झारखंड में गणित भाजपा के खिलाफ


[EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 12 May, 2019 07:12 AM | Total Read Count 269
झारखंड में गणित भाजपा के खिलाफ

बिहार से उलट और उत्तर प्रदेश से मिलते जुलते अंदाज में झारखंड में गणित भी भाजपा के खिलाफ है और सामाजिक समीकरण भी भाजपा के खिलाफ है। वैसे भाजपा ने सामाजिक समीकरण और वोट की केमिस्ट्री सही करने के लिए आजसू के साथ तालमेल का विस्तार किया है और पहली बार अपनी इस सहयोगी पार्टी को लोकसभा की एक सीट दी है। भाजपा की सहयोगी आजसू इस बार गठबंधन में गिरिडीह लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रही है, जहां पांच बार से भाजपा जीत रही थी। झारखंड में आदिवासी के बाद सबसे ज्यादा मजबूत माने जाने  वाले महतो वोट के लिए भाजपा ने आजसू को एक सीट दी, जहां से चंद्रप्रकाश चौधरी चुनाव लड़ रहे हैं। उनके अलावा एक अपनी सीट पर भी भाजपा ने महतो उम्मीदवार दिया है और इस बार राजद से लाकर अन्नपूर्ण देवी के रूप में एक यादव उम्मीदवार भी उतारा है। इस तरह भाजपा ने आदिवासी के अलावा सवर्ण, वैश्य, महतो, यादव और दलित का समीकरण बनाने का प्रयास किया है। 

पर भाजपा के साथ मुश्किल यह है कि राज्य में रघुवर दास की सरकार ने जमीन से जुड़े कानूनों में जो बदलाव किया और डोमिसाइल कानून में जैसा बदलाव किया उससे जमीनी स्तर पर पार्टी का समीकरण बिखरा है। इसके बावजूद पार्टी के नेता मोदी, मोदी के हल्ले से कई सीटों पर चुनाव जीतने की उम्मीद कर रहे हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा, घर में घुस कर मारने वाले मोदी के भाषण और मुस्लिमफोबिया की वजह से कई जगह ध्रुवीकरण की उम्मीद की जा रही है। पर वोटों को गणित और सामाजिक समीकरण के हिसाब से देखें तो भाजपा के लिए सारी सीटें मुश्किल लड़ाई वाली दिख रही हैं। 

सबसे पहले 2014 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव के आंकड़ें को देखें तब भी पता चलता है कि महागठबंधन बनने से क्या बदलाव होगा। 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी सुनामी थी तब भाजपा सभी 14 सीटों पर लड़ी थी और उसको 40 फीसदी वोट मिले थे। उसने 12 सीटें जीत ली थीं। उसकी सहयोगी आजसू तब अलग लड़ गई थी और उसको 3.7 फीसदी वोट मिले थे। उसका वोट भाजपा के साथ जोड़ने पर उसका आंकड़ा 43.7 फीसदी का बनता है। 

दूसरी ओर विपक्षी गठबंधन में कांग्रेस को कोई सीट नहीं मिली थी पर उसे 13.3 फीसदी वोट मिले थे। झारखंड मुक्ति मोर्चा को 9.3 फीसदी वोट मिले और उसने दो सीटें जीतीं। बाबूलाल मरांडी की पार्टी जेवीएम सभी 14 सीटों पर लड़ी और उसे 12 फीसदी वोट मिले। तृणमूल कांग्रेस पार्टी को 2.4 और राजद को 1.2 फीसदी वोट मिले थे। अगर विपक्ष के इस वोट को मिला दें तो इसका आंकड़ा 38 फीसदी वोट का बनता है। इस लिहाज से भाजपा गठबंधन वोट में आगे है। पर विधानसभा चुनाव में यह आंकड़ा बदल गया। 2014 के अंत में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा 40 से घट कर 31.3 फीसदी पर आ गई। उसकी सहयोगी आजसू को 3.7 फीसदी ही वोट मिले। दोनों का वोट करीब 35 फीसदी बनता है। दूसरी ओर झारखंड मुक्ति मोर्चा को 20.4, कांग्रेस को 10.5 और जेवीएम को दस फीसदी वोट मिले। इनका साझा वोट प्रतिशत 41 फीसदी हो जाता है। यानी भाजपा और उसकी सहयोगी से छह फीसदी ज्यादा। इसमें राजद और मधु कोड़ा की पार्टी का वोट भी इस बार कांग्रेस गठबंधन में जुड़ गया है। 

भाजपा इस बार 13 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। गिरिडीह सीट उसने आजसू को दी है बाकी – रांची, खूंटी, लोहरदगा, पलामू, चतरा, जमशेदपुर, सिंहभूम, हजारीबाग, धनबाद, कोडरमा, गोड्डा, दुमका और राजमहल सीटों पर भाजपा लड़ रही है। इनमें से दुमका और राजमहल छोड़ कर बाकी 11 सीटें भाजपा ने जीती थीं। इस बार सारी विपक्षी पार्टियों के एक साथ आने से भाजपा के लिए लड़ाई मुश्किल हुई है। जमीन से जुड़े दो कानूनों- संथालपरगना टेनेंसी एक्ट, एसपीटी और छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट यानी सीएनटी को बदलने के कारण भाजपा आदिवासियों के बीच बेहद अलोकप्रिय हुई है। रांची से सटे कई जिलों में पत्थलगड़ी का अभियान भी भाजपा विरोध का प्रतीक है, जिसमें आदिवासियों ने राज्य की सत्ता को मानने से इनकार कर दिया था। इस तरह के अलग अलग कारणों से भाजपा आदिवासियों और दलितों में अलोकप्रिय हुई है। गिरिडीह के ब्राह्मण सांसद रविंद्र पांडेय और कोडरमा के भूमिहार सांसद रविंद्र राय की टिकट काटने से भाजपा के सबसे मजबूत सवर्ण समर्थक भी नाराज हैं। मुस्लिम और ईसाई मतदाता पूरी तरह से भाजपा को हराने के लिए प्रतबिद्ध है, जिनकी संख्या झारखंड में अच्छी खासी है। इसका नतीजा यह है कि चार-पांच सीटों को छोड़ कर बाकी सीटों पर भाजपा-आजसू गठबंधन की स्थिति अच्छी नहीं है। 

सबसे भाजपा के लिहाज से मजबूत सीटों पर नजर डालें। धनबाद, चतरा, हजारीबाग और जमशेदपुर को भाजपा की मजूबत सीट माना जा सकता है। जमशेदपुर सीट जेएमएम के खाते में है, जिसने आदिवासी प्रत्याशी चंपई सोरने को उतारा है। इससे कास्मोपोलिटन संरचना वाले जमशेदपुर में लड़ाई भाजपा के निवर्तमान सांसद विद्युत वरण महतो के लिए आसान हो गई है। ऐसे ही चतरा में महागठबंधन टूट गया है। कांग्रेस के मनोज यादव के मुकाबले राजद के सुभाष यादव भी मैदान में हैं। इससे तमाम नाराजगी के बावजूद भाजपा के सुनील सिंह के लिए लड़ाई आसान हो गई है। 

हजारीबाग में कांग्रेस ने आखिरी समय तक टिकट रोके रखा और अंत में पता नहीं किस वजह से कारोबारी गोपाल साहू को टिकट दे दिया, जिससे जयंत सिन्हा की लड़ाई आसान हो गई। धनबाद में कांग्रेस ने दरभंगा के निवर्तमान सांसद कीर्ति आजाद को उम्मीदवार बनाया है। उनके बारे में कहा जा रहा है कि सेलिब्रेटी उम्मीदवार होने की वजह से वे बहुत जुझारू अंदाज में नहीं लड़ रहे हैं। हालांकि इसी इलाके की एक सीट से भाजपा के विधायक संजीव सिंह के भाई के निर्दलीय चुनाव लड़ जाने से राजपूत बंटने की संभावना जताई जा रही है। अगर ऐसा होता है तो भाजपा के लोकसभा उम्मीदवार पीएन सिंह के लिए लड़ाई आसान नहीं रह जाएगी। भाजपा की सहयोगी आजसू के लिए गिरिडीह की सीट अपेक्षाकृत आसान दिख रही है। जेएमएम और आजसू दोनों के उम्मीदवार एक जाति से हैं और चुनाव से पहले आजसू उम्मीदवार चंद्रप्रकाश चौधरी ने जेएमएम के एक विधायक जेपी पटेल को तोड़ लिया। इससे समीकरण उनके पक्ष में दिख रहा है। 

बाकी नौ सीटों पर महागठबंधन की स्थिति मजबूत दिख रही है। राजधानी रांची में भाजपा ने अपने कई बार के सांसद रामटहल चौधरी की टिकट काट कर संजय सेठ को उम्मीदवार बनाया। अब रामटहल चौधरी निर्दलीय चुनाव लड़े हैं और कुर्मी वोट में बहुत बड़ी सेंध लगाई हैं। इसके उलट कांग्रेस के सुबोधकांत सहाय के समर्थन में कांग्रेस, जेएमएम, जेवीएम और राजद गठबंधन ने पूरी ताकत लगा कर चुनाव लड़ा है। लोहरदगा और खूंटी दो सीटों का फैसला ईसाई मतदाताओं की वोटिंग से होता दिख रहा है। दोनों जगह ईसाई मतदाताओं की बहुत भारी संख्या है और कांग्रेस के उम्मीदवारों को उनका एकतरफा वोट मिला है। सिंहभूम सीट पर मधु कोड़ा की पत्नी गीता कोड़ा कांग्रेस की टिकट पर लड़ रही हैं। पिछली बार वे निर्दलीय लड़ी थीं और तब कांग्रेस के उम्मीदवार चंद्रसेन शिंकू को एक लाख 15 हजार वोट मिले थे। गीता कोड़ा इससे कम वोट के अंतर से हारी थीं। सो, इस बार कांग्रेस की टिकट से लड़ने पर उनको एडवांटेज माना जा रहा है। भाजपा ने निवर्तमान सांसद लक्ष्मण गिलुआ को टिकट दिया है, जिनके खिलाफ एंटी इन्कंबैंसी भी मानी जा रही है। उधर कोडरमा में इस बार भाजपा ने अपने सांसद रविंद्र राय की टिकट काट कर उनकी जगह राजद की नेता अन्नपूर्ण देवी को टिकट दिया है। उनके खिलाफ गैर यादव वोटों के ध्रुवीकरण की चर्चा है। आदिवासी और गैर यादव वोटों की वजह से मरांडी की स्थिति मजबूत मानी जा रही है। 

संथालपरगना इलाके में गोड्डा सीट पर पिछली बार निशिकांत दूबे वोटों को बंटवारे से जीती थे। कांग्रेस के फुरकान अंसारी को उन्होंने 60 हजार वोट के अंतर से हराया था, जबकि मरांडी की पार्टी जेवीएम के प्रदीप यादव को एक लाख 92 हजार वोट मिले थे। इस बार प्रदीप यादव महागठबंधन से लड़ रहे हैं और तभी उनकी स्थिति मजबूत मानी जा रही है। दो अन्य सीटें दुमका और राजमहल की हैं, जो पिछली बार भी जेएमएम ने जीती थी। इस बार भी शिबू सोरेन और विजय हांसदा की स्थिति मजबूत मानी जा रही है। बिहार से सटे इलाके की पलामू सीट पर राजद के उम्मीदवार घूरन राम की स्थिति भाजपा के निवर्तमान सांसद वीडी राम के मुकाबले अच्छी मानी जा रही है। 

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