• [EDITED BY : Super Admin] PUBLISH DATE: ; 02 May, 2019 07:15 AM | Total Read Count 171
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संकट में पवन हंस

देश में खराब होती अर्थव्यवस्था की यह एक और मिसाल है। खस्ता हाल होती जा रही सरकारी कंपनियों में पवन हंस का भी नाम जुड़ गया है। पवन हंस भारत में हेलिकॉप्टर सुविधा प्रदान करने वाली एक कंपनी है। पवन हंस के पास भारत का सबसे बड़ा सिविल हेलीकॉप्टरों का बेड़ा है। फिलहाल पवन हंस ने अपने कर्मचारियों की अप्रैल महीने की तनख्वाह रोक ली है। इससे पहले बीएसएनएल ने घाटे के चलते अपने कर्मचारियों की तनख्वाह रोकी थी। पिछले दिनों भारतीय डाक ने अपना घाटा बीएसएनएल और एयर इंडिया से ज्यादा बताया था। एयर इंडिया लंबे समय से लगातार घाटे में चल रही है। कुछ दिन पहले प्राइवेट कंपनी जेट एयरवेज के बंद हो जाने से 22,000 कर्मचारी बेरोजगार हो गए। इनमें से एक कर्मचारी ने तनाव में आकर आत्म-हत्या भी कर ली। जेट एयरवेज ने पिछले 25 अप्रैल को कंपनी ने एक सर्कुलर में लिखा था कि कंपनी कर्मचारियों को असहज वित्तीय परिस्थितियों के चलते अप्रैल महीने का वेतन देने की स्थिति में नहीं है। कंपनी खराब वित्तीय हालात में फंसी हुई है। इस मिसाल से पता चलता है कि विमानन उद्योग का भविष्य अनिश्चित है, क्योंकि कंपनी के कई सारे उपक्रमों को नुकसान हुआ है। वित्त वर्ष 2018-19 में कंपनी का राजस्व तेजी से घटा। इस वर्ष उसे 89 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। सबसे ज्यादा परेशानी कर्मचारियों पर खर्च की है।

ग्राहकों पर चल रहा उधार 230 करोड़ रुपये पहुंच गया है। इस विकट वित्तीय परिस्थिति को देखते हुए उत्पादन में सीधे योगदान कर रहे कर्मचारियों के अलावा सभी का वेतन रोक दिया है। उधर पवन हंस भारत का सबसे बड़ा हेलीकॉप्टर ऑपरेटर है। इसके पास करीब 50 हेलीकॉप्टर हैं। पवन हंस अपने हेलीपोर्ट और हेलीपैड भी बना रही थी। इसके अलावा कंपनी सी प्लेन और छोटे हवाई जहाज चलाने का भी इरादा रखती है। कंपनी के पास 10 लाख घंटे से ज्यादा की उड़ानों का अनुभव है। कंपनी में 51 प्रतिशत हिस्सेदारी पवन हंस लिमिटेड यानी सीधे भारत सरकार और 49 प्रतिशत हिस्सेदारी ओएनजीसी की है। ओएनजीसी अपने काम में पवन हंस के हेलिकॉप्टर ही इस्तेमाल करता है। बीएसएफ के छह ध्रुव हेलीकॉप्टर्स को भी एचएएल के लिए पवन हंस ही चलाता है। मगर अब ये कंपनी गहरे वित्तीय संकट में फंस गई है। यह विमानन उद्योग के साथ-साथ सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के बढ़ते संकट की तरफ इशारा करता है। क्या मौजूदा सरकार इसकी जिम्मेदारी से बच सकती है?

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