व्यापार महारथियों का टकराव


[EDITED BY : Super Admin] PUBLISH DATE: ; 13 May, 2019 09:33 AM | Total Read Count 31
व्यापार महारथियों का टकराव

ट्रंप प्रशासन ने चीनी वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ा दिया है। इससे अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध और तेज होने का अंदेशा है। जब से डोनल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बने हैं, ये युद्ध बढ़ता गया है लेकिन विडंबना यह है कि विश्व की ये दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं ऐसे हाल में हैं कि ना तो एक दूसरे को छोड़ सकती हैं और ना ही उनका साथ चलना आसान है। तकनीक के क्षेत्र में दोनों ही देश अपना वैश्विक प्रभुत्व स्थापित करना चाहते हैं। पिछले कुछ सालों से आयात-निर्यात शुल्क को लेकर बहस, चीन में कार्यरत विदेशी कंपनियों की ओर से आ रही शिकायतें और चीन पर लग रहे तकनीक की चोरी के आरोप- इस टकराव की जड़ में हैं। अमेरिका लंबे समय से विश्व का हाई-टेक चैंपियन रहा है। बीते सालों में चीन ने कई तकनीकी क्षेत्रों में बहुत प्रगति की है। कुछ मामलों में तो वह अमेरिका से भी आगे निकल चुका है। लेकिन ‘अमेरिका फर्स्ट’ का नारा देने वाले राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप इस प्रगति का कारण चीन के बौद्धिक या व्यापारिक कौशल को नहीं, बल्कि अमेरिकी कंपनियों से ज्ञान और तकनीक चुराने को मानते हैं। चीन इससे इनकार करता है। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच हो रही बातचीत में यह मुद्दा बातचीत को अटका देता है। ‘मेड इन चाइना-2025’ कहलाने वाली चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की एक योजना है। इसका लक्ष्य इस एशियाई महाशक्ति को नई तकनीकों का केंद्र बनाना है।

इसमें एयरोस्पेस से लेकर टेलिकम्युनिकेशंस, रोबोटिक्स से लेकर बायोटेक्नोलॉजी और इलेक्ट्रिक गाड़ियों की तकनीक भी शामिल है। 2025 तक चीन इन क्षेत्रों में लगने वाले तकनीकी पुर्जों और मैटीरियल के मामले में 70 फीसदी तक आत्म-निर्भर होना चाहता है। यही योजना अमेरिका को सबसे ज्यादा चिंतित कर रही है। उसे लगता है कि ऐसा हुआ तो अमेरिका चीन के बड़े बाजार को खो देगा। यही कारण है कि जब दोनों देशों को आपसी व्यापारिक समझौतों पर फिर से सहमति बनाने की बात आई, तो अमेरिका ने उसे उलझा दिया। एक चीनी कंपनी जेडटीई के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की बिक्री पर भी अमेरिका ने 2018 में रोक लगा दी थी। अमेरिका ने उस पर ईरान और उत्तर कोरिया पर लगे प्रतिबंधों का उल्लंघन का आरोप लगाया था। ये सब ऐसे मामले हैं, जिनसे दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा है। अब शुल्क बढ़ाने का अमेरिका का फैसला इसे नई ऊंचाई तक ले गया है। 

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