प्रधानमंत्री का कच्चा ज्ञान


[EDITED BY : Super Admin] PUBLISH DATE: ; 15 May, 2019 07:24 AM | Total Read Count 193
प्रधानमंत्री का कच्चा ज्ञान

नरेंद्र मोदी ने बादलों के कारण पाकिस्तानी रडार के काम ना कर सकने की बात कही। इसका सोशल मीडिया पर मजाक उड़ा। लेकिन यह बात सिर्फ मजाक की नहीं है। यह गंभीर मुद्दा है। सवाल उठा है कि क्या देश की कमान ऐसे व्यक्ति के पास होनी चाहिए जो विशेषज्ञों की राय की अनदेखी करके अपने कच्चे ज्ञान से शासन चलाए। एक टीवी इंटरव्यू के दौरान बालाकोट हमले के बारे में बात करते हुए मोदी ने कहा था कि उन्होंने खराब मौसम में हमला करने की सलाह दी। उनका कहना था कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि पाकिस्तानी रडार भारतीय वायुयानों को देख ना सकें। जबकि सच्चाई यह है कि रडार तकनीक पर बादल या बारिस का कोई असर नहीं होता। मोदी के इस इंटरव्यू के बाद एक बात तो साफ हो गई है कि अगर वो सच बोल रहे हैं तो देश की निर्णय प्रक्रिया पर खतरे के गंभीर बादल छाये हुए हैं। अगर मोदी को नहीं पता था कि रडार कैसे काम करते हैं, तो किस समझ के आधार पर उन्होंने सेना के कमांडर्स के फैसले को पलट दिया? प्रधानमंत्री के इस तरह के बयान का बड़े पैमाने पर विरोध हुआ है। इसे सेना की बौद्धिकता के लिए अपमानजनक बताया गया है।

क्या इस तरह प्रधानमंत्री ने सैन्य बलों की छवि को नुकसान नहीं पहुंचाया? अगर मोदी ने उस समय राडार को लेकर इस तरह की बात कही थी, तब क्या वहां एक भी ऐसा अधिकारी नहीं था, जो मोदी को रोक कर सही जानकारी सामने रखता? इन सबमें सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या एक परमाणु संपन्न देश की सेना ऐसी कच्ची और अधूरी जानकारी के आधार पर फैसले ले सकती है? इस इंटरव्यू के बाद बीजेपी के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से मोदी के इसी बयान को ट्वीट किया गया। लेकिन जब इसको लेकर सवाल उठने लगे तो इसे डिलीट भी कर दिया गया। जब इस बारे में बीजेपी की आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय से पूछा गया तो मुख्य सवाल को वे टाल गए। पूर्व सैन्य अधिकारी प्रधानमंत्री के इस बयान से खफा हैं। उन्होंने कहा है कि ये केवल प्रधानमंत्री मोदी ही बता सकते हैं कि रडार मामले में उनका क्या मतलब था। सरकार ने कहती रही है कि उसने सेना को खुले हाथ दे रखे हैं। प्रश्न उठा है कि क्या यही खुले हाथ हैं। क्या यह सीधे सेना की निर्णय प्रक्रिया में दखल नहीं है। 

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