• [EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 28 April, 2019 08:10 AM | Total Read Count 1716
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यूपी, बिहार, झारखंड की 134 में से भाजपा को 42 सीट के लाले!

हां, गपशप कॉलम के आज के इस शीर्षक को 23 मई को जरूर याद रखें। और नोट रखें कि इन तीन राज्यों की 134 सीटों में से 2014 में भाजपा को 105 सीट मिली थी। तब 105 और अब 42 सीट का मेरा यह विश्लेषण-अनुमान इस धारणा पर है कि नरेंद्र मोदी को उतना ही वोट मिलेगा, जितना 2014 की आंधी में मिला था। 2014 में भाजपा को इन तीन राज्यों में जितना वोट मिला था मैं उसे 2019 के आज के चुनाव तराजू के भाजपाई पलड़े में जस का तस डाल रहा हूं मगर दूसरे पलड़े में यूपी में बसपा, सपा और रालोद को 2014 में जितना कुल वोट मिला था उसे रख रहा हूं। ध्यान रहे तब तीनों पार्टियां अलग-अलग लड़ी थी। लेकिन इस चुनाव में तीनों के कुल वोट मोदी विरोधी पलड़े में जा रहे हैं। तो नतीजा क्या बनता है? नतीजा होगा कि भाजपा को 80 में से सिर्फ 24 सीट! इसमें गोरखपुर, कैराना, फूलपुर की वे तीन सीट भी है, जहां हाल के उप चुनावों में एलायंस के कुल वोट के आगे भाजपा हारी था। लेकिन कसौटी क्योंकि 2014 में पड़े वोट की है इसलिए उस अनुसार तीनों सीटों पर तब एलायंस का कुल वोट कम था। तभी इन्हें मैं भाजपा की 24 सीटों में शामिल कर रहा हूं! अन्यथा भाजपा के पलड़े में 21 सीट। 

मतलब सपा-बसपा-रालोद के 2014 के कुल वोट यदि अभी इनके उम्मीदवारों को मिले (हालांकि इनके बढ़ने के लक्षण उप चुनाव से, जाट, गुर्जर में बिखराव, कांग्रेस द्वारा भाजपा के फारवर्ड वोट काटने, भाजपा सांसदों के खिलाफ एंटी इन्कंबैंसी जैसे कारण से) तो भाजपा 2014 की 71 सीटों में से 24 सीट ही बचा सकती है। इस पैमाने में गाजियाबाद, नोएडा, मेरठ, सहारनपुर, आगरा, मथुरा, अलीगढ़, एटा, पीलीभीत, कानपुर, लखनऊ, फूलपुर, देवरिया गोरखपुर जैसी भाजपा की 50 प्रतिशत से अधिक वोट पाने वाली सीटें भी हैं। मगर हां, मुजफ्फरनगर और बागपत की दो सीट को अजित सिंह-रालोद-सपा-बसपा एलायंस की नई स्थिति, जाट वोट बंटने की चर्चा से मेंने अलग रखा है तो गोरखपुर, फूलपुर को मैंने भाजपा के 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट लेने की कैटेगरी में रखा है। ध्यान रहे 2014 में यूपी में भाजपा विरोधी वोट बांटने के रोल में तब पीस पार्टी, आप पार्टी भी थे। यदि उन वोटों और कांग्रेस के भाजपा के फारवर्ड तोड़ने का हिसाब लगाएं तो यूपी में भाजपा का 23 मई को भगवान ही मालिक है।  

यूपी के सिलसिले में और भी तथ्य नोट करें। 2014 के बाद प्रदेश में भाजपा का वोट घटता गया है। 2017 के विधानसभा चुनाव में भारी मोदी आंधी थी। उससे मतदान बढ़ा। 2014 के लोकसभा चुनाव मे मतदान हुआ 58.4 प्रतिशत। तब भाजपा का वोट 42.6 प्रतिशत था तो सपा-बसपा-रालोद के कुल वोटों का जोड़ 43 प्रतिशत था। 2017 के विधानसभा चुनाव में मतदान बढ़ 60.7 प्रतिशत हुआ। मगर उसमें भाजपा का वोट घट कर 40 प्रतिशत रह गया तो सपा-बसपा-रालोद के कुल वोट बढ़ कर 46.2 प्रतिशत हो गया। कितनी गजब बात है कि 2014 हो या 2017 की आंधी दोनों वक्त भाजपा के मुकाबले सपा-बसपा-रालोद का साझा वोट भाजपा से अधिक। लेकिन ये तीनों पार्टियां 2014 व 2017 में अलग-अलग लड़ी थीं तो सीट का नतीजा उलटा था। भाजपा 2017 में घटे वोट के बावजूद 312 विधानसभा सीटे जीती। आज तीनों पार्टियां एकजुट चुनाव लड़ रही हैं। इनका वोटर छप्पर फाड़ अंदाज में अपने इलाकों में वोट डालता दिख रहा है। 

इसके बाद लोकसभा के तीन उपचुनाव हुए तो उनमें भी भाजपा का वोट प्रतिशत घटा। मतलब 2014 लोकसभा चुनाव, 2017 का विधानसभा चुनाव और उप चुनाव तीनों का निचोड़ सपा-बसपा-रालोद के इकट्ठे होने पर भाजपा से ज्यादा वोट मिलने का है। तभी मौजूदा चुनावी तराजू में भाजपा बनाम एलायंस के वोटों के दो पलड़ों से नतीजा बनता है कि भाजपा 24 सीटों पर और सपा-बसपा-रालोद एलायंस 50 पर और अन्य छह सीट पर। 

यह अनुमान तभी फेल हो सकता है जब मुसलमान, दलित, यादव अभी मोदी भक्त हुए हों। अब ऐसा होना या ईवीएम से धांधली की बात मैं नहीं मानता हूं। मैं आकंड़ों व तर्क से विचार-विश्लेषण करता हूं। 

तीन राउंड के मतदान के संकेतों से भाजपा के लिए खतरे की घंटी बजी हुई है। एक तो चुनाव में वोट प्रतिशत 2014 व 2017 के मुकाबले कम है और दूसरे दलित, यादव, मुसलमान वोट गोलबंदी के साथ तीनों पार्टियों में परस्पर ट्रांसफर हो रहे हैं। तीसरे शहरी इलाकों में कम मतदान है तो देहात में ज्यादा। 

झारखंड और बिहार की 54 सीटें 
ऐसे ही झारखंड में कांग्रेस-जेएमएम-जेवीएम का एलायंस भाजपा के लिए भारी है। 2014 में ये अलग-अलग लड़े थे। तब इन तीनों के जितने वोट पड़े उनका जोड़ यदि भाजपा को मिले वोट के आगे रखें तो भाजपा को 14 सीटों में से पांच सीटों पर एलायंस से ज्यादा वोट है। भाजपा विरोधी लेफ्ट व छोटी पार्टियों का वोट अलग रख रहा हूं। 2014 में भाजपा को एक भी सीट पर 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट नहीं था। एलायंस के वोटों के मुकाबले भाजपा के ज्यादा वोट की सीटें बड़े शहर के केंद्र वाली हैं। 2014 के वोट तराजू में भाजपा का पलड़ा जिन सीटों पर एलायंस से ज्यादा वोट लिए था वे थीं रांची, धनबाद, हजारीबाग और चतरा व पलामू। छठी सीट कोडरमा में एलायंस-सीपीआईएमएल के उम्मीदवार का जोड़ भाजपा से अधिक है लेकिन अभी इस पर एलायंस में लेफ्ट का कंफ्यूजन है। बावजूद इसके कोडरमा को भी भाजपा लिस्ट में जोड़ें तो छह सीट की संख्या बनती है। मैं खुद झारखंड घूम कर आया हूं और प्रदेश के सर्वाधिक विश्वसीय बुजुर्ग पत्रकार अपने आरएस अग्रवाल का मानना है कि झारखंड में भाजपा की हजारीबाग के अलावा दूसरी कोई सीट समझ नहीं आ रही है तो मुझे रांची, जमेशदपुर, धनबाद शहरी आबादी के कारण समझ आती है। अपना दो टूक आकलन है कि पूरा आदिवासी समाज (ईसाई और गैर-ईसाई दोनों) दलित व मुसलमान गोलबंद चुपचाप हैं तो कुर्मी, भूमिहार, ब्राह्मण वोटों में सीटवार नाराजगी भी है। इस सबके बावजूद यदि 2014 जितना ही वोट भाजपा पा जाए तब भी 14 सीटों में से भाजपा की छह सीट ही बनती है। 

अब विचार करें बिहार की 40 सीटों पर। 2014 में भाजपा ने 22 सीटें जीती थीं। इस बार वह चुनाव ही 17 सीटों पर लड़ रही है। सो, पांच सीट का वैसे ही नुकसान है। 2014 के चुनाव में जनता दल (यू), राजद अलग-अलग लड़े थे। फिर 2015 के विधानसभा चुनाव में अलग समीकरण था। इस चुनाव में अलग है। बावजूद इसके जिन सीटों पर भाजपा चुनाव लड़ रही है उन सीटों पर राजद-कांग्रेस-कुशवाह-मांझी-सीपीआईएमएल के एलायंस में 2014 व 2015 के विधानसभा चुनाव नतीजों के आंकड़ों को लोकसभा सीट में कन्वर्ट कर आज के तराजू में भाजपा के पलड़े और एलायंस के पलड़े में उन वोटों को रखें तो भाजपा बिहार में 12 सीटों से अधिक का आंकड़ा नहीं छूती है। 

बक्सर, गोपालगंज, मधुबनी, महाराजगंज, सारण, मुजफ्फरपुर, पश्चिम चंपारण, पटना साहिब, पूर्वी चंपारण, सासाराम, शिवहर, सिवान की 12 सीट पर 2014 और 2015 के विधानसभा दोनों के नतीजों में आंकडे भाजपा के फिट बैठते हैं तो ये सीटें अधिकतम हैं। अभी माहौल के हिसाब से पटना साहिब में शत्रुघ्न सिन्हा, सासाराम में मीरा कुमार आदि के भारी मुकाबले की बातें हैं। पर उस सबको छोड़ें और 2014 व 2015 के आंकड़ों में भाजपाई पलड़े की 12 सीट का हिसाब मानें तो यूपी, झारखंड और बिहार की 134 सीटों में से भाजपा का जोड़ तीन अलग-अलग एलायंस के चलते सिर्फ 42 सीटों का समझ आ रहा है। आप नहीं मानते? कोई बात नहीं। 23 मई तक इंतजार करें!

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