statue of mahant digvijaynath आज महंत दिग्विजयनाथ की प्रतिमा का अनावरण
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आज महंत दिग्विजयनाथ की प्रतिमा का अनावरण

statue of mahant digvijaynath

गोरखपुर। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री धर्मेंद्र प्रधान बृहस्पतिवार 23 सितम्बर को यहां ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ (statue of mahant digvijaynath) की रामगढ़ताल के निकट बने स्मृति पार्क में साढ़े बारह फीट ऊंची प्रतिमा का अनावरण करेंगे।

महंत दिग्विजयनाथ की साढ़े बारह फीट ऊंची प्रतिमा

गौरतलब है कि वर्ष 1935 से 1969 तक नाथपंथ के विश्व विख्यात गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर रहे ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की 52वीं पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में गोरखनाथ मंदिर (Gorakhpur temple) में साप्ताहिक श्रद्धांजलि समारोह जारी है। प्रतिदिन राष्ट्र व समाजहित में समाज के मार्गदर्शक संतों व राष्ट्रीय स्तर के विषय विशेषज्ञों के मंथन सार से लोग रूबरू हो रहे हैं। ब्रह्मलीन महंत की पावन स्मृति को इस बार गोरखपुर एक विशेष आयोजन से भी नमन करने जा रहा है। रामगढ़ताल (Ramgadtal) के समीप बने स्मृति पार्क में स्थापित महंत दिग्विजयनाथ की साढ़े बारह फीट ऊंची प्रतिमा उनके यशस्वी व्यक्तित्व व कृतित्व की याद दिलाकर लोगों को प्रेरित करेगी। इस प्रतिमा का अनावरण मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (CM Yogi Adityanath) व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री धर्मेंद्र प्रधान (Dharmendra Pradhan) कल करेंगे।

statue of mahant digvijaynath

महंत दिग्विजयनाथ की गोरखनाथ मंदिर में योग दीक्षा हुई

महंत दिग्विजयनाथ का जन्म वर्ष 1894 में वैशाख पूर्णिमा के दिन चित्तौड़ मेवाड़ ठिकाना ककरहवां (राजस्थान) में हुआ था। उनके बचपन का नाम नान्हू सिंह था। पांच वर्ष की उम्र में 1899 में इनका आगमन गोरखपुर के नाथपीठ में हुआ। अपनी जन्मभूमि मेवाड़ की माटी की तासीर थी कि बचपन से ही उनमें दृढ़ इच्छाशक्ति और स्वाभिमान से समझौता न करने की प्रवृत्ति कूट कूटकर भरी हुई थी। उनकी शिक्षा गोरखपुर में ही हुई और उन्हें खेलों से भी गहरा लगाव था।

15 अगस्त 1933 को गोरखनाथ मंदिर में उनकी योग दीक्षा हुई और 15 अगस्त 1935 को वह इस पीठ के पीठाधीश्वर बने। वह अपने जीवन के तरुणकाल से ही आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेते रहे। देश को स्वतंत्र देखने का उनका जुनून था कि उन्होंने 1920 में महात्मा गांधी (Mahtama Gandhi) द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन के समर्थन में स्कूल छोड़ दिया। उन पर लगातार आरोप लगते थे कि वह क्रांतिकारियों को संरक्षण और सहयोग देते हैं। वर्ष 1922 के चौरी-चौरा के घटनाक्रम में भी उनका नाम आया लेकिन उनकी बुद्धिमत्ता के सामने ब्रिटिश हुकूमत को झुकना पड़ा और उन्हें रिहा कर दिया गया।

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