मोदी हवा के पांच झूठ


[EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 05 May, 2019 08:21 AM | Total Read Count 726
मोदी हवा के पांच झूठ

पहला झूठ की पश्चिम बंगाल में भाजपा को कम से कम 14 और अधिकतम 20 सीटे मिलेगी। दूसरा झूठ है कि ओडिशा में भाजपा को 12 से 16 सीट मिलेगी। तीसरा झूठ है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की कम से कम पचास सीट है। चौथा झूठ है कि केरल, तमिलनाड़ु, तेलंगाना व कर्नाटक के चार राज्य में हर में भाजपा को एक से तीन सीटों का फायदा है। पांचवा झूठ है राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र के चारों राज्यों में नरेंद्र मोदी की 2014 से बड़ी आंधी है और 2014 जितनी ही सीटे भाजपा को मिलेगी। इन पांच झूठ पर फिर मोदी भक्तों की थीसिस है कि भाजपा 2014 से भी ज्यादा 300 सीट जीतेगी। 

ये पांचों बाते झूठी है, खामोख्याली, गलतफहमी है। ऐसा 2014  के लोकसभा चुनाव में मोदी की आंधी और 2019 की आज की कथित मोदी हवा को 2014 के आंकड़ों व आज की जमीनी हकीकत के फर्क से बूझ सकते हैं। अपना मानना है कि 2014 में नरेंद्र मोदी को ले कर जो दिवानगी थी, जो आंधी थी वह आज कतई नहीं है। (अब जो 2014 से बड़ी आंधी कहते है उनके लिए फिर अपना यही कहना बनेगा कि तब ईवीएम मशीन में फ्राड का बंदोबस्त हुआ पड़ा होगा। लेकिन इसे मैं नहीं मानता। मैं गणित, लॉजिक, जमीनी हकीकत पर विश्लेषण करता हूं।) 

बहरहाल अब एक-एक कर इन झूठ पर विचार करें। पश्चिम बंगाल में चार चरण मतदान हो चुका है। अपना मानना है कि वहा 82-83 प्रतिशत औसत मतदान प्रमाण है कि ममता बनर्जी भाजपा को दो-चार सीट भी जीतने नहीं दे रही है। यदि मतदान कम होता। 65 प्रतिशत के औसत पर होता तो भाजपा 2014  के लोकसभा चुनाव के अपने 17 प्रतिशत वोट को तृणमूल कांग्रेस के 45 प्रतिशत से ऊपर तभी कर सकती है जब मतदान 60 प्रतिशत के आसपास होता। इस बात को समझना चाहिए कि 2014  में पश्चिम बंगाल की 42 में से 31 सीटे ऐसी थी जिस पर जीत का अंतर तीसरी पार्टी को मिले वोट से कम था।  मतलब जैसे अलीद्वारपुर में तृणमूल कांग्रेस सिर्फ 29.6 प्रतिशत वोट से जीती। नबंर दो पर लेफ्ट फ्रंट की आरएसपी को 27.7 प्रतिशत तो भाजपा को 27.4 प्रतिशत वोट मिले। मतलब कांटे की टक्कर में तब जैसे तैसे तृणमूल जीती थी। तब भी मतदान भारी मतलब 83.2 प्रतिशत हुआ। सो भाजपा और अमित शाह ने इस बार हल्ला बनाया कि लेफ्ट फ्रंट और आरएसपी अब खत्म है तो वामपंथियों का वोट कम होगा और वह वोट भाजपा को मिलेगा। लेफ्ट के 2014 में जो 3 लाख 40 हजार वोट मिलेे। वह या तो पड़ेगे नहीं और यदि डले तो भाजपा को मिलेंगे। अपना मानना है कि लेफ्ट के वोट कुछ लेफ्ट को ही और बाकि तृणमूल कांग्रेस को गए होंगे। भाजपा को कतई नहीं मिले होंगे। 

फिर भी सोचे कि इस सीट पर वापिस 2014 जैसे रिकार्ड तोड़ मतदान में 2014  के लेफ्ट वोटो में से कितने भाजपा को जा सकते हैं? वे यदि पांच प्रतिशत भाजपा को गए तो तय माने कि 10-15 प्रतिशत तृणमूल कांग्रेस को जाएंगे। लेफ्ट उम्मीदवार का इस बार वोट घटेगा लेकिन उसका बिखरा वोट तृणमूल को ज्यादा जाएगा। मतदान जब 2014 वाला ही हुआ है और लेफ्ट कमजोर बना है तो उसके वोट तृणमूल का वोट प्रतिशत बढ़ाएंगे न कि भाजपा का। तभी अपना मानना है कि भाजपा नई सीटे जीतने के बजाय उलटे 2014 में जीती आसनसोल, दार्जिलिंग जैसी सीटे भी हार सकती है। आसनसोल की सीट पर भाजपा के बाबुल सुप्रियो 36.8 (4.19 लाख वोट ले कर 70 हजार वोटो के अंतर से) प्रतिशत वोट पर जीते थे। तब नंबर दो पर तृणमूल उम्मीदवार को साढ़े तीन लाख (30.6 प्रतिशत) व सीपीएम उम्मीदवार को  2.55 लाख वोट मतलब 22.4 प्रतिशत वोट मिले थे। सीपीएम अब हाशिए पर है। ममता बनर्जी ने आसनसोल से भाजपा को हराने में धुआंधार मेहनत की है और मतदान भी पिछली बार के 77 प्रतिशत के आसपास हुआ है तो लेफ्ट के बिखरे वोट भाजपा को हराने के लिए गोलबंद हुए होंगे। मतलब तृणमूल को गए होंगे। भाजपा का 2014 का वोट (36.8 प्रतिशत) पीक था तो इस चुनाव में क्या लेफ्ट वाले वोट में सैंध लगा कर क्या अपना वोट 5-10 प्रतिशत बढ़ा सकती है। कतई नहीं। भाजपा निश्चित तब हो सकती है जब मतदान 60 प्रतिशत के आसपास होता। तब लेफ्ट वोटो के तृणमूल की और खिसकने या ममता की जोरजबरदस्ती के बावजूद 36 प्रतिशत के कोर वोट को भाजपा 4-5 प्रतिशत बढ़ा कर भाजपा यह सीट बचाए रख सकती थी। पिछले चुनाव जीतने रिकार्ड मतदान में नहीं।

आसनसोल का उदाहरण भाजपा की सर्वाधिक ठोस व जीती सीट का है। 2014 में भाजपा ने दो सीटे जीती थी, तीन पर वह नंबर दो थी और 30 सीटों पर नंबर तीन पर। नबंर तीन की पोजिशन वाली सीटों पर उसके वोट बहुत कम दस प्रतिशत से भी कम थे। वे कैसे 10-15 सीटों पर 40 प्रतिशत पार हो कर तृणमूल को पछाड़ने वाले हो सकते हैं?

एक और तथ्य नोट कर रखें। 2014 की पीक मोदी आंधी में बंगाल में भाजपा को कुल 17 प्रतिशत वोट मिला। लेकिन 2016 में विधानसभा चुनाव हुआ तो भाजपा का वोट घट कर 10 प्रतिशत रह गया। उधर लेफ्ट का वोट भी घटा। वह 23 प्रतिशत वोट से घट कर 20 प्रतिशत रह गया। लेकिन लेफ्ट, भाजपा के घटे का पूरा फायदा तृणमूल को हुआ। उसका 39.8 प्रतिशत वोट बढ कर 45.6 प्रतिशत हो गया। दूसरे नंबर पर कांग्रेस को फायदा हुआ। उसका वोट 9.7 प्रतिशत से बढ़ कर 12.4 प्रतिशत वोट हो गया। मतलब लेफ्ट का घटना तृणमूल और कांग्रेस का फायदा है न कि भाजपा का। इसलिए अपना मानना है कि पश्चिम बंगाल में 23 मई को तृणमूल की आंधी निकलेगी और दूसरे नंबर पर कांग्रेस रहेगी व भाजपा को दो सीट के भी लाले पड़ेंगे। 

कितनी बड़ी बात लिख दे रहा हूं मैं। पश्चिम बंगाल में भाजपा दो अंक मतलब 10 से पार सीट लेना तो दूर पिछली दो सीट भी बचा ले तो मुझे आश्चर्य होगा। 

अब भाजपा के ओडिशा झूठ पर आए। 2014 में 21 सीट में से भाजपा ने एक सीट जीती थी। 20 बीजू जनता दल ने। बीजद का वोट 44.8 और भाजपा का 21.9 प्रतिशत। तब भाजपा ने सुदंरगढ की एक सीट 18 हजार वोटो से जीती थी। बाकि बारगढ, कालाहांडी, संबलपुर की तीन सीट पर बीजद के मुकाबले वह 2-3 प्रतिशत वोटो के अंतर से हारी थी। नबरंगपुर, कोरापुट तब नबंर दो पर कांग्रेस कम वोटो से बीजद से हारी थी। ध्यान रहे 2014 में मोदी की आंधी थी। तभी  भाजपा को रिकार्ड तोड़ 21.9 प्रतिशत वोट मिला। और लोकसभा के साथ ही विधानसभा के चुनाव थे तो विधानसभा चुनाव में भाजपा का वोट कम याकि 18.2 प्रतिशत था। मतलब लोकसभा और विधानसभा के साथ-साथ हुए चुनाव में भाजपा के अपने वोट में कोई साढ़े तीन प्रतिशत वोट का फर्क। इसलिए क्योंकि नवीन पटनायक की लोकप्रियता का कोई मुकाबला नहीं है। तब विधानसभा चुनाव में भाजपा के 18.2 प्रतिशत के मुकाबले कांग्रेस को 26 प्रतिशत वोट मिले थे। मतलब कांग्रेस ओडिशा में मोदी की आंधी, नवीन पटनायक के जलवे में भी ताकत लिए हुए थी। वजह आदिवासी वोटो में कांग्रेस की जड़े हैं। और अपना मानना है कि ओडिशा से सटे झारखंड, छतीसगढ़ में जब आदिवासी-दलित बुरी तरह मोदी राज से खफा है तो भाजपा को नए वोट कहां से मिलेंगे 2014 की पीक आंघी में मध्यवर्ग, बामन, बनियों, पिछड़ों में मोदी को ओडिशा में जो वोट मिला था वह वापिस नवीन पटनायक को इसलिए जाएंगा क्योंकि साथ में विधानसभा चुनाव है। भाजपा ने प्रदेश में सरकार बनाने से ले कर पुरी लोकसभा सीट जीतने जैसी हवाबाजी भले कर रखी है लेकिन इतनी हिम्मत नहीं थी जो धर्मेंद्र प्रधान को मुख्यमंत्री घोषित करती या नवीन पटनायक के खिलाफ ममता खिलाफ जैसी आक्रामकता मोदी-शाह दिखलाते। तभी ओडिशा में भाजपा की 12 से 16 सीट जीतने की संभावना दूर-दूर तक नहीं है। 4 से 6 सीट जीत जाएं तो बड़ी बात है। मैं आदिवासी-दलित के मूड के चलते उलटे कांग्रेस को 1-2 सीटों का प्रदेश में फायदा समझ रहा हूं।

सो जो मोदीभक्त पश्चिम बंगाल और ओडिशा से भाजपा को बीस सीट का फायदा बूझ रहे हंै, वह सौ फीसद मुंगेरी लाल का हसीन सपना है। 

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