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यूपी में गुजरात का प्रयोग

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यह पूरी तरह से गुजरात मॉडल का प्रयोग नहीं है लेकिन उसकी एक झलक दिख रही है। भाजपा ने उत्तर प्रदेश में दूसरी बार सरकार बनाई तो आधे नए मंत्री बनाए गए। कुछ मंत्री चुनाव नहीं लड़े और कुछ हार गए, जबकि बचे हुए मंत्रियों में से 20 को इस बार मौका नहीं दिया गया। इस तरह 52 मंत्रियों में से आधे मंत्री ऐसे हैं, जो पिछली सरकार में नहीं थे। इस तरह योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी भाजपा नई सरकार होने का मैसेज बनवाने में कामयाब हो गई। पुराने मंत्रियों को हटा कर नए मंत्री बनाने का भाजपा का फॉर्मूला पुराना है। लेकिन हैरानी उन नामों को लेकर है, जिनका मंत्री बनना तय माना जा रहा था।

जैसे श्रीकांत शर्मा, सिद्धार्थ नाथ सिंह और नीलकंठ तिवारी। ये तीनों मंत्री थे और तीनों क्रमशः मथुरा, प्रयाग और वाराणसी का प्रतिनिधित्व करते हैं। श्रीकांत शर्मा और सिद्धार्थ नाथ सिंह तो दिल्ली में रहे हैं और राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी और राष्ट्रीय प्रवक्ता थे। योगी सरकार के सबसे चर्चित चेहरा भी इन्हीं दोनों का था। लेकिन दोनों की छुट्टी हो गई। तभी कहा जा रहा है कि मोदी-शाह की भाजपा में नेताओं का ज्यादा चर्चा में आना भी ठीक नहीं है। बहरहाल, यह भी कहा जा रहा है कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की सूची और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सूची में संतुलन बनाने के लिए भी कुछ नाम कटे हैं। जैसे मुख्यमंत्री के बेहद करीब महेंद्र सिंह और उनके स्वजातीय जय प्रताप सिंह का नाम कटने का मामला है। कुछ मंत्री संतुलन बनाने में गए तो कुछ आरोपों के कारण और कुछ खराब प्रदर्शन की रिपोर्ट के कारण रह गए।

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