जिस तकलीफ़ से घर लौटा हूं, अब फिर जाने की हिम्मत नहीं होगी’ - Naya India
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जिस तकलीफ़ से घर लौटा हूं, अब फिर जाने की हिम्मत नहीं होगी’

LUCKNOW, MAY 14 (UNI) Migrant labours at Faizabad highway want to reach their hometown by any means as every means of traveling is closed due to COVID-19 pandemic lockdown , in Lucknow on Thursday.UNI PHOTO-LKWPC4U

श्रमिक स्पेशल ट्रेन के किराये को लेकर सरकार के विभिन्न दावों के बीच गुजरात से बिहार लौटे कामगारों का कहना है कि उन्होंने टिकट ख़ुद खरीदा था। उन्होंने यह भी बताया कि डेढ़ हज़ार किलोमीटर और 31 घंटे से ज़्यादा के इस सफ़र में उन्हें चौबीस घंटों के बाद खाना दिया गया।

उमेश कुमार राय | योगेश गिरि 4 महीने से गुजरात के बिठलापुर में एक मेटल फैक्ट्री में काम कर रह रहे हैं।6 मई की सुबह उनके पास उड़ती हुई खबर आई कि बिरमगाम रेलवे स्टेशन से बिहार के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलने वाली है।लगभग डेढ़ महीने से घर की चहारदीवारी में कैद योगेश ये खबर फौरन रजिस्ट्रेशन कराने के लिए बैग कंधे पर टांगकर निकल पड़े, लेकिन गुजरात से बिहार के क्वारंटीन सेंटर तक पहुंचने की उनकी यात्रा किसी बुरे सपने से कम नहीं रही, जिसे वह शायद ही कभी भूल पाएंगे।

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25 वर्षीय योगेश बताते हैं, ‘सुबह ज्यों ही हमें खबर मिली, हम लोग बैग लेकर पास के ही एक स्कूल में पहुंच गए। इस स्कूल में कामगारों का पंजीयन हो रहा था। लोगों की लंबी कतार लगी हुई थी। मेरे खयाल में ढाई से तीन हजार लोग तो होंगे ही।’
लोगों की भीड़ का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि योगेश सुबह 10 बजे लाइन में लगे थे और उनका नंबर दोपहर 1 बजे आया। स्कूल में अल्फ्रारेड थर्मामीटर से सभी कामगारों का तापमान मापा जा रहा था और जिनका तापमान सामान्य मिलता था, उन्हें स्वास्थ्य विभाग की तरफ से एक कागज दिया जाता था।


हालांकि वहां हर कामगार से 710 रुपये वसूले गए और इसके बाद उन्हें बसों में बैठा दिया गया। लेकिन, इस 710 रुपये का कोई बिल नहीं दिया गया।इसके बाद उसी दिन जब वहां से बसें चलीं, तो बमुश्किल 10 मिनट चलने के बाद सड़क किनारे एक जगह रोककर खड़ी कर दी गईं। लेकिन लोगों को उतरने नहीं दिया गया।
योगेश कहते हैं, ‘वहां बस लगभग 4 घंटे तक खड़ी रही। कड़ी धूप थी और खुली जगह में बस लगा दी गई थी। बस के भीतर बहुत गर्मी लग रही थी। हम लोगों ने चाहा कि बाहर निकलकर कहीं छांव देखकर कुछ देर बैठ लें, लेकिन पुलिस वाले उतरने नहीं दे रहे थे। लोग उतरने की कोशिश करते, तो पुलिस कर्मचारी डंडे बरसाने लगते।’

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वे आगे बताते हैं, ‘4 घंटे तक हम लोग बस में ही उबलते रहे। वहां से हमें बिरमगाम रेलवे स्टेशन ले जाया गया, जहां हमें एक बोतल पानी, दो रोटियां और पांच रुपये वाला बिस्कुट का एक पैकेट दिया गया।’
बिठलापुर से बिरमगाम की दूरी लगभग 30 किलोमीटर है, लेकिन ये दूरी तय करने में इन बसको लगभग 5 घंटे लग गए।
बिरमगाम स्टेशन पर ही उन्होंने रेलवे टिकट लिया, जिस पर 690 रुपये किराया लिखा हुआ है, लेकिन इसके अतिरिक्त जो 20 रुपये लिए गए थे, उसका कोई हिसाब नहीं बताया गया कि वो किस बात के लिए है।बिरमगाम स्टेशन पर 24 डिब्बे की एक श्रमिक स्पेशल ट्रेन खड़ी थी, जिसमें बिहारी कामगारों को बैठाया गया। ट्रेन में हर सीट पर पानी का एक बोतल रखा हुआ था। हर डिब्बे में 50 लोगों को बिठाया गया और ट्रेन बेतिया के लिए रवाना हुई। कई सरकारी दावों के उलट श्रमिक स्पेशल ट्रेन के टिकट के लिए कामगारों ने पैसे चुकाए हैं। गुजरात के बिरमगाम से बिहार के बेतिया तक की स्पेशल ट्रेन का टिकट।

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ट्रेन से यात्रा कर रहे यात्रियों ने बताया कि ट्रेन में पुलिस रेलवे सुरक्षा बल का एक भी जवान नहीं था, जिससे डर लगता रहता था कि कहीं कोई चोर-उच्चके ट्रेन में चढ़ गए या कोई परेशानी ही आ गई, तो क्या होगा।
योगेश ने बताया, ‘इसके बाद कई स्टेशन पर आरपीएफ के जवान मिलते थे, जो हम लोगों को स्टेशन पर उतरकर पानी भी नहीं भरने दे रहे थे। एक बोतल पानी से ही हमें 12 घंटे से ज्यादा समय तक काम चलाना पड़ा। सुबह ट्रेन लखनऊ पहुंची, तो हर डिब्बे के गेट पर दो कार्टन पानी का बोतल रख दिया गया, लेकिन यात्रियों की संख्या के मुकाबले पानी कम था। कई यात्रियों को पानी ही नहीं मिला।’

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योगेश बताते हैं, ‘कुछ कामगारों के पास पैसा था। लेकिन जिन भी रेलवे स्टेशनों पर ट्रेन रुकती, वहां एक भी दुकान खुली नहीं थी कि लोग खरीदकर ही कुछ खा लेते। पैसा होने के बाद भी लोगों को भूखे पेट सफर काटना पड़ा।’
लखनऊ में एक बोतल पानी के अलावा उन्हें कुछ नहीं दिया गया। कुछेक यात्री अपने साथ बिस्कुट ले गए थे, तो उसे ही एक दूसरे के साथ साझा कर खाया।रेलवे मंत्रालय की तरफ से पहला खाना ट्रेन में सवार होने के लगभग 26 घंटे बाद दिया गया। रात लगभग 8 बजे गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर ट्रेन रुकी, तो प्रवासी कामगारों को खाने में रंगीन चावल दिया गया और साथ में एक बोतल पानी।


इसके बाद ट्रेन वहां से चली, तो 8 मई तड़के बेतिया स्टेशन पहुंची। बेतिया स्टेशन पर लोगों को पूड़ी-सब्जी और पानी का एक-एक बोतल दिया गया।
योगेश बताते हैं, ‘स्टेशन से बस में बिठाकर हमें अपने गृह जिले ले जाया गया।’ योगेश रोहतास के विक्रमगंज ब्लॉक में रहते हैं, जहां वे 8 मई की दोपहर को पहुंचे। देर रात बिहार सरकार की तरफ से जो खाना मिला था, उसके बाद सीधे दोपहर को उन्हें बिस्कुट का एक पैकेट और एक बोतल पानी दिया गया।
योगेश शादीशुदा हैं, दो बच्चे हैं। आईटीआई की पढ़ाई की है, लेकिन बिहार में रोजगार न मिलने के कारण गुजरात चले गए थे। गुजरात से पहले फरीदाबाद में काम कर रहे थे, फिर गुजरात में वहां से ज्यादा तनख्वाह मिल रही थी, तो गुजरात चले गए थे।

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वह कहते हैं, ‘जिस हालत में मैं वहां (गुजरात में) था, अगर परचून की दुकान के मालिक ने उधार में राशन नहीं दिया होता, तो क्या होता पता नहीं! दुकानदार ने 6-7 हजार रुपये का राशन उधार दिया, लेकिन न तो गुजरात सरकार और न ही बिहार सरकार ने हम लोगों की मदद की।’ योगेश कहते हैं, ‘जिस तरीके और तकलीफ से मैं गुजरात से लौटा हूं, अब हिम्मत नहीं होगी कि दूसरे राज्य जाऊं। सोच रहा हूं कि अब बिहार में ही रहूंगा, खेतों में मजदूरी कर गुजारा कर लूंगा।’
‘24 घंटे तक नहीं मिला खाना’
26 साल के धीरज कुमार छपरा के जलालपुर के रहने वाले हैं। वह दो साल से गुजरात में स्कूटर के पुर्जे बनाने वाली फैक्ट्री में काम कर रहे थे। ये भी बिठलापुर में रहते हैं।
लॉकडाउन के दौरान कंपनी ने उन्हें मार्च की तनख्वाह दी थी, इसी के सहारे वे डेढ़ महीने तक काम चला सके। वह भी बिरमगाम से श्रमिक स्पेशल ट्रेन से बिहार लौटे हैं।


उन्होंने बताया, ‘वहां एनाउंसमेंट किया गया कि जो बिहार जाना चाहते हैं, वे निकल जाएं। जिस कॉलोनी में रहता था, वहां के मकान मालिकों को स्थानीय थाने से फोन आया था कि अपने बिहारी किरायेदारों से बोल दें कि 6 मई को बिरमगाम से बिहार के लिए ट्रेन खुलेगी।’
धीरज आगे कहते हैं, ‘मकान मालिक ने मुझे बताया, तो 6 मई की सुबह सामान लेकर घर से निकल गए। शाम को हम लोगों ने ट्रेन पकड़ा था, लेकिन इसमें सवार होने के 24 घंटे तक खाना नहीं दिया गया, सिर्फ दो बोतल पानी मिला।’
जब उनसे बात हुई, वे ट्रेन में ही थे। रेलवे प्रशासन को लेकर नाराजगी जाहिर करते हुए धीरज ने फोन पर कहा, ‘24 घंटे से ज्यादा वक्त बीत चुका है, लेकिन हम लोगों ने खाना नहीं खाया है। पानी भी दो बोतल ही मिला। जब प्यास लगती, तो एक घूंट पीकर गला तर कर लेते हैं।’
इसके बाद खाना देर से मिलने के सवाल पर रेलवे मंत्रालय की तरफ से ट्वीट कर बताया गया कि 7 मई की सुबह 11 बजे लखनऊ में खाना देने की योजना थी, लेकिन ट्रेन लेट होने के कारण गोरखपुर स्टेशन पर यात्रियों को खाना दिया गया, जहां ट्रेन रात के आठ बजे पहुंची थी।

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‘…जिंदगी में ऐसे कभी नहीं लौटा’
वकील प्रसाद की उम्र 45 साल है और अपनी उम्र के दो दशक वह अलग-अलग राज्यों में गुजार चुके हैं। वह कंस्ट्रक्शन साइट पर मिस्त्री का काम करते हैं।पिछले 3-4 महीने से वह गुजरात में थे। उन्हें मार्च के काम का पैसा नहीं मिला है। वह भी इसी श्रमिक स्पेशल ट्रेन से बिहार के मोतिहारी में अपने गांव लौटे हैं।
अपना अनुभव साझा करते हुए कहते हैं, ‘मैं 25 सालों से अलग-अलग राज्यों में रह रहा हूं, लेकिन इतने वर्षों में कभी भी इस तरह 24 घंटे से ज्यादा वक्त बिना खाना-पानी के घर नहीं लौटना पड़ा।’
जब इस रिपोर्टर ने उनसे बात की थी, तब वह ट्रेन में थे। उन्होंने बताया, ‘जो लोग बिस्कुट वगैरह लेकर आए थे, वे बिस्कुट खाकर भूख मिटा रहे हैं। मैं कुछ लेकर नहीं आया था, तो भूखा बैठा हूं।’
आगे कहा, ‘बहुत भूख लगती है, तो एक घूंट पानी पी लेता हूं। पानी भी ज्यादा नहीं पी सकता क्योंकि पानी कम ही मिला है। आगरा में ट्रेन रुकी थी, तो मैंने स्टेशन पर मौजूद आरपीएफवालों से गुजारिश की कि एक बोतल पानी भर लेने दें, लेकिन उन्होंने ट्रेन से उतरने नहीं दिया।’
वकील प्रसाद भूमिहीन हैं। बिहार में रोजगार के अवसर न होने के चलते उन्हें दूसरे राज्यों में काम करने जाना पड़ा। वह फिलहाल अहमदाबाद के सीतापुर में एक कंस्ट्रक्शन साइट पर काम कर रहे थे।
उन्होंने कहा, ‘6 मई को हमें बिहार के लिए ट्रेन खुलने की खबर मिली, तो मेटाडोर भाड़ा कर बिठलापुर आए और कतार में लगकर रजिस्ट्रेशन कराए।’
वह बिहार लौट तो रहे हैं, लेकिन ये तय नहीं कर पाए हैं कि बिहार में ही रहेंगे या दोबारा दूसरे राज्यों की तरफ रुख करेंगे।उन्होंने बताया, ‘बिहार में कभी काम मिलता है, कभी नहीं, इसलिए बाहर जाना पड़ता है। लॉकडाउन जब तक रहेगा, तब तक तो कुछ नहीं कर पाएंगे। लॉकडाउन खत्म होगा, तो सोचेंगे।’
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।– द वायर)

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