• [EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 05 May, 2019 08:12 AM | Total Read Count 392
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जहां मोदी हवा वहां भी नहीं 2014 की आंधी!

मैं पिछले सप्ताह लिख चुका हूं कि गुजरात, राजस्थान और मध्यप्रदेश भाजपा को 100 सीट पार कराने का लांच पैड है। लेकिन गुजरे सप्ताह राजस्थान और मध्यप्रदेश में हुए मतदान के बाद हल्ला ऐसा बनाया गया मानो  रिकार्ड मतदान का मतलब भाजपा की सभी सीटों पर जीत है। ऐसे ही यह हल्ला भी है कि कर्नाटक में 2014 में भाजपा को 17 सीटे मिली थी तो अब बीस से अधिक सीट है। तमिलनाड़ु, तेलंगाना और केरल में भी भाजपा को एक-एक, दो-दो सीट मिल सकती है। अपना मानना है कि 2014 वाली गारंटीशुदा जीत के गोवा, अरुणाचल और त्रिपुरा में भी भाजपा को नुकसान होगा तो राजस्थान, मध्यप्रदेश, छतीसगढ़ की 65 सीटों में उसे 23 सीट का नुकसान चलते-चलाते हैं। 2014 में भाजपा 65 में से 62 सीटो पर जीती थी। सो इन 65 सीटो में यदि बीस सीट भी भाजपा के हाथ से निकलती है तो इनकी भरपाई किसी और दूसरे राज्य से नहीं होती है। केवल गुजरात है जहां मोदी-शाह को 26 सीटों में से अधिकतम याकि 26 सीट भी मिल सकती है। हालांकि इस प्रदेश के जमीनी आंकड़े, जानकारों में भाजपा को तीन से छह सीट के बीच नुकसान की बात है। मगर मैं अहमदाबाद के सुधी आला अखबार मालिक संपादक, पत्रकारों की इस फीडबैक को दमदार मानता हूं कि जैसे बंगाल में ममता बनर्जी वोट डलवा रही है वैसे मोदी-शाह ने गुजरात में अपने वोट बनवा कर, उन्हें पूरा डलवाने का पुख्ता बंदोबस्त किया है। उसी अनुसार मतदान हुआ तो गुजरात में शत-प्रतिशत सीटे भाजपा की हो सकती है। 

लेकिन राजस्थान, मध्यप्रदेश और छतीसगढ़ में कांग्रेस की सरकारे होने से भाजपा को नुकसान हो रहा है। मध्यप्रदेश की 6 और राजस्थान की 13 सीटों के मतदान के बाद मिली फीडबैक का सार यही है कि प्रदेश कांग्रेस नेताओं, मंत्रियों, विधायकों और कार्यकर्ताओं ने दम लगा कर चुनाव लड़ा। इन राज्यों में मोदी, मोदी हवा का हल्ला अधिक था इसलिए कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों, कमलनाथ, अशोक गहलोत ने अपने जीवन की सर्वाधिक ताकत इस चुनाव में लगाई। जबकि भाजपा में उम्मीदवारों को छोड़कर नेताओं, जिला संगठन, भाजपा विधायकों ने केवल दिखावे वाली मेहनत की। मोदी जीता रहे हैं तो उम्मीदवार ने भी पैसे खर्च करने में कंजूसी बरती। मतलब प्रति बूथ पांच हजार रुपए टीम को देने की सोची तो उसे घटा कर कईयों ने ढाई हजार रुपए कर दिया। यानी भाजपा उम्मीदवार को मोदी जीता रहे है तो बाकि क्या चिंता के भाव में भाजपा उम्मीदवार मस्त रहे तो कांग्रेस जनों में करो-मरो का जूनुन है। इसलिए एक तरफ मोदी भक्तों के झूम कर वोट पड़े तो दूसरी और मोदी विरोधी भी पूरे वोट पड़े। 

इसमें आदिवासी-दलित बहुल सीटों पर भारी मतदान में अपना सवाल था कि क्या आदिवासी-दलित भी मोदी भक्त हो गए है। भाजपा की प्रबंधन टीम में से फीडबैक है कि हां, ऐसा है। इसलिए मध्यप्रदेश में 2014 की भाजपा जीत रीपिट होगी। तब दलित गुस्से वाले मुरैना, ग्वालियर या धार, खरगौन, मंडला, बालाघाट, शहडौल, टौंक-सवाई माधोपुर, बांसवाड़ा में सब तरफ भाजपा जीतेगी। इस पूछताछ अपने को कई तरह के जवाब मिले। जैसे एक यह कि आदिवासी घरों में प्रति वोट दो-दो हजार रुपए का नोट बंटा दिया गया है। संघ-भाजपा के संगठन ने चिंहित समर्थकों के वोट डलवाएं। 

अपने हिसाब से ये सब फालतू बाते हैं। नोट रखें कि मध्यप्रदेश की छह सीटों में से भाजपा के लिए अकेली एक सीट जबलपुर सुरक्षित लग रही है तो छिंदवाड़ा, सीधी कांग्रेस के लिए और बालाघाट, मंडला,शहडौल और सीधी में कांटे की टक्कर। कांग्रेस की यदि सरकार नहीं होती तो निश्चित तौर पर मध्यप्रदेश और राजस्थान में भाजपा के लिए एकतरफा 2014 जैसा चुनाव होता। इसलिए इन दो राज्यों में कांग्रेस को 12-15-20 सीट में जितनी भी सीट मिले वह सत्ता बल और कांग्रेस में करो-मरों के जुनून से होगा। ऐसा होना भाजपा के लिए 23 मई को खासा नुकसान है। 

मतलब ले दे कर केवल गुजरात में भाजपा के लिए 2014 के करीब का आंकड़ा बनता लगता है। 

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