राष्ट्रवाद से ध्रुवीकरण की उम्मीद


[EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 05 May, 2019 07:27 AM | Total Read Count 267
राष्ट्रवाद से ध्रुवीकरण की उम्मीद

नरेंद्र मोदी ने अपने चेहरे के बाद सबसे ज्यादा जिस चीज का चुनाव में इस्तेमाल किया है वह राष्ट्रवाद का मुद्दा है। उन्होंने इसके बारे में भी चुनावी सभाओं में कह दिया है कि कांग्रेस और विपक्षी पार्टियों के नेता चाहे कुछ भी कहें वे राष्ट्रवाद और देश की सुरक्षा का मुद्दा सभाओं में उठाते रहेंगे। देश की सुरक्षा को उन्होंने देश की सबसे बड़ी चिंता बताया है। उन्होंने कहा है कि विकास के लिए सुरक्षा सबसे जरूरी है। हालांकि पिछली बार जब वे विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे थे तब उन्होंने सुरक्षा का एक बार भी जिक्र नहीं किया था। इसी तरह उन्होंने यह भी कहा है कि आतंकवाद से गरीब सबसे ज्यादा प्रभावित होता है। ऐसा कैसे होता है इसका अंदाजा किसी को नहीं है। 

राष्ट्रवाद, आतंकवाद, सुरक्षा, पाकिस्तान आदि के नाम पर मोदी समझ रहे हैं कि वोटों का ध्रुवीकरण करा देंगे। पर अगले तीन चरण में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, झारखंड और महाराष्ट्र में जमीनी स्तर पर ये मुद्दे नदारद हैं। राष्ट्रवाद की बजाय जातिवाद का मुद्दा ज्यादा हावी है। पाकिस्तान की बजाय उम्मीदवार का चेहरा ज्यादा अहम है। सीमा की सुरक्षा से ज्यादा लोगों के लिए अपनी नौकरी, रोजगार और आर्थिकी की सुरक्षा ज्यादा महत्वपूर्ण लग रही है। झारखंड में आदिवासी अस्मिता का मामला किसी दूसरे मामले से ज्यादा अहम है। राज्य सरकार ने संथालपरगना और छोटानागपुर के जमीन के कानून को बदला है तो यह आदिवासियों के ज्यादा बड़ा मुद्दा है। मूलवासी कानून में हुआ बदलाव उनके लिए जीवन मरण का सवाल है। उनके लिए राष्ट्रवाद और सुरक्षा के मुद्दे चोंचले भर है।

महाराष्ट्र में जमीनी स्तर पर कहीं भी राष्ट्रीय मुद्दों की छाप नहीं है। मराठी आरक्षण का मुद्दा उससे ज्यादा अहम है। दलित और मराठों का टकराव कई जगहों पर निर्णायक फैक्टर बनता दिख रहा है। किसानों का आंदोलन चुनाव को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाला मुद्दा बना है। मराठे, दलित, पिछड़े सब अपने अपने हिसाब से अपनी पोजिशनिंग कर रहे हैं। किसानों के लिए अपने मुद्दे सबसे ऊपर हैं। वे पूछ रहे हैं कि फसल बीमा योजना का क्या लाभ मिला और उनके लिए सिंचाई की व्यवस्था क्यों नहीं हुई। किसानों की आत्महत्या और कर्ज का मामला उनके लिए ज्यादा अहम है। महाराष्ट्र के ज्यादातर इलाकों में गरमियां शुरू होते ही पीने के पानी की समस्या खड़ी हो गई है। लोग इस बारे में पूछ रहे हैं। ऐसा नहीं है कि मोदी को इस बारे में पता नहीं है। उनको महाराष्ट्र और बुंदेलखंड इलाके के पानी की समस्या का पता है तभी उन्होंने शुक्रवार को अपने भाषण में कहा कि उनकी सरकार पानी के लिए एक अलग मंत्रालय बनाएगी। हालांकि राष्ट्रवाद के उनके अपने बनाए हल्ले में यह मुद्दा चर्चा में नहीं आया है पर जमीनी स्तर पर लोग ऐसी ही समस्याओं को ध्यान में रख कर वोटिंग कर रहे हैं। 

उत्तर प्रदेश और बिहार में राष्ट्रवाद, पाकिस्तान, सुरक्षा, आतंकवाद के मसले पर गठबंधन का जातीय समीकरण हावी है। हकीकत है कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का कोर वोट एकजुट होकर मतदान कर रहा है। यादव, दलित और मुस्लिम का गजब समीकरण बना है। जमीनी स्तर पर इसी की ज्यादा चर्चा है। बरसों तक सत्ता में रही दोनों पार्टियों के पास दबंग नेता और जमीनी कार्यकर्ता हैं। दूसरी ओर केंद्र की पांच साल और राज्य की दो साल की सरकार में पूरी तरह उपेक्षित रहे भाजपा के कार्यकर्ता और नेता व सांसद हैं, जिनकी कोई पहचान नहीं बनी है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने खुद ही माना है कि सपा और बसपा की सरकार आती है तो सिर्फ अपनी समर्थक जातियों के लिए काम करती है। इससे अंदाजा हो जाता है कि दोनों की समर्थक जातियां कितनी मजबूती से उनके साथ खड़ी होंगी। इसके मुकाबले भाजपा ने अपनी समर्थक जातियों और कार्यकर्ताओं की अनदेखी की है। यहीं कारण है कि मोदी के चेहरे और हवा हवाई नारों के बावजूद भाजपा का जमीनी आधार खिसका हुआ है। 

बिहार में जरूर भाजपा ने नीतीश कुमार के सहारे जातीय समीकरण साधने का प्रयास किया। मोदी के अति पिछड़ा होने के बयान और नीतीश कुमार के पुराने अति पिछड़ा व महादलित समीकरण से भाजपा को अच्छे प्रदर्शन का भरोसा है। राजद में लालू परिवार के सदस्यों के झगड़े और कांग्रेस व राजद में टिकट बंटवारे की गड़बड़ियों से भी भाजपा का भरोसा मजबूत हुआ है। पर जमीनी स्तर पर अब भी राजद का महागठबंधन बड़ी चुनौती है। इसमें मुकेश सहनी की वजह से मल्लाह और उपेंद्र कुशवाहा की वजह से कोईरी समाज का बड़ा वोट जुटा है। जमीनी स्तर पर यह मल्लाह और कई जगह कुशवाहा भी लालू के यादव मतदाताओं की तरह आक्रामक होकर महागठबंधन का साथ दे रहे हैं। ऊपर से भाजपा और जदयू दोनों ने अपने परंपरागत सवर्ण मतदाताओं खास कर ब्राह्मण और भूमिहार को कम टिकट देकर नाराज किया है। पिछले दिनों बिहार भाजपा के प्रभारी भूपेंद्र यादव का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वे कहते दिख रहे हैं कि भूमिहार जाएंगे कहां! हिंदू-मुस्लिम, अगड़ा-पिछड़ा और भारत-पाकिस्तान की नैरेटिव से भाजपा को लग रहा है कि ब्राह्मण, भूमिहार अपने आप भाजपा को वोट देंगे। वे राजद के साथ नहीं जा सकते हैं। पर यह गलतफहमी भाजपा को भारी पड़ सकती है। 

बचे हुए चरणों में पश्चिम बंगाल इकलौता राज्य है, जहां हिंदू-मुस्लिम का नैरेटिव काम कर रहा है और भाजपा ने जमीनी स्तर पर जातियों का समीकरण भी बनाया है। भाजपा ने बांग्लादेश से आए हिंदुओं, जो उत्तर और दक्षिण 24 परगना और नाडिया जिले में बड़ी संख्या में हैं उन पर फोकस किया है। मतुआ समुदाय के करीब 65 लाख मतदाताओं को ध्यान में रख कर भाजपा ने रणनीति बनाई है। इसका जरूर उसे फायदा मिलेगा। सीटें मिलेंगी या नहीं, यह नहीं कहा जा सकता है पर उसका वोट जरूर बढ़ेगा। 

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