मोदी की कथित आंधी में न लॉजिक, न गणित


[EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 12 May, 2019 07:57 AM | Total Read Count 481
मोदी की कथित आंधी में न लॉजिक, न गणित

सोचें, क्या 2014 की मोदी आंधी के वक्त जिन दलितों, जाटव, यादव, मुसलमान ने भाजपा के खिलाफ वोट बसपा, सपा को दिया था वे क्या2019 के इस चुनाव में मोदी को वोट दे रहे हैं? क्या 2014 व 2017 से बड़ी आंधी यूपी में मोदी की आज है? यदि नहीं तो भाजपा का सूपड़ा साफ है। हां, यूपी में लड़ाई का फैसला सिर्फ इस बात पर है कि 2014, फिर 2017 के विधानसभा चुनाव, फिर 2018 के गोरखपुर, फूलपुर, कैराना उपचुनाव में जितना वोट सपा,बसपा, रालोद का था वह एलायंस के उम्मीदवारों को मिल रहा है या नहीं? कैसे यह उलटी गंगा बह सकती है कि मायावती का जाटव, अखिलेश का यादव व मोदी विरोधी जितना भी जो परंपरागत वोट, मुसलमान-ईसाई-आदिवासी-दलित वोट है वह नरेंद्र मोदी को वोट डाल दे रहा हो! ऐसा नहीं है। मतलब उलटी गंगा नहीं है। सो, भाजपा साफ। ऐसे ही सोचें कि पश्चिम बंगाल में 2014में भाजपा को 17 प्रतिशत वोट मिले, फिर 2016के विधानसभा चुनाव में भाजपा के घट कर 10 प्रतिशत वोट रह गए, लेफ्ट का बिखरा वोट तृणमूल का हुआ तो इस चुनाव में क्या भाजपा के वोट अचानक 25 से 35 प्रतिशत जंपकर तृणमूल के 46 प्रतिशत के बराबर पहुंच 82 प्रतिशत के रिकार्ड मतदान में तृणमूल को हरा दे? क्या संभव है कि लेफ्ट का बिखरा वोट तृणमूल को नहीं, बल्कि भाजपा को पड़े?

ऐसे ही सोचने वाली तीसरी बात है कि ओड़िशा में भाजपा का पिछला 18 प्रतिशत वोट 44 प्रतिशत या 22 प्रतिशत वोट 45 प्रतिशत होबीजद को लोकसभा, विधानसभा चुनाव में हरा दे? हां, ओड़िशा में 2014 में नवीन पटनायक की बीजद के वोट भाजपा से दोगुने से अधिक थे। जबकि इन पांच वर्षों में ओड़िशा के आदिवासी वैसे ही भाजपा से बिदके हैं, जैसे बगल के झारखंड या छतीसगढ़ में बिदके हैं। लॉजिक कहता है कि जैसे 2014 में पूरे देश में मोदी आंधी थी वैसा असर ओड़िशा, बंगाल में भी पीक पर था। अब यह कैसे संभव है कि बाकी पूरे देश में भाजपा, मोदी की सीटें कम, ज्यादा घटे लेकिन ओड़िशा व पश्चिम बंगाल में उलटी गंगा बहे?

सो, अमित शाह बंगाल में 23 से ज्यादा सीट या ओड़िशा में 12 से 15 सीट जीतने का भरोसा बता रहे हैं तो अपनी राय में वह भरोसा वैसा ही है जैसे उत्तरप्रदेश में उन्होंने 71 की जगह भाजपा की 73 सीट होने का जुमला बोल जताया है। मोदी-शाह की गलती थी जो ममता बनर्जी की ऊर्जा कम आंकी। इन्होंने सोचा की सातों राउंड में कम-कम सीटों पर चुनाव करा ममता बनर्जी को थका देंगे। लेकिन ममता बनर्जी ने उलटे मोदी-शाह को थका दिया है। वे पहले चरण से ले कर अब तक मतदान के प्रतिशत को 82 प्रतिशत के आसपास टिकाए हुए हैं। मतदान कम होता तो भाजपा के अवसरबनते। 

सोचना यह भी जरूरी है कि ऐसा कभी नहीं हुआ कि आठ महीने पहले विधानसभा चुनाव में बराबरी की लड़ाई हुई हो और लोकसभा चुनाव में जीतने वाली, सरकार बनाने वाली पार्टी का सूपड़ा साफ हो जाए? मतलब भाजपा अपनी जीत के ब्लॉक-2 के गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश व छतीसगढ़ की 91 सीटों में से पिछली बार की तरह 88 सीटें याकि शत-प्रतिशत सीट वाली सुनामी का जो ख्याल बनाए हुए है, वह आठ महीने में गंगा को उलटा बहा देने की हवा है, और यह भी तर्कसंगत नहीं है। मतलब कमलनाथ, अशोक गहलोत के बेटे से ले कर ज्योतिरादित्य, दिग्विजयसिंह सभी के चुनाव हारने का जो प्रोपेगेंडा हुआ है वैसी आंधी आठ महीने पहले के चुनाव नतीजों के विपरीत की गंगा है। क्या ऐसे अचानक गंगा उलटी बह सकती है?

कतई नहीं। इसलिए नीचे के चार्ट में भाजपा की अधिक सीटों के अनुमान के बावजूदयह नामुमकिन नहीं है कि  पिछले तमाम चुनावों के अनुभव, आंकड़ों के आधार पर भाजपा-कांग्रेस की सीटों का अनुपात 60-40 का बने। मैं नहीं मानता कि अशोक गहलोत, कमलनाथ का बेटा हार रहा है या ज्योतिरादित्य हार सकते हैं उलटे आदिवासी-दलित- मुस्लिम बहुल सीटों में भाजपा को अप्रत्याशित ज्यादा नुकसान हो सकता है। ऐसे ही भाजपा की जीत के नंबर तीन ब्लॉक महाराष्ट्र- कर्नाटक में इस दफा कांग्रेस-एनसीपी व कांग्रेस-जनता दल(एस) एलायंस की मौजूदा गणित-केमिस्ट्री व मतदान के आंकड़े भाजपा के लिए खतरे की घंटी हैं। तर्क है कि कैसे मानें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में कर्नाटक में कांग्रेस- जनता दल (एस) को जो वोट मिले थे या 2018 के विधानसभा चुनाव में इन दोनों पार्टियों को अलग-अलग लड़ते हुए जो वोट प्राप्त हुए थे वे इनके अब एलायंस में पहले जैसे नहीं पड़ेंगे? या महाराष्ट्र में आदिवासी-दलित-मुसलमान वोटों ने अंबेडकर-ओवैसी के मोर्चे में अपना वोट जाया किया होगा न कि मोदी-भाजपा सरकार के खिलाफ वैसी ही खुन्नस में वोट डाला होगा जैसे सहारनपुर में मुसलमान-दलितों ने बिना भटके भाजपा को हरा सकने में समर्थ एलायंस उम्मीदवार को वोट दिया? महाराष्ट्र में दलित, आदिवासी, मुसलमान, मराठों की भावनाएं बतौर मौन जाया होगी और मोदी,मोदी का प्रोपेगेंडा वोट उस स्थिति में भी संभव है जब महाराष्ट्र में कुल मतदान प्रतिशत सामान्य से कम है?

तभी 2019 का यह चुनाव विचित्र है। मोदी-शाह की प्रोपेगेंडा मशीनरी, झूठ ने तर्क, गणित, केमिस्ट्री और भावनाओं सबको हाशिए में डाल मोदी हवा का झूठा ख्याल बनवाया है। तभी आश्चर्य नहीं जो हर कोई ईवीएम मशीन पर शक के सवाल लिए हुए है।

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