• [EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 16 May, 2019 04:20 PM | Total Read Count 390
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मोदी की हवा और गणेश को दूध!

दिनेेश का फोन था, भैया कांग्रेसी कह रहे हैं हरियाणा में बीजेपी दसों सीटें जीत रही है। वी सुब्रह्मण्यम ने व्हाट्सअप से बताया- आला सरकारी इनसाइडर (मोदी समर्थक नहीं) ने बताया कि ब्यूरोक्रेसी के टॉप लेवल पर आकलन भाजपा को अकेले तीन सौ सीट मिलने का है। यूपी में पचास और बंगाल में पच्चीस। कैसे यह संभव है? 

मैंने जवाब दिया- याद रखें भक्तों ने गणेशजी को दूध पीते देखा था!

पर बावजूद इसके मैंने सोचा, कांग्रेसियों को क्या हो रहा है? गहलोत की भाव-भंगिमा भी डाउन लग रही है। मनचंदा की मानें तो खड़गे नर्वस और राकेश की माने तो दिग्विजय सिंह नर्वस। सुधींद्र ने फोन कर कहा अंग्रेजी के सारे पत्रकार नर्वस बना दे रहे हैं। आप को सुबह पढ़ कर ही कुछ आस बंधती है। आप और मुंबई के फलां पत्रकार से भरोसा होता है कि जो हवा बता रहे हैं वह हकीकत नहीं!

ऐसा कहने वाले असंख्य लोग है। नया इंडिया के पाठक और तीन-चार दशकों से मुझे लगातार पढ़ने वाले सब सोच रहे हैं कि मैं गलत होता हूं या सही! सोचें, इस सबसे मैं कितनी तरह के मनोवैज्ञानिक दबावों में इस समय हूं। दुनिया कह रही है कि मोदी की आंधी है और मैं तर्क पकड़े हुए हूं कि कैसे 2014 और 2017 का यूपी का बसपा वोट वाला दलित, सपा को वोट देने वाला यादव-मुसलमान वापिस सपा-बसपा को वोट नहीं देगा? नोट रखें यह आंकड़ा कि 2014 के चुनाव में भी यूपी में भाजपा के मुकाबले सपा-बसपा-रालोद को मिला कुल वोट भाजपा के 42.6 प्रतिशत के मुकाबले 43 प्रतिशत था। उसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव की मोदी सुनामी में मतदान प्रतिशत बढ़ा लेकिन भाजपा का वोट कम हुआ। भाजपा तब 312 सीट जीतने के बावजूद 40 प्रतिशत वोट पर अटकी जबकि सपा-बसपा-रालोद का कुल वोट जंप कर 46.2 प्रतिशत हो गया। लेकिन ये तब क्योंकि अलग-अलग लड़े थे तो भाजपा छप्पर फाड़ जीती। जबकि आज तीनों शत-प्रतिशत साझा गणित-केमिस्ट्री से चुनाव लड़ रहे हैं। 

तो कैसे छोड़ा जाए इन आंकडों को, जमीन की लड़ाई को, पिछले चुनावों से निकले तर्क-लॉजिक को? तभी मैं कतई नहीं मानता कि 23 मई को पूरा देश नरेंद्र मोदी की मूर्ति को दूध पिलाएगा। मैं भक्त नहीं हूं। सो, मैं हवा नहीं मानता। मगर हां, जब हवा थी तब मानता था। 2014 में मैंने खम ठोंक कई बार, राज्यवार चार्ट दे कर भी लिखा था कि कांग्रेस का सूपड़ा साफ है और मोदी की आंधी है। तब अहमद पटेल व कांग्रेस के नेता चार्ट की संख्याओं को मार्क करके बताते थे कि फलां-फलां हिसाब गलत है। ऐसे ही 2004 में भास्कर में दैनिक चुनावी कॉलम लिखते हुए दो टूक अंदाज में मैंने बूझा था कि वाजपेयी का शाइनिंग इंडिया मुझे नहीं दिख रहा है और नतीजे भाजपा के लिए सदमे वाले होंगे। 

इसका अर्थ यह नहीं कि मैं कभी गलत नहीं हुआ। 2014 के बाद ही दिल्ली, बिहार के विधानसभा चुनाव में सौ टका सही साबित होने के बाद 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में सौ टका गलत साबित हुआ तो उस पर अपन ने माफी मांग बाकायदा माना कि मैं गलत हुआ। क्यों सोचा जाए या माना जाए कि आकलन-विश्लेषण गलत नहीं हो सकता? स्थितप्रज्ञता और बुद्धि में अपना धर्म अपना कर्म है। नतीजा या फल चाहे जो निकले। भला क्यों यह चिंता कि आंधी आ रही है और उसमें उड़ जाएंगे। मगर नोट रखें तब भी अपन अपनी जमीन पर टिके रहेंगे। 

हां, 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में नोटबंदी की कड़की बिजली के हिंदुओं पर असर की प्रासंगिकता आज भी है। मैं तब बूझ नहीं पाया था कि मोदी ने नोटबंदी की तो उससे हिंदुओं ने मुसलमानों के दो नंबर के लेन-देन को बैंकों के आगे लाइन में कन्वर्ट होते हुए समझा था। वाराणसी में मतदान से तीन दिन पहले मुझे एक हिंदू दुकानदार ने जब ज्ञान दिया कि नोटबंदी का ऐसा भी अर्थ है और मुसलमानों पर कड़की बिजली से हम खुश हैं तो मैंने तुरंत लिखा कि यूपी का माहौल नोटबंदी की ऐसी बिजली से कड़का हुआ है।

उस नाते इस चुनाव से पहले भी मोदी ने पुलवामा, एयरस्ट्राइक से बिजली कड़काई है। उसके असर में मैंने तब लिखा कि यदि ‘आज’ चुनाव हो तो भाजपा 300 सीट पार! उसके हवाले इस सप्ताह मुझे जयपुर से छाबड़ा ने कहा कि आपने फरवरी में 300 सीट बताईं तो अब 165 का आंकड़ा कैसे बनता है? 

इस सवाल में तर्क है कि आठ नवंबर 2016 को नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी की और फरवरी 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव के चार महीने यदि कड़की बिजली का असर बना रहा तो 26 फरवरी 2019 से मई 2019 में अभी लोकसभा चुनाव याकि तीन महीने की अवधि में तो हर, हर मोदी में आंधी सघन बनी ही रहनी चाहिए। भूल जाएं अक्टूबर-नवंबर के विधानसभा चुनावों की बैकग्राउंड, अब सब कुछ पुलवामा और एयरस्ट्राइक से हिंदुओं पर कड़की बिजली में चुनाव है। इसलिए सभी तरफ है मोदी, मोदी, हर-हर मोदी!

पर मैं नहीं मानता। इसलिए कि उत्तरप्रदेश की 80 लोकसभा सीट की हकीकत है कि 2017 की मोदी सुनामी वाले चुनाव में भी दलितों ने बसपा को नहीं छोड़ा था। यादव-मुसलमानों ने सपा-कांग्रेस को नहीं छोड़ा था। मतलब जिन वोटों पर किसी भी तरह से मोदी का जादू, मोदी की कड़काई बिजली का असर नहीं हुआ और वे वोट एक ही जगह पर लगातार पड़ते रहे हैं तो अब कैसे मोदी को पड़ेंगे? आज जब सपा-बसपा-रालोद का पुख्ता एलायंस है। वोट एक-दूसरे को ट्रांसफर हो रहे हैं, गणित और केमिस्ट्री दोनों एलायंस के लिए काम कर रही है तो नरेंद्र मोदी द्वारा बिजली कड़काना उलटे इन वोटों को डराते हुए गोलबंद बनवाना है। गणित में जो वोट जहां खड़ा है वह वहीं रहेगा। मुसलमान नहीं दे सकता है भाजपा को वोट। यूपी का दलित, छतीसगढ़-झारखंड-मध्यप्रदेश-राजस्थान-महाराष्ट्र का आदिवासी नहीं भुला सकता है पांच साल में बने अपने घाव। यादव नहीं छोड़ सकता अखिलेश से होने वाले अपने सशक्तिकरण का ख्याल या मोदी-भाजपा का परंपरागत विरोधी वोट (जिसका 2014 और 2017 में भी अच्छा खासा आंकड़ा था) एयरस्ट्राइक से नहीं बन सकता है मोदी का भक्त।

संभव है आप मेरी इस दलील को जिद्द मानें। लेकिन 11 अप्रैल के पहले चरण के मतदान के दिन नोएडा से अपने को हो गया था यह विश्वास कि सपा-बसपा-रालोद का एलायंस जमीन पर सचमुच गणित-केमिस्ट्री बना बैठा है। एयरस्ट्राइक के 26 फरवरी के दिन यूपी, बिहार, झारखंड के एलायंस बिखरे हुए थे। अपना मानना है वह बिखरा रहता यदि मोदी पुलवामा-एयरस्ट्राइक की बिजली नहीं कड़काते। 

अब मैं फिर उलटा जा रहा हूं। दो टूक अंदाज में लिख दे रहा हूं कि नरेंद्र मोदी का वक्त खराब चल रहा था जो उन्होंने एयरस्ट्राइक की बिजली कड़काई। इससे विपक्ष गोलबंद हुआ। विपक्षी नेता कंपकंपाए। उनकी जमीन खिसकी और शरद पवार ने जमकर मेहनत की तो दिग्विजयसिंह ने अपनी प्राण-प्रतिष्ठा दांव पर लगाई। वक्त खराब है, जिसने नरेंद्र मोदी की जुबान को अभद्र, गंदा बनाया। मुंह से गालियां निकलवाई और मायावती ने मां-बहिन की याद दिलाई। नरेंद्र मोदी का वक्त खराब है, जिसने उनके मुंह से ऐसी-ऐसी गप्प बनवाई कि वे आज गपोड़ी नंबर एक हैं। कब भारत के प्रधानमंत्री का ऐसा पहले मजाक हुआ जैसा इन दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का है? खराब वक्त और वक्त की निर्ममता है जोराहुल गांधी अब पप्पू नहीं, बल्कि नरेंद्र मोदी पप्पू हैं, जिन्होंने बादलों से वायुसेना की रक्षा के बचपने वाली, पप्पू वाली बात से सैनिक ऑपरेशन चलवाने की जंग हंसाई करवाई। मतलब राहुल गांधी संजीदा और नरेंद्र मोदी गपोड़ी!

सो, भाईजनों निश्चिंत रहें। विश्वास रखें। अहंकार और झूठ की उम्र लंबी नहीं हुआ करती। हर, हर मोदी के हल्ले के पीछे योजना, सिस्टम, प्रायोजनका सुनिश्चित रोडमैप है। मोदी-शाह ने ऊपर से नीचे तक डायरेक्शन दिया हुआ है कि 300 से कम सीट नहीं बोलनी है। मीडिया भी वहीं बोलेगा। सट्टा बाजार भी वहीं बोलेगा। नतीजे के दिन तक यूपी में राहुल गांधी, अखिलेश, डिंपल यादव सभी हार रहे होंगे। 

हां, लखनऊ से राजेंद्र ने सटीक कहा कि मोदी के भक्त यह नहीं बोलेंगे कि हम लखनऊ, वाराणसी में जीत रहे हैं, बल्कि शुरुआत ही इस बात से करते हैं कि भाजपा अमेठी में, कन्नौज और आजमगढ़ सब जगह जीत रही है। हर, हर मोदी की आंधी में अशोक गहलोत का बेटा, कमलनाथ का बेटा, ज्योतिरादित्य, दिग्विजय सिंह सबके हारने की बात पहले होती है और यह ख्याल में आता ही नहीं कि भाजपा कहां-कहां जीत रही है? सो, भाजपा केरल में तीन सीट, तमिलनाडु में पांच सीट, ओड़िशा में 16 सीट, बंगाल में 25 प्लस जीतेगी ही! जब भक्त घर-घर मोदीजी की मूर्ति को दूध पिला रहे हैं तो भला पानीपत की तीसरी लड़ाई का प्रारब्ध क्यों नहीं इतिहास जन्य होगा। 

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