बिहार में गणित-केमिस्ट्री दोनों के सवाल 


[EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 12 May, 2019 07:22 AM | Total Read Count 352
बिहार में गणित-केमिस्ट्री दोनों के सवाल 

राजनीति में कई बार सीधे गणित काम करती है। जैसे इस बार लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में कर रही है। समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के वोट एक और एक मिल कर 11 हो रहे है। दिल्ली में भी यदि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी मिल जाते तो एक पश्चिमी दिल्ली सीट को छोड़ बाकी छह सीटों पर इनका वोट भाजपा से ज्यादा होता। नतीजों के नजर से देखें तो 2015 में बिहार में इसका प्रमाण मिला था। राजद, जदयू और कांग्रेस का साझा वोट भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों से ज्यादा हो गया तो 2014 में शानदार जीत दर्ज करने वाला एनडीए बुरी तरह धराशायी हुआ। 

उसी गणित को ध्यान रख नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने बिहार में नीतीश कुमार को पटाया। उनको लगा कि जैसे राजद के साथ जाकर नीतीश ने बाजी पलट दी वैसे ही उनके भाजपा में आने से बाजी पलट जाएगी। तभी भाजपा ने 2014 में सिर्फ दो सीट जीतने वाली नीतीश कुमार की पार्टी जदयू को 17 सीटें दीं। ध्यान रहे भाजपा 2014 में 30 सीटों पर लड़ी थी और 22 पर जीती थी। यानी वह अपनी लड़ी सीटों की संख्या से 13 सीट कम लड़ रही है और जीती हुई पांच सीटें भी उसने नीतीश के लिए छोड़ी हैं। इस तरह भाजपा की पांच सीटें चुनाव लड़ने से पहले ही कम हो गई हैं। अब उसका प्रयास अपनी 17 सीटों में से ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने का है। 

पिछले चुनाव में भाजपा 30 सीटों पर लड़ी थी और उसे 29.40 फीसदी वोट मिला था। जदयू 38 सीटों पर लड़ी थी और उसे 15.80 फीसदी वोट मिले। भाजपा की सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी सात सीटों पर लड़ी थी और उसे 6.40 फीसदी वोट मिले थे। इस बार ये तीनों पार्टियां एक साथ लड़ रही हैं। अगर पिछली बार मिला उनका वोट मिला दिया जाए तो आंकड़ा 51.60 फीसदी का बनता है। दूसरी ओर 2014 में राष्ट्रीय जनता दल 27 सीटों पर लड़ी थी और उसको 20.10 फीसदी, उसकी सहयोगी कांग्रेस को अपनी लड़ी 12 सीटों पर 8.40 और एक सीट पर लड़ी एनसीपी को 1.20 फीसदी वोट मिले। इस तरह विपक्ष का आंकड़ा करीब 30 फीसदी का बनता है। भाजपा की उस समय सहयोगी रही राष्ट्रीय लोक समता पार्टी तीन सीटों पर लड़ी थी और उसको तीन फीसदी वोट मिला था। इस बार रालोसपा विपक्षी गठबंधन का हिस्सा है। सो, उसके तीन फीसदी वोट मिला कर राजद गठबंधन का कुल वोट 33 फीसदी का होता है। दोनों के वोट प्रतिशत में 18 फीसदी का भारी अंतर है। 

पर बिहार में मौजूदा चुनाव को सिर्फ पिछले आंकड़ों के आधार पर नहीं समझा जा सकता है क्योंकि 2014 के बाद बिहार की राजनीति में बहुत बदलाव आया है। लालू प्रसाद और उनकी पार्टी बिहार की राजनीति में अछूत नहीं रह गई है। यह अछूतपन खत्म कराया खुद नीतीश कुमार ने। वे 2015 में लालू प्रसाद के साथ मिल कर चुनाव लड़े। सो, लालू प्रसाद के जंगल राज का नैरेटिव भी खत्म हो गया और उनका अछूतपन भी खत्म हुआ। उस चुनाव में राजद और जदयू दोनों सौ-सौ सीटों पर लड़े। राजद को 18.4 और जदयू को 16.8 फीसदी वोट मिले। 41 सीटों पर लड़ी कांग्रेस को 6.7 फीसदी वोट मिले थे। इन तीनों का आंकड़ा 42 फीसदी का बन गया। भाजपा लोकसभा में मिले 29 फीसदी सीटों से घट कर 24 फीसदी पर आ गई। उसकी सहयोगी पार्टियों का वोट भी इसी अनुपात में घटा। 

इस बार के चुनाव में भाजपा की दो पुरानी सहयोगी पार्टियां – रालोसपा और हिंदुस्तान अवाम मोर्चा, राजद गठबंधन का हिस्सा है। बदली हुई परिस्थितियों में राजद, कांग्रेस, रालोसपा, हम और नई बनी विकासशील इंसान पार्टी साथ मिल कर चुनाव लड़ रहे हैं। दूसरी ओर भाजपा के साथ जदयू और रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा है। पिछले विधानसभा चुनाव के दो साल बाद नीतीश कुमार जब से वापस एनडीए के साथ लौटे हैं तब से एक बड़ा बदलाव यह हुआ है कि भाजपा के साथ रहते हुए नीतीश ने नरेंद्र मोदी का विरोध करके अपनी जो सेकुलर छवि बनाई थी वह पूरी तरह से टूट गई है। वे मोदी को भाजपा के चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष और प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाने का विरोध करते हुए भाजपा से अलग हुए थे। इसलिए 2014 में उनको जो करीब 16 फीसदी वोट मिला था उसमें अच्छी खासी संख्या मुस्लिम वोट की भी थी। 2015 में भी वह वोट उनको मिला क्योंकि वे राजद और कांग्रेस के साथ लड़ रहे थे। पर इस बार यह वोट उनके साथ नहीं है। दूसरे, जब महादलित नेता के तौर पर जीतन राम मांझी का चेहरा उनके साथ था। वे भी अब उनके साथ नहीं हैं और महादलित चेहरा दिखाने के लिए उनको कांग्रेस से अशोक चौधरी को अपनी पार्टी में लाना पड़ा। 

सो, बदली हुई परिस्थितियों में बिहार की राजनीति को समझने के लिए पार्टियों को पिछले दो चुनावों में मिले वोट को जोड़ कर नतीजे निकालने की बजाय बिहार के सामाजिक समीकरण को पहले समझना होगा। बिहार में पिछड़ी और अतिपिछड़ी जातियों की आबादी 51 फीसदी है, जिसमें अकेले यादव आबादी 14 फीसदी है। इनके अलावा कोईरी आठ और कुर्मी चार फीसदी हैं। अतिपिछड़ा आबादी 26 फीसदी है। मुस्लिम आबादी 17 फीसदी है। दलित और महादलित मिला कर 16 फीसदी वोट है और सवर्ण आबादी 15 फीसदी है। इसमें सबसे ज्यादा छह फीसदी भूमिहार हैं। ब्राह्मण पांच, राजपूत तीन और कायस्थ एक फीसदी हैं। 

अब अगर गठबंधन की पार्टियों के वोट का हिसाब लगाएं तो राजद गठबंधन में यादव, मुस्लिम, गैर पासवान दलित, कोईरी और अतिपिछड़ी जातियों में से सबसे मजबूत मल्लाह शामिल हैं। इनका वोट 50 फीसदी से ज्यादा हो जाता है। 14 फीसदी यादव, 17 फीसदी मुस्लिम, 11 फीसदी गैर पासवान दलित, आठ फीसदी कोईरी और करीब चार फीसदी मल्लाह को मिलाएं तो 54 फीसदी वोट बनता हैं। दूसरी ओर बचा हुआ 46 फीसदी वोट है, जिसमें 15 फीसदी सवर्ण, पांच फीसदी पासवान, चार फीसदी कुर्मी और मल्लाह छोड़ कर सारी अति पिछड़ी जातियां हैं, जिनकी आबादी 22 फीसदी के करीब है। यह गठबंधन के हिसाब से जातियों का एक मोटा बंटवारा है। इसमें से कुछ वोट इधर उधर भी होंगे। जैसे यादव वोट भाजपा को भी मिलेंगे पर उसी तरह से कुछ सवर्ण वोट कांग्रेस को भी मिलेंगे और दूसरी सहयोगी पार्टियों को भी मिलेंगे। हर जाति का कुछ कुछ वोट सबको मिलेगा। पर मोटे तौर पर बिहार की जातियों के बंटवारे के हिसाब से राजद, कांग्रेस गठबंधन की पकड़ ज्यादा वोटों पर दिख रही है। 

अब अगर सीटवार देखें, जहां भाजपा चुनाव लड़ रही है तो वहां भी आंकड़ा ऐसा ही दिखेगा। भाजपा जिन 17 सीटों पर लड़ रही है उनके नाम हैं – पाटलिपुत्र, पटना साहिब, आरा, पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, शिवहर, मधुबनी, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, महाराजगंज, सारण, बक्सर, सासाराम, बेगूसराय, अररिया, औरंगाबाद और उजियारपुर। भाजपा ने पिछली बार जीती जो पांच सीटें छोड़ी हैं, वे हैं – गया, वाल्मिकीनगर, सिवान, गोपालगंज और झंझारपुर। बहरहाल, भाजपा जिन 17 सीटों पर लड़ रही है उसमें से दस सीटों पर उसकी स्थिति बहुत अच्छी मानी जा रही है। पर बाकी सात सीटों पर घमासान लड़ाई है। इस विश्लेषण का शुद्ध आधार सामाजिक समीकरण है। मोदी, मोदी के हल्ले के बावजूद बिहार में वोट जाति के आधार पर हो रहा है। मोदी, मोदी का सबसे ज्यादा हल्ला करने वाले भूमिहार पूर्वी चंपारण, मुंगेर, बेगूसराय, जहानाबाद जैसी अनेक सीटों पर अपनी जाति के उम्मीदवार के साथ गए हैं। ऐसे ही राजपूत वैशाली, बक्सर, बांका, महाराजगंज जैसी कई सीटों पर अपनी जाति के उम्मीदवार के साथ हैं। 

सबसे पहले भाजपा के लिए आसान मानी जा रही सीटों को देखें। पाटलिपुत्र, शिवहर, मधुबनी, दरभंगा, पश्चिमी चंपारण, मुजफ्फरपुर, महाराजगंज, सारण, बेगूसराय और औरंगाबाद की सीट भाजपा के लिए आसान है। पाटलिपुत्र सीट पर राजद ने लालू प्रसाद की बेटी मीसा भारती को उतार कर रामकृपाल यादव के लिए लड़ाई आसान कर दी। वहां सवर्ण खास कर भूमिहार आबादी बहुत बड़ी संख्या में है, जिसका वोट भाजपा को मिलेगा। इस सीट पर लालू खुद भी हारे हैं और मीसा भारती भी हार चुकी हैं।शिवहर में तेज प्रताप और तेजस्वी के झगड़े में राजद ने मुस्लिम उम्मीदवार उतारा, जिससे रमा देवी की लड़ाई आसान हुई। अगर वहां राजद का राजपूत उम्मीदवार होता तो लड़ाई मुश्किल होती। मधुबनी में निर्दलीय लड़ गए डॉक्टर शकील अहमद ने भाजपा के अशोक यादव की राह आसान कर दी है तो दरभंगा में राजद के अब्दुल बारी सिद्दीकी की वजह से वोटों का ध्रुवीकरण होना तय माना जा रहा है, जिसका फायदा भाजपा के गोपाल जी ठाकुर को मिलेगा। 

मुजफ्फरपुर सीट पर दो मल्लाह उम्मीदवारों का मुकाबला है। भाजपा के अजय निषाद की स्थिति मल्लाह व दूसरी अति पिछड़ी जातियों और भूमिहार वोटों को ध्रुवीकरण की वजह से मजबूत है। महाराजगंज में भाजपा और राजद दोनों के राजपूत उम्मीदवार हैं पर लालू प्रसाद के साले साधु यादव के निर्दलीय चुनाव लड़ने से वहां राजद को नुकसान हो रहा है। सारण सीट पर तेज प्रताप यादव खुद ससुर चंद्रिका यादव का विरोध कर रहे हैं। बेगूसराय में सीपीआई के कन्हैया कुमार और राजद के तनवीर हसन के लड़ने से भाजपा को गिरिराज सिंह को फायदा हुआ है। औरंगाबाद सीट पर 1952 के बाद से सिर्फ राजपूत सांसद ही जीता है। इस बार भी इसी वजह से सवर्ण मतों का ध्रुवीकरण हुआ है। जीतन राम मांझी की पार्टी हम ने इस सीट पर कुशवाहा उम्मीदवार दिया पर वह पिछड़ी जातियों को एकजुट नहीं कर पाया। 

अब जिन सीटों पर भाजपा के लिए मुश्किल है उन पर नजर डालें। पटना साहिब, आरा, पूर्वी चंपारण, बक्सर, सासाराम, अररिया और उजियारपुर मुश्किल सीटें हैं। पूर्वी चंपारण सीट पर भाजपा के दिग्गज नेता राधामोहन सिंह चुनाव लड़ रहे हैं। उनको रालोसपा के आकाश प्रसाद सिंह चुनौती दे रहे हैं। वे भूमिहार हैं और पूरे बिहार में नरेंद्र मोदी व भाजपा का सबसे कट्टर समर्थक माने जाने वाले भूमिहार जाति के नाम पर उनको वोट कर रहे हैं। इस सीट पर 17 लाख वोट में ढाई लाख यादव और तीन लाख के करीब मुस्लिम हैं। दो लाख भूमिहार और डेढ़-डेढ़ लाख कुशवाहा व मल्लाह वोट हैं। राधामोहन सिंह की अपनी जाति का वोट सिर्फ 50 हजार है। वे करीब सवा तीन लाख वैश्य वोट के सहारे टक्कर देने की उम्मीद कर रहे हैं। 

आरा सीट पर आरके सिंह की लड़ाई मुश्किल इसलिए हुई है क्योंकि राजद ने यह सीट सीपीआई माले के लिए छोड़ी है, जिसके राजू यादव चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे ही बक्सर में राजपूत मतदाता भाजपा के अश्विनी चौबे को छोड़ कर राजद के जगदानंद सिंह के नारे लगा रहे हैं, इससे भाजपा की मुश्किल बढ़ी है। सासाराम में मीरा कुमार की वजह से लड़ाई कांटे की टक्कर में बदली है। उजियारपुर सीट पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय इस बार अपनी जाति के वोट नहीं ले पाए हैं तो बिहार में भूमिहार उम्मीदवार कम उतारने का दोषी मानते हुए भूमिहारों ने भी उनका विरोध किया है। इससे रालोसपा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा की लड़ाई आसान हुई है। 

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