अवसर सिर्फ हमारी खाम-ख्याली में! - Naya India
कोविड-19 अपडेटस | गेस्ट कॉलम| नया इंडिया|

अवसर सिर्फ हमारी खाम-ख्याली में!

सत्येंद्र रंजन

जिस वक्त ‘आत्म-निर्भर भारत’ की बात कह कर प्रधानमंत्री मोदी एक तरह से ‘मेक-इन-इंडिया’ योजना की नाकामी स्वीकार कर रहे हैं, उसी वक्त भारत के लिए दुनिया के मैनुफैक्चरिंग हब बनने के अवसर की भी बात कही जा रही है। आखिर ‘मेक-इन-इंडिया’ में क्या होना था? यही तो कि भारत में उत्पादन होता, जिसे दुनिया भर के बाजारों में बेचा जाता। ‘आत्म-निर्भर भारत’ में ‘लोकल के लिए वोकल’ होना है। स्थानीय उत्पादन और देश के अंदर उपभोग। इसमें नया क्या है? गांधीजी का पूरा दर्शन यही था और पंडित नेहरू भी आत्म-निर्भरता के मंत्र का पाठ करते हुए ही ‘आधुनिक भारत के मंदिरों’ के निर्माण के रास्ते पर आगे बढ़े थे।

सत्येंद्र रंजन | नरेंद्र मोदी सरकार प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अनुकूल सुर्खियां बटोर लेने में माहिर है- उसकी इस क्षमता से कोई इनकार नहीं करता। दरअसल, अपनी नाकामियों को कामयाबी के रूप में पेश करने और एक बड़े जन-समूह में उसे स्वीकृति दिलवा देना उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक सफलता रही है। मीडिया पर पूर्ण नियंत्रण (या मेनस्ट्रीम मीडिया के लगभग पूर्ण समर्पण और सोशल मीडिया के प्रभावी उपयोग के कौशल) से ये काम उसके लिए आसान बनते गये है। इसके जरिए एक अलग आभासी यथार्थ के प्रति समाज के एक बड़े हिस्से में भरोसा बनाए रखने में वह सफल रही है। कोरोना संकट भी इस परिघटना का अपवाद नहीं है।
एक ऐसा संकट जिसके परिणामस्वरूप देश में जो हो रहा है, उसे तबाही के अलावा कुछ और नहीं कहा जा सकता। ऐसे हालात पैदा करने की काफी हद तक जिम्मेदारी खुद सरकार पर है। बिना योजना के “रॉ विजडम” से फैसले लेने की उसकी प्रवृत्ति के कारण आज “जान और जहान” दोनों खतरे में हैं। यह तो साफ है कि लॉकडाउन का रास्ता कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने में नाकाफी साबित हुआ। इसकी वजह से आर्थिक गतिविधियों में जो रुकावट आई, उसका रोजी-रोटी और आम रहन-सहन पर जो असर पड़ा है, उससे पिछले पौने दो महीनों से देश भर से हृदय-विदारक कहानियां सामने आ रही हैं।


इसके बावजूद प्रधानमंत्री का प्राचीन काल में भारत के सोने की चिड़िया होने, उस दौर को वापस लाने और आत्म-निर्भर भारत बनाने का संकल्प जताना सहजता से गले नहीं उतरता। जब सर्वेक्षण रिपोर्टों में यह बताया जा रहा है कि लॉकडाउन लागू होने के बाद ग्रामीण भारत में 50 फीसदी से ज्यादा घरों में खाने की चीजों में कटौती की गई है, कुपोषण के मोर्चे पर इस वर्ष भारत संयुक्त राष्ट्र के टिकाऊ विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को पूरा नहीं कर पाएगा, करोड़ों लोगों की नौकरियां चली गई हैं और जिनकी बची है उनकी औसत आमदनी घटकर 61 प्रतिशत रह गई है व गांव लौट रहे करोड़ों प्रवासी मजदूरों के लिए वहां रोजी-रोटी का कोई इंतजाम नहीं है,तो इस सब हकीकत के बीच में, ऐसे सपने दिखाने को एक तरह का एडवेंचर ही कहा जा सकता है।

Must Read : जिस तकलीफ़ से घर लौटा हूं, अब फिर जाने की हिम्मत नहीं होगी’

कोरोना संकट के भारत के लिए अवसर साबित होने की उछाली गई बात को इसी संदर्भ में देखना चाहिए। अवसर क्या है? कहा जा रहा है कि कोरोना वायरस के उद्गम स्थल चीन से बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपना कारोबार समेट रही हैं। वे दूसरे ठिकानों की तलाश कर रही हैं। यही भारत के लिए अवसर है। उन्हें लाया गया तो भारत चीन के रास्ते चलते हुए आने वाले वर्षों में उसी के जैसा चमक सकता है। लेकिन इसके लिए हमारी सरकारें कर क्या रही हैं? अब एकमात्र उपाय यही सामने आया है कि मजदूरों को मिली सुरक्षाओं और उनके बुनियादी हकों से उन्हें वंचित कर दिया जाए। ऐसा करने के लिए सरकारों ने अवश्य कोरोना संकट के कारण जारी लॉकडाउन को अवसर बनाया है। जिस वक्त आम राजनीति स्थगित है, धरने-प्रदर्शन नहीं हो सकते, संसदीय प्रक्रिया थमी हुई- उस वक्त अध्यादेशों के जरिए ऐसा कर देना आसान है।
मगर क्या सिर्फ श्रम कानून ही वो वजह हैं, जिस कारण बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने चीन को अपना ठिकाना बनाया था? जिन्हें वहां माओ-जे-दुंग के काल में मानव विकास में हुए निवेश, उससे बनी मानव संपदा, पब्लिक सेक्टर में बने इंफ्रास्ट्रक्चर आदि की जमीनी जानकारी नहीं है, वे ही यह सोच सकते हैं कि सिर्फ सस्ते श्रम और जिनसे मनमाना व्यवहार किया जा सके वैसे श्रमिकों की उपलब्धता की वजह से चीन को मैनुफैक्चरिंग हब बनने में कामयाबी मिली थी। बाकी मोर्चों पर आखिर भारत कहां है?


एक अजीब विडंबना है, जिस वक्त ‘आत्म-निर्भर भारत’ की बात कह कर प्रधानमंत्री मोदी एक तरह से ‘मेक-इन-इंडिया’ योजना की नाकामी स्वीकार कर रहे हैं, उसी वक्त भारत के लिए दुनिया के मैनुफैक्चरिंग हब बनने के अवसर की भी बात कही जा रही है। आखिर ‘मेक-इन-इंडिया’ में क्या होना था? यही तो कि भारत में उत्पादन होता, जिसे दुनिया भर के बाजारों में बेचा जाता। ‘आत्म-निर्भर भारत’ में ‘लोकल के लिए वोकल’ होना है। स्थानीय उत्पादन और देश के अंदर उपभोग। इसमें नया क्या है?
गांधीजी का पूरा दर्शन यही था और पंडित नेहरू भी आत्म-निर्भरता के मंत्र का पाठ करते हुए ही ‘आधुनिक भारत के मंदिरों’ के निर्माण के रास्ते पर आगे बढ़े थे। आत्म-निर्भरता का एक स्तर हासिल करने के बाद वह चरण जाता है, जहां से आप दुनिया भर में फैलने और दुनिया में अपनी पताका फहराने की योजना पर आगे बढ़ते हैं। क्या आज यही अवसर है कि कम-से-कम जो बात हमारी महत्त्वाकांक्षाओं में थी, उसे छोड़कर अब अपना घर संभाल लो, इस सोच की तरफ जा रहे हैं?


अगर इसे अवसर समझा माना जाता है, तो बेशक यह अवसर है। यह अवसर है कि हम मान लें कि हम में जिसे जीना है अपनी किस्मत और अपने प्रयासों से वह जिये, हमारे साझा प्रयासों में ऐसा कुछ नहीं है, जिससे उसे मदद मिल पाएगी। सरकार ने जिस तरह के कथित प्रोत्साहन पैकेज का एलान किया है, उससे भी क्या यही संकेत नहीं मिलता? संदेश यह है कि सरकार आर्थिक विकास और लोगों की भलाई का इंजन नहीं बनेगी। वह बस जोखिम उठाने वालों को एक सीमा तक की गारंटी देगी- लेकिन इसकी शर्त यह है कि आज के बर्बाद बाजार में ऐसे लोग बचे हों, जो जोखिम उठाकर कारोबार के लिए आगे आएं। कभी भी ऐसे लोगों की कमी नहीं होती। लेकिन संकट काल में सामाजिक या आर्थिक विकास एक साझा प्रयोजन होता है। आज पश्चिम में पूंजीवाद के गढ़ देशों पर गौर कीजिए। क्या वहां सरकारें ऐसे साझा प्रयोजन की डोर संभालने के लिए आज आगे नहीं आई हुई हैं?


मगर अपने यहां ऊंचे बड़े सपने बेचते हुए, सुनहरे अतीत की याद दिलाते हुए, संस्कृत निष्ट हिंदी के क्लिष्ट शब्दों में ऊंचे आख्यान देते हुए एक ऐसा कथानक पेश किया गया है, जिसका ठोस सार क्या है, जिससे कार्य-योजना क्या निकलती है, यह तलाश पाना बेहद मुश्किल है। मौद्रिक उपायों, बैंकिंग सिस्टम में नकदी की उपलब्धता बढ़ाने के उपायों और वित्तीय उपायों को घालमेल कर 20 लाख करोड़ रुपये की मोटी सुर्खी तैयार की गई है। उससे कौन सा अवसर निकलेगा या किस अवसर का उपयोग हो पाएगा, इसका अंदाजा सिर्फ खाम-ख्याली में ही लगाया जा सकता है।

Latest News

इस देश में कोरोना के दैनिक मामलों में फिर आई तेजी, चार सप्ताह का लॉकडाउन बढ़ाया
विदेश | rahul kumar - July 28,2021
Coronavirus Lockdown : कोरोना अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स (NSW) में दैनिक मामलों की…

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

});