• [EDITED BY : Super Admin] PUBLISH DATE: ; 09 May, 2019 06:51 AM | Total Read Count 187
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तकाजा इंसाफ का था

सुप्रीम कोर्ट अपने पुराने फैसले पर कायम रहा। लेकिन ऐसा करते हुए उसने न्याय के इस सिद्धांत की उपेक्षा कर दी कि किसी मामले से संबंधित पक्ष की आशंकाएं दूर करना न्याय-कर्ता का कर्त्तव्य है। चुनाव में विपक्ष एक पक्ष है। निर्वाचन आयोग ने अपने आचरण से उसमें कई अंदेशे पैदा किए हैं। ईवीएम को लेकर संदेह का माहौल बना है। ऐसे में आम चुनाव की पवित्रता और साख दांव पर है। इसलिए यह बेहतर होता कि इसको लेकर विपक्ष की आशंकाओं को दूर किया जाता। विपक्षा चाहता था कि अगर 50 फीसदी वीवीपैट वोटों की गिनती हो, तो चुनाव परिणाम की विश्वसनीयता बनी रहेगी। बाद में उसने अपनी मांग 25 फीसदी तक घटा दी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट को इससे जुड़ी दलीलों में कोई दम नहीं दिखा। और इस तरह उसने विपक्ष के भीतर शिकायत गहराने और चुनाव परिणामों की साख पर सवाल उठने की गुंजाइश खुली छोड़ दी है। खबर यह है कि लोकसभा चुनाव के दौरान 50 फीसदी ईवीएम से वीवीपैट पर्चियों के मिलान की मांग को लेकर दायर पुनर्विचार याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। पहले कोर्ट ने हर विधान सभा क्षेत्र में पांच वीवीपैट मशीनों की गिनती करने का निर्देश दिया था। विपक्ष की राय में यह ऊँट के मुह में जीरा के समान है।

मंगलवार को मामले की सुनवाई के दौरान 21 पार्टियों के प्रतिनिधि कोर्ट में मौजूद थे, जिनमें चंद्रबाबू नायडू, संजय सिंह, फारूक अब्दुल्ला आदि शामिल थे।  पुनर्विचार याचिका 21 विपक्षी पार्टियों के नेताओ की ओर से दायर की की गई थी। इसमें सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के समीक्षा की मांग की गई थी, जिसमें प्रति विधान सभा क्षेत्र पांच मशीनों की गिनती का आदेश दिया गया था। इन नेताओं की ओर से दायर पुनर्विचार याचिका में कहा गया है कि एक से पांच तक बढ़ाना पर्याप्त नही है। अदालत के इस फैसले से वांछित संतुष्टि नहीं होती। 25 अप्रैल को चंद्रबाबू नायडू सहित 21 विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की थी। आठ अप्रैल को सर्वोच्च अदालत ने चुनाव आयोग को लोक सभा चुनाव की सभी संसदीय सीट के हर विधानसभा क्षेत्र में एक नहीं, बल्कि पांच वीवीपैट की पर्चियों का ईवीएम से औचक मिलान का निर्देश दिया था। अगर इससे विपक्ष संतुष्ट नहीं हुआ, तो सुप्रीम कोर्ट को उस पर सहानुभूति से विचार करना चाहिए था। अफसोसनाक है कि उसने ऐसा नहीं किया।  

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