• [EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 28 April, 2019 07:51 AM | Total Read Count 805
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मप्र, गुजरात, राजस्थान से भाजपा का सौ पार!

भाजपा को सौ सीट पार कराने का लांच पैड इस दफा गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश है। तीनों राज्यों की 80 सीटों में से पिछली बार भाजपा को 78 सीट मिली थी। इस दफा इन तीन प्रदेशों से भाजपा को 60 सीट एकमुश्त ऐसे मिलेगी, जिससे फिर कहीं से 25, कहीं से दस, कहीं से पांच, कहीं से 14 या दो या चार सीटों का जोड़ बनेगा और भाजपा 160 के आसपास टिकेगी। इन तीन राज्यों की 60-65 सीटें ही भाजपा की कोर ताकत हैं। बावजूद इसमें भी पिछली 78 सीट में कमी है। 18 घटे या 25, घटेगी जरूर। गुजरात में कुछ जानकार भाजपा को 26 में से पांच सीट के नुकसान की बात कर रहे हैं मैं तीन का नुकसान बूझ रहा हूं। ऐसे ही राजस्थान में 25 में से छह सीट, मध्य प्रदेश में 29 में से भाजपा की पिछली बार जीती 27 में से पांच याकि कुल सात सीट कांग्रेस को जाती देख रहा हूं। मतलब 80 में से 16 सीटें कांग्रेस को मिलें तब भी वह भाजपा का भारी नुकसान है। 16 की जगह 26 सीटों का भी नुकसान हो सकता है। इन तीन राज्यों से 60-65 सीटें जीतने के बाद ही भाजपा सौ पार करेगी। इसके आगे डेढ़ सौ सीट के आंकड़े पर पहुंचने के लिए उसे 85-90 सीटें चाहिए। यदि यूपी-बिहार-झारखंड की 42 सीट जोड़ें तब भी महाराष्ट्र-कर्नाटक, दिल्ली, हरियाणा आदि से पचास सीटों का जुगाड़ आसान नहीं होगा। इसलिए क्योंकि हर राज्य में सीट कम होने की आम चर्चा है। भाजपाई आंकड़ों का हिसाब लगाए भाजपाई प्रबंधक भी उत्तराखंड, हिमाचल से छतीसगढ़, असम, दिल्ली, हरियाणा में 2014 के मुकाबले सीट की कमी की बात मानते मिलेंगे। उस नाते भाजपा के आंकड़े का 160 तक पहुंच सकना भारी काम है। वह तभी संभव है जब बंगाल में तीस और ओड़िशा में भाजपा दस सीट जीते। लेकिन अभी तक के तीन राउंड के मतदान ट्रेंड और ग्राउंड जीरो रिपोर्ट में ऐसी संभावनाएं दूर-दूर तक नहीं हैं। 

संदेह नहीं कि नरेंद्र मोदी की हवा बहुत मुखर और गहरी है राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा और अन्य प्रदेशों के शहरी-महानगरी हलकों में। कांग्रेस से जहां भाजपा का सीधा हुआ मुकाबला है वहां नरेंद्र मोदी को वापिस प्रधानमंत्री बनाने का नौजवानों में हल्ला जबरदस्त है लेकिन इस हकीकत को भी नोट रखें कि आदिवासी, दलित, मुसलमान और मोदी-भाजपा विरोधी परंपरागत वोट जितना भी है वह मौन, चुपचाप होते हुए भी वोट डालने का इरादा लिए हुए है इसलिए आश्चर्य नहीं होगा कि राजस्थान और मध्य प्रदेश में मोदी-शाह हवा में उड़ते रहें और इन प्रदेशों में भी 60-40 प्रतिशत के अनुपात वाले चुनावी नतीजे आएं। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव का बेसिक फर्क यह है कि 2014 में मोदी-मोदी की हवा सर्वजनीय (मुस्लिम छोड़, कांग्रेसियों तक में भी) थी तो 2019 में मोदी की हवा सिर्फ मोदी भक्तों, नए नौजवानों और भाजपा के परंपरागत वोटों में है। मोदी-मोदी का जितना हल्ला है तो उसके खिलाफ विरोधी वोट चुपचाप हैं लेकिन वे भी वोट देने का निश्चय किए हुए हैं। बावजूद इसके मानें कि राजस्थान,मध्य प्रदेश, गुजरात इस चुनाव में भाजपा को सौ पार पंहुचाने के लांच पैड वाला रोल लिए हुए हैं।

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