• [EDITED BY : Super Admin] PUBLISH DATE: ; 14 May, 2019 04:07 PM | Total Read Count 177
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मोह माया नाशक मोहिनी एकादशी

अशोक प्रवृद्धः  वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी कहते हैं। पौराणिक मान्यता है कि बैशाख शुक्ल पक्ष एकादशी की यह तिथि समस्त पापों को हरने वाली और उत्तम है। इस दिन व्रत रखने वाले मनुष्य व्रत के प्रभाव से मोहजाल तथा पातक समूह से छुटकारा पा जाते हैं। इस व्रत के करने से मेरूपर्वत के समान किये गये पाप भी नष्ट हो जाते हैं तथा यह मनुष्य को सांसारिक मोह-माया के जाल से मुक्त करता है और स्वर्ग की प्राप्ति करवाता है । जिस प्रकार कार्तिक के समान वैशाख मास उत्तम माना गया है उसी प्रकार वैशाख मास की यह एकादशी भी उत्तम कही गयी है।

इसका कारण यह है कि संसार में सभी प्रकार के पापों का कारण मोह माना गया है। विधि विधान पूर्वक इस एकादशी का व्रत रखने से मोह का बंधन ढ़ीला होता जाता है और मनुष्य ईश्वर का सानिध्य प्राप्त कर लेता है। इससे मृत्यु के बाद नर्क की कठिन यातनाओं का दर्द नहीं सहना पड़ता है। पद्म पुराण के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। यह व्रत मोह बंधन तथा पापों से मुक्ति दिलाता है। सीता माता की खोज के दौरान भगवान राम ने तथा महाभारत काल में युधिष्ठिर ने मोहिनी एकादशी व्रत कर अपने सभी दुखों से छुटकारा पाया था।

समस्त पापों की शांति की उद्देश्य से वैशाख के शुक्लपक्ष की एकादशी तिथि को की जाने वाली मोहिनी एकादशी और इससे सम्बन्धित व्रत के विषय में एक पौराणिक कथा प्रचलित है। वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी मोहिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु और साथ ही पुरुषोत्तम रूप मर्यादा पुरुषोतम श्रीराम की भी पूजा की जाती है। पुराणों के अनुसार मोहिनी एकादशी व्रत को करने से निंदित कर्मों के पाप से छुटकारा मिल जाता है तथा मोह बंधन एवं पाप समूह नष्ट होते हैं। सीता की खोज करते समय भगवान श्रीराम ने भी मोहिनी एकादशी व्रत को किया था। उनके बाद मुनि कौण्डिन्य के कहने पर धृष्टबुद्धि ने और श्रीकृष्ण के कहने पर युधिष्ठिर ने इस व्रत को किया था।

इस सम्बन्ध में प्रचलित कथा के अनुसार एक समय भगवान श्रीकृष्ण ने इससे सम्बन्धित पौराणिक कथा सुनते हुए  युधिष्ठिर से कहा- हे धर्मराज! मैं आपसे प्राचीन काल में महर्षि वशिष्ठ के द्वारा श्रीरामचंद्रजी से कही गई कथा कहता हूँ। श्रीकृष्ण ने कहा कि एक समय श्रीराम गुरुदेव वशिष्ठ से कोई ऐसा व्रत बतलाने का अनुरोध किया, जिससे समस्त पाप और दु:ख का नाश हो जाए। मैंने सीताजी के वियोग में बहुत दु:ख भोगे हैं । अतः कोई ऐसा उपाय बताया जाए जिससे मेरे समस्त दुखों व पापों का नाश हो। महर्षि वशिष्ठ ने यह सुन श्री राम से कहा कि आपने बहुत सुंदर प्रश्न किया है। आपकी बुद्धि अत्यंत शुद्ध तथा पवित्र है। यद्यपि आपका नाम स्मरण करने से मनुष्य पवित्र और शुद्ध हो जाता है तो भी लोकहित में यह आपका प्रश्न अच्छा है। वैशाख मास में आने वाली एकादशी का नाम मोहिनी एकादशी है। इसका व्रत करने से मनुष्य सब पापों तथा दु:खों से छूटकर मोहजाल से मुक्त हो जाता है। उन्होंने इसकी कथा सुनाते हुए कहा कि इस पौराणिक कथा के अनुसार सरस्वती नदी के रमणीय तट भद्रावती नाम की सुंदर नगरी है।

वहां चन्द्रवंश में उत्पन्न और सत्यप्रतिज्ञ धृतिमान नामक राजा राज्य करते थे। उसी नगर में धनधान्य से परिपूर्ण समृद्धिशाली धनपाल नामक एक वैश्य रहता था था, वह सदा पुण्यकर्म में ही लगा रहता था। दूसरों के लिए पौसला (प्याऊ), कुआँ, मठ, बगीचा, पोखरा और घर आदि बनवाया करता था। भगवान विष्णु की भक्ति में उसका हार्दिक अनुराग था। उसके सुमना, द्युतिमान, मेधावी, सुकृत तथा धृष्टबुद्धि नाम के पाँच पुत्र थे। धृष्ट्बुद्धि पांचवा था। वह सदा बड़े-बड़े पापों में संलग्न रहता था। जुये आदि दुर्व्यसनों में उसकी बड़ी आसक्ति थी। वह वेश्याओं से मिलने के लिये लालायित रहता और अन्याय के मार्ग पर चलकर पिता का धन बरबाद किया करता। एक दिन उसके पिता ने उससे तंग आकर उसे घर से निकाल दिया। घर से बाहर निकलने के बाद वह अपने गहने-कपड़े बेचकर अपना निर्वाह करने लगा। जब सब कुछ नष्ट हो गया तो वेश्या और दुराचारी साथियों ने उसका साथ छोड़ दिया। अब वह भूख-प्यास से अति दु:खी रहने लगा। कोई सहारा न देख चोरी करना सीख गया। एक बार वह पकड़ा गया तो वैश्य का पुत्र जानकर चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। मगर दूसरी बार फिर पकड़ में आ गया। राजाज्ञा से इस बार उसे कारागार में डाल दिया गया। कारागार में उसे अत्यंत दु:ख दिए गए। बाद में राजा ने उसे नगरी से निकल जाने का कहा। वह नगरी से निकल वन में चला गया। वहाँ वन्य पशु-पक्षियों को मारकर खाने लगा।

कुछ समय पश्चात वह बहेलिया बन गया और धनुष-बाण लेकर पशु-पक्षियों को मार-मारकर खाने लगा। एक दिन भूख-प्यास से व्यथित होकर वह खाने की तलाश में घूमता हुआ कौडिन्य ऋषि के आश्रम में पहुँच गया। उस समय वैशाख मास था और ऋषि गंगा में स्नान कर आ रहे थे। उनके भीगे वस्त्रों के छींटे उस पर पड़ने से उसे कुछ सद्‍बुद्धि प्राप्त हुई। शोक के भार से पीड़ित वह मुनिवर कौँन्डिन्य के पास गया और हाथ जोड़ कर बोला - द्विजश्रेष्ट ! मुझ पर दया करके कोई ऐसा व्रत बताइये, जिसके पुण्य के प्रभाव से मेरी मुक्ति हो। यह सुन कौँन्डिन्य बोले - वैशाख के शुक्ल पक्ष में मोहिनी नाम से प्रसिद्ध एकादशी का व्रत करो। मोहिनी एकादशी को उपवास करने पर प्राणियों के अनेक जन्मों के किए हुए मेरु पर्वत जैसे महापाप भी नष्ट हो जाते हैं।

मुनि का यह वचन सुनकर धृष्टबुद्धि का चित्त प्रसन्न हो गया। उसने कौँन्डिन्य के उपदेश से विधिपूर्वक मोहिनी एकादशी का व्रत किया। इस व्रत के करने से वह निष्पाप हो गया और दिव्य देह धारण कर गरुड़ पर आरूढ़ हो सब प्रकार के उपद्रवों से रहित श्रीविष्णुधाम को चला गया। इस प्रकार यह मोहिनी एकादशी का व्रत बहुत उत्तम है। इसके पढने और सुनने से सहस्त्रों गोदानका फल मिलता है।

मोहिनी एकादशी के विषय में एक अन्य मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन के बाद अमृत प्राप्ति को लेकर देव और दानवों के बीच विवाद छिड़ जाने पर भगवान विष्णु अति सुंदर नारी रूप धारण करके देवता और दानवों के बीच पहुंच गये। इनके रूप से मोहित होकर दानवों ने अमृत का कलश इन्हें सौंप दिया। मोहिनी रूप धारण किये हुए भगवान विष्णु ने सारा अमृत देवताओं को पिला दिया। इससे देवता अमर हो गये। जिस दिन भगवान विष्णु मोहिनी रूप में प्रकट हुए थे उस दिन एकादशी तिथि थी। भगवान विष्णु के इसी मोहिनी रूप की पूजा मोहिनी एकादशी के दिन की जाती है। इस एकादशी को संबंधों में आये दरार को दूर करने वाला भी माना गया है।

मोहिनी एकादशी व्रत करने वाले व्यक्ति को दशमी की रात से ही नियमों का पालन करते हुए एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त अर्थात सुबह उठकर तिल का लेप लगाकर फिर तिल मिले जल से स्नान करना चाहिए। स्नान के लिये किसी पवित्र नदी या सरोवर का जल मिलना श्रेष्ठ होता है। अगर यह संभव न हों तो घर में ही जल से स्नान करना चाहिए। स्नान करने के लिये कुश और तिल के लेप का प्रयोग करना चाहिए। स्नान करने के बाद साफ वस्त्र धारण करने चाहिए। तत्पश्चात लाल वस्त्रों से सजे कलश की स्थापना कर भगवान विष्णु तथा श्रीराम का धूप, दीप फल, फूलों आदि से पूजन किया जाता है। पूजन के बाद प्रसाद वितरण कर ब्राह्मण को भोजन तथा दक्षिणा देने का विधान है। रात के समय भगवान का भजन तथा कथा का पाठ करना चाहिए। पौराणिक मान्यतानुसार सब प्रकार के मोह-माया से मुक्त कर मोक्ष प्रदान करने वाले इस व्रत के करने से मेरूपर्वत के समान किये गये पाप भी नष्ट हो जाते हैं। यह मनुष्य को सांसारिक मोह-माया के जाल से मुक्त करता है और स्वर्ग की प्राप्ति करवाता है । इस मोहिनी एकादशी के व्रत का पालन कर मनुष्य अपने सभी दु:खों से छुटकारा पा सकता है।

मोहिनी एकादशी व्रत की पूजन सामग्रियों में श्री विष्णु जी की मूर्ति, मिट्टी अथवा ताम्बे कलश, धान्य,एक लाल और एक श्वेत वस्त्र, पुष्प. पुष्पमाला, नारियल,  सुपारी, अन्य ऋतुफल, धूप, दीप, घी, पंचामृत - दूध (कच्चा दूध), दही, घी, शहद और शक्कर का मिश्रण, अक्षत, तुलसी दल, चंदन, मिष्ठान आदि शामिल करनी चाहिए। मोहिनी एकादशी व्रत रखने वाले को स्वयं तुलसी पत्ता नहीं तोड़ना चाहिए। किसी के प्रति मन में द्वेष की भावना नहीं लाना चाहिए और न किसी की निंदा करना चाहिए। व्रत रखने वाले को पूरे दिन निराहार रहना चाहिए। शाम में पूजा के बाद इच्छा हो तो फलाहार कर सकते हैं। एकादशी के दिन रात्रि जागरण का बड़ा महत्व है। इसलिए रात में जगकर भगवान का भजन कीर्तन करना चाहिए। अगले दिन यानी द्वादशी तिथि को ब्राह्मण भोजन करवाने के बाद स्वयं भोजन करना उत्तम माना गया है।

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