women perform last rites in up : उत्तरप्रदेश के इस गांव की अनोखी परंपरा, शवों का अंतिम संस्कार पुरुष नहीं महिलाओं के हाथों होता है जानें क्यों..
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उत्तरप्रदेश के इस गांव की अनोखी परंपरा, शवों का अंतिम संस्कार पुरुष नहीं महिलाओं के हाथों होता है जानें क्यों..

women perform last rites in up

अग्नये स्वाहा, अग्नये इदं न मम…. अब मृत देह पर घी मलकर बोलिए प्रेताय इदं न मम। शवों का अंतिम संस्कार के समय यही मंत्र बले जाते है। और सभी शमशान घाटों पर पुरुषों द्वारा यह अंतिम संस्कार की क्रियाविधि की जाती है। लेकिन उत्तरप्रदेश के उन्नाव में अचलगंज में गंगा के बलाई घाट पर नारी स्वर में यह मंत्र गूंजते है। ( women perform last rites in up ) इस घाट पर दो महिलाएं शवों का अंतिम संस्कार करवाती है। पहले इनके पतियों द्वारा यह कर्म किया जाता था। लेकिन इन दोनों महिलाओं के पति की मौत के बाद इस काम को विरासत के रूप में स्वीकार कर लिया। इन दोनों महिलाओं का नाम सुषमा पंडा और कांति बताया जाता है। आइये जानते है कैसे इन दोनें ने मुश्किल राह चुनकर अपनी जिंदगी जी रही है।

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सुषमा के हौंसले की कहानी

अचलगंज से करीब आठ किमी दूर बलाई घाट की रेत पर बैठी सुषमा पंडा रोज शवों का अंतिम संस्कार करवाती है। सुषमा पंडा की जिंदगी में कभी रविवार नहीं आता। इनको किसी भी दिन छुट्टी नहीं मिलती है। क्योंकि मरने का कोई निश्चित समय नहीं होता है। इस बारे में अचलगंज के हड़हा गांव की सुषमा बताती है कि इस घाट पर उनके पति शवों का क्रियाकर्म करवाते थे। लेकिन आज से  करीब 12 साल पहले उनकी मृत्यु हो गई। ( women perform last rites in up  ) सुषमा ने कहा कि मेरे सामने दो रास्ते थे या ते मजदूरी करूं या फिर पति के काम को ही विरासत के रूप में अपनाकर आगे ले जाऊं। पति की मौत के बाद लोगों ने सुषमा को बहुत डराया और कहा कि इतनी लाशें देकर डर लगेगा। रात में नींद नहीं आएगी। डरावने सपने आएंगे। समाज की सोचों समाज क्या कहेगा। यह काम पुरूषों का होता है महिलाओं का नहीं। लेकिन अंत में मैनें पति के काम को ही चुना। सुषमा 24 गांव के शवों का अंतिम संस्कार कराती हैं। उन्हें रोज घाट आना ही होता है।

10 साल से कांति भी करवाती है अंतिम संस्कार ( women perform last rites in up  )

कांति पंडा की शादी करीब 20 साल पहले हुई थी। सोहर-बन्ने की गूंज के बीच उनकी डोली उतारी गई थी। लेकिन पिछले 10 साल से कांति इदं न मम… इदं न मम उनकी जिंदगी की धुरी बन गया है। ( women perform last rites in up  ) पति रमेश की मौत के बाद कांति भी घाट पर अंतिम संस्कार कराती हैं। पति की मौत के बाद कांति ने भी इस काम को विरासत के रूप में संभाला है। दाह संस्कार से मिलने वाले पैसों से ही उनका खर्च चलता है। बेटी की शादी हो चुकी है। बेटा नीरज कानपुर में मजदूरी करता है।

एक संस्कार के 700-1000 रूपये मिलते है

सुषमा और कांति के पास आय का कोई अन्य साधन नहीं है। ( women perform last rites in up ) इन दोनों के पास कोई जमीन भी नहीं है। सुषमा माह में औसतन 15- 20 अंतिम संस्कार कराती हैं। एक संस्कार में सात सौ से एक हजार रुपए तक मिल जाते हैं। गंगा स्नान करने वालों से कुछ दान दक्षिणा मिल जाती है। इन महिलाओं को न ही विधवा पेंशन मिलती है न आवास योजना का लाभ मिला।

भीग जाती हैं यहां संस्कार कराने वाली आंखें ( women perform last rites in up )

श्मशान पहुंचने तक तो मृतक के अपनों की आंखें भी सूख जाती हैं। ( women perform last rites in up  ) ऐसा कहीं नहीं होता कि मंत्र पढ़ कर चिता को आग दिलवाने वाला रो पड़े। लेकिन बलाई घाट में अक्सर ऐसा दिख जाता है। जब किसी बच्चे की देह चिता पर हो, मंत्र पढ़ते हुए सुषमा और कांति का कंठ रुंध जाता है। मातृत्व की कोमलता पिघल कर आंखों से बह निकलती है। दोनों ने कहा-ऐसे परिवारों से दक्षिणा लेना भी हम पर भारी गुजरता है।

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