• [EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 13 May, 2019 07:13 AM | Total Read Count 358
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वोट ब्रह्मास्त्र है, परीक्षा है और पवित्र है!

मैंने कल वोट डाला। सुबहृ-सुबह वसंत कुंज में वोट की लाइन में लगा। अगल-बगल के बूथ केंद्रों पर भीड़ देखी तो पहला ख्याल था इतनी जल्दी इतनी भीड़! भला वसंत कुंज जैसे खाते-पीते मध्य-उच्च वर्ग में वोट की ऐसी बेकरारी! बूथ नंबर 190 जरूर खाली था। मालूम हुआ यह सटी झुग्गी-झोपड़ बस्ती का है। तब सवाल बना कि पढ़े-लिखे-सपन्नों की वोट के लिए लाइन और गरीब-सामान्य मतदाताओं का बूथ केंद्र खाली? दिमाग ने कई वजह सोची। पर कुलबुलाहट यह देख ज्यादा हुई कि सुबह साढ़े सात बजे ही वसंत कुंज के लोगों कालाइन में इतना लगा होना! ये जो चेहरे वोट देने को खड़े हैं, इनका दिमाग वोट की सोच में कैसा पका हुआ होगा? इनके वोट को अनुभव ने पकाया होगा या प्रचार से पका होगा? वोट डालने का इनके दिल-दिमाग में पका फैसला या तो अनुभव व बुद्धि की भट्ठी में पका है या भेड़ चाल, बहकावे, धोखे, खामोख्याली, झूठ व मूर्ख बनाने की उन बाहरी विविध कलाओं से उत्प्रेरित होगा जो बुनियादी तौर पर वोट के नागरिक ब्रह्मास्त्रके हरण का उद्देश्य लिए होती हैं।

वोट ताकत है, वोट बल है, वोट ब्रह्मास्त्र है तो इस ताकत के हरण के भी दस तरह के जतन हैं। हां, मैं मानता हूं वोट इंसानी विकास की प्रक्रिया में से निकला जन निर्णय का वह सर्वोच्च तरीका, व्यवस्था है, जिसके मूल में यह विश्वास है कि व्यक्ति अपनी बुद्धि से उसका उपयोग करेगा। व्यक्ति यह जाने हुए होगा कि वोट वह ब्रह्मास्त्र है, जिसका सही उपयोग किया तो वह रामराज्य पा सकता है और यदि गलत, मूर्खता में किया तो रावण के राज के लिए शापित हो सकता है। सही वोट सत्य जीवन का आशीर्वाद तो गलत वोट झूठ-फरेबी जीवन का श्राप!

इसलिए वोट से फैसला व्यक्ति की, नागरिक की, देश विशेष, कौम विशेष की यह परीक्षा भी है कि उसकी समझ क्या है? उसमें यह भेद करने का, यह फर्क बूझने का दिमाग है या नहीं कि सत्य क्या है और झूठ क्या है? ब्रह्मास्त्रसंहारक होता है तो मंगलकारी, कल्याणकारी भी हो सकता है। सब निर्भर है उपयोगकर्ता की बुद्धि, समझ पर। बुद्धि से तय होता है वोट के ब्रह्मास्त्र से वोटर चाहता क्या है।

मैंने पहले कभी गौर नहीं किया, पढ़ा नहीं कि किस आदि मानव याकि आदि ऋषि ने यह सोचा कि जनपद की रचना जन-जन की राय से बनी हुई होनी चाहिए और उसके लिए जनमत जानने की वोट व्यवस्था बनाई जाए।यह आइडिया, यह विचार ग्रीस, रोम या गणतंत्र के हिंदू विचार वालेआदि ऋषियों में जैसे भी जिस भी तरह से फूटा और प्रचलन में आया वह अपनी राय में मानव सभ्यता, उसके राजनीतिक-सामाजिक विकास का सर्वाधिक कारगर बीजारोपण था। समाज, कौम, देश, जनपद को जनमत से रचवाना जन ब्रह्मास्त्र की बुनियाद है। मानव सभ्यता के लिखित इतिहास, उसकी शब्दावली में वोट, बैलेट के पीछे के लैटिन मूल और रोम-पश्चिमी सभ्यताओं में लोकतंत्र की जिद्द, प्रयोग की जितनी भी जैसी दास्तां है उसमें हुंकारा स्व-निज बुद्धि, विवेक में स्वतंत्रता का यह हुंकारा है कि मेरी मर्जी,मेरा वोट, मेरा ब्रह्मास्त्र!

एक अकेला, एक वोट क्या कर सकता है या उससे अंत कैसा बन सकता है, इस पर यदि सोचा जाएतो नागरिक का यह‘अंहम ब्रह्मास्मि’ के दर्प में अपने को ढाल कर वोट से अपना संसार बनाना है। अपने ‘ब्रह्मास्त्र’ से उसका फैसला बुद्धि जनित है। मतलब उसकी बुद्धि की परीक्षा भी है। बुद्धि कैसा चाहती हैभविष्य? संदेह नहीं कि वोट के ब्रह्मास्त्र के बुद्धिसम्मत उपयोग ने मानव सभ्यता को बदला। इंसान आज अंतरिक्ष में बस्ती बसाने के कगार पर जा पहुंचा है। मतलब पृथ्वीवासियों की स्वतंत्रचेता बुद्धि से जिन देशों मेंवोट से सही फैसले हुए उन्हीं की बदौलत सभ्यता देवतुल्य विकास की और बढ़ती गई। 

मैं भटक गया हूं। लाइन में खड़े मतदाताओं की बुद्धि पर विचार करते-करते कहां से कहां पहुंच गया! ऐसा इसलिए क्योंकि इन दिनों बुद्धि हरण का जो महाअभियान चला हुआ है उसने यक्ष प्रश्न बनाया है कि आज के प्रदूषणों से जन मन की बुद्धि को क्या साफ, स्वस्थ, सुरक्षित बचाए रखा जा सकता है? जो अनुभव है जो प्रत्यक्ष है उसे पट्टी बांध न समझे तो ऐसी अवस्था में वोट क्या? वोट यदि अनुभव, बुद्धि, समझदारी और विवेक की कसौटी में नहीं है तो न केवलमतदाताफेलहै, बल्कि  देश-समाज-कौम सभी फेल हैं। लोकतंत्र में मतदाता को वोट अधिकार इसलिए है क्योंकि उसे बुद्धि संपन्न माना गया है। जनपद का जन,जन बुद्धि, समझ, विवेक से संपन्न है, यहीं सोचते हुए उसे अधिकार प्राप्त है कि वह चुने अपना प्रतिनिधि और अपना शासक। बुद्धि ने लोकतंत्र बनाया, उसके लिए वोट बना तो यह सोचते हुए कि जो भी फैसला होगा वह बुद्धि, समझ और विवेक से होगा न कि झूठ, मूर्खता, भक्ति, प्रोपेगेंडा या छल-कपट व धांधली से।

वोट ब्रह्मास्त्र तभी है जब वोट मांगने वाले के स्वार्थ, लालच, प्रोपेगेंडा, झूठ में बहक कर, धोखा खा कर वोट नहीं डाला जाए। झूठ-फरेब में बहक वोटडालना अपने को अधिकार शून्य बनाना है। अपने आपको बंधुआ, गुलाम बनाना है। तभी वोट मतदाता के व्यक्तित्व-कृतित्व की वह पवित्र पूंजी है, जिसकी रक्षा निज विचार में तभी संभव है जब जिद्द सत्य की हो। वोट को पवित्रता से डाले। ऐसा तब संभव है जब जागरूकता, सत्य और झूठ के फर्क को भेदने की समझ और शिक्षा बनी हुई हो। तभी पश्चिमी देशों के लोकतंत्र में नागरिक शास्त्र, सिविक एजुकेशन, वोटर को सत्य-झूठ बतलाने के शिक्षा के कई तरह के जतन हैं। नतीजतन पश्चिम के लोकतंत्र में मतदाता अपने आपको भक्त बनाए नहीं होता। वह अपने बीच में से एक प्रतिनिधि तय कर रहा होता है न कि अवतारी भगवान पर प्रसाद चढ़ा रहा होता है। 

वोट जनता द्वारा, जनता के लिए जनप्रतिनिधि चुनने का साधन है न कि हर, हर महादेव की आस्था का आह्वान। मगर सवा सौ करोड़ लोगों के, विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में आज चौतरफा आंशका है कि तमाम तरह की झूठी-फरेबी लीलाओं और जुमलेबाजी ने मतदाताओं को अंधा बना दिया है। बुद्धि का हरण हुआ पड़ा है इसलिएवोट भक्ति के चलते पड़ रहे हैं!खौफ में पड़ रहे हैं या मजबूरी-मूर्ख बहकावे में पड़ रहे हैं।

पर अपने को विश्वास है। निश्चिंत रहें, फैसला वहीं होगा, जिसके लिए वोट बना है। वोट का ब्रह्मास्त्र प्रमाणित करेगा कि उसकी रचना में बुद्धि के सत्व-तत्व का जो रसायन है वह झूठ को भेदने में समर्थ है फिर भले झूठ की सुनामी क्यों न आई हुई हो।

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