भारतीय सेना की हिम्मत को वापस लौटाया। सगतसिंह को यहां से अफसरों ने पनिश करते हुए एक बार फिर से ठंडी और प्रशासनिक पोस्टिंग पर लगा दिया। इस घटनाक्रम पर पलटन नाम की फिल्म बॉलीवुड में बनी है, जिसमें सगतसिंह का किरदार जैकी श्रॉफ ने निभाया है।

चालीस की उम्र में हासिल किया कमांडो का बैज
इंफेंट्री अफसर होने के बावजूद सगतसिंह को 1961 में पैराशूट ब्रिगेड का कमांडर बनाया गया। चालीस साल से अधिक उम्र के बाद उन्होंने कमांडो ट्रेनिंग पूरी की। वह तब ब्रिगेडियर थे। ऐसा करना जरूरी नहीं था, लेकिन सगतसिंह जानते थे जब तक वे कमांडो ट्रेनिंग नहीं करेंगे तब तक उन्हें ब्रिगेड का सम्मान नहीं मिलेगा। जब आप इसे पूरा कर लेते हैं तभी आपको विंग्स मिलते हैं जिससे पैराट्रूपर के तौर पर पहचाना जाता है। जल्दी ट्रेनिंग पूरी करने के लिए एक दिन में दो दो जंप तक लिए।

गोवा को मात्र 36 घंटे में आजाद कराने वाले सगतसिंह पर पुर्तगाल सरकार उस वक्त दस हजार अमेरिकन डॉलर का इनाम रखा था। 18 दिसंबर को ऑपरेशन शुरू हुआ और 19 तारीख को ही बटालियन पंजिम पहुंच गई। वहां सगत ने ही यह कह कर अपनी बटालियन को रोका कि रात हो गई है। पंजिम आबादी वाला इलाका है। रात में हमला करने से कैजुएलटीज़ हो सकती हैं। सुबह नदी पार की।

गोवा सरकार ने पुल तोड़ दिए थे। सगत की पूरी बटालियन ने तैर कर नदी पार की। मात्र 36 घंटे में उन्होंने पूरे पणजी को कब्जे कर लिया। हालांकि इसकी जिम्मेदारी 17 इन्फैंट्री डिविजन की थी, लेकिन सगतसिंह ने प्रभावी योजना दी। अफसर इस पर सोच ही रहे थे तो उन्होंने कब्जे की समयसीमा लिखित रूप में दी थी।

द्वितीय विश्वयुद्ध में उन्होंने फिलिस्तीन, सीरिया और मेसोपोटामिया में युद्ध लड़े और 1947 में भारतीय सेना ज्वाइन की। 1949 में वे तीन गोरखा राइफल्स में कमीशंड हुए। राजस्थान के चुरू जिले के रतनगढ़ तहसील के कुसुमदेसर गांव में ठाकुर बृजपालसिंह के घर जन्मे सगतसिंह स्कूली शिक्षा के दौरान ही इंडियन मिलेट्री एकेडमी ज्वॉइन कर ली और उसके बाद बीकानेर स्टेट फोर्स गंगा रिसाला ज्वॉइन की। 30 नवम्बर 1976 तक सगतसिंह ने भारतीय सेना में शानदार सेवाएं दी।

बीमारी के चलते उनका 26 सितम्बर 2001 को निधन हुआ। बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण उन्हें बांग्लादेश सरकार द्वारा सम्मान दिया गया। भारत सरकार द्वारा देश के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। 30 नवंबर 1976 को रिटायर हुए जनरल सगत सिंह ने अपना अंतिम समय जयपुर में बिताया। 26 सितंबर 2001 को इस महान सेनानायक का देहांत हुआ।

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