बवंडरों पर है मोदी, मोदी का हल्ला!


[EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 09 May, 2019 06:38 AM | Total Read Count 498
बवंडरों पर है मोदी, मोदी का हल्ला!

मोदी भक्ति, हर, हर मोदी और मोदी हवा एक हकीकत है। इस हकीकत को मानना चाहिए। इस मामले में पुलवामा टर्निंग प्वाइंट था। इसके कारण कुछ राज्यों (मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, उत्तराखंड, हिमाचल व विपक्षी समीकरण बिगड़े दिखने के कारण अब दिल्ली, हरियाणा, आंशिक तौर पर झारखंड) में नरेंद्र मोदी को 2014 की जीत के आसपास जीतता मानता हूं। मगर लोकसभा चुनाव में जीत-हार का फैसला उत्तरप्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्यों से होता है। मगर मोदी-शाह का यह कमाल है, जो छोटे बवंडरों पर सुनामी रच दी है। हां, 1984 की राजीव गांधी की 415 सीटों वाली जीत या 2014 से भी बड़ी जीत की झांकी को बवंडरों से कैसे बनाया जा सकता है, यह 2019 के चुनाव की मोदी रणनीति से सीखने लायक बात है। 2014 और 2019 का फर्क यह है कि तब सबकुछ स्वंयस्फूर्त था। नरेंद्र मोदी तब शाहरूख खान, सलमान खान की तरह सुपरस्टार, सुपरहिट थे न कि पांच सालों की कोशिशों से प्रायोजित सुपरस्टार बने अक्षय कुमार जैसे थोपे हुए थे। आज उलटा है। नरेंद्र मोदी आज अपने सत्ता के नुस्खों से हुए प्रायोजित स्टार की तरह चुनाव लड़ रहे हैं। उन्होंने शाहरूख खान, सलमान खान सभी को पप्पू करार दे, हाशिए में डाल अपनी पोजिशनिंग इस तरह की है, जिससे जनता चुनने, देखने का दूसरा विकल्प नहीं पाएऔरउन्हें ही चुने।

जाहिर है 2014 के चुनाव में जो था वह सच्चा था। हवा सच्ची, शोर सच्चा और शो सच्चा। आज हवा ब्लॉअरसे चौतरफा फिंकवाई जा रही है। सबकुछ प्रायोजित है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने चुनाव से पहले देशी-विदेशी सलाहकारों के साथ चुनाव लड़ने की जो रणनीति बनाई उसका पहला सूत्र प्रायोजित हवा, प्रायोजित प्रोपेगेंडा और कृत्रिम बादलों से चौतरफा झूठ की बारिश बनवाने का है। शाहरूख खान आउट हैं, वे इन दिनों बिना फिल्मों के है जबकि अक्षय कुमार की धड़ाधड़ फिल्में है, उसका प्रायोजन, लांच सब है तो बॉक्स ऑफिस में जैसा हल्ला होता है वैसा चुनाव में भी सट्टा बाजार मेंहल्ला होता है। सट्टा बाजार भी बोल रहा है नरेंद्र मोदी जीत रहे हैं तो मध्यप्रदेश और राजस्थान में ब्लॉअर से, प्रोपेगेंडा के विशाल पंखों से हल्ला हो गया है कि मोदी की तो 2014 से भी बड़ी आंधी। 

ऐसी हल्लेबाजी सहज है। मोदी-शाह और औसत गुजराती धंधेबाजी में मार्केटिंग का पहला नुस्खा है कि गुजरात पस्त है फिर भी उसे वाइब्रेंट दिखाओ। तालाब में पानी नहीं उसे महासागर बताओ। याद करें नरेंद्र मोदी, अमित शाह ने हर बात बुलंदी से बोली। उनका हर चुनावी दावा दो-तिहाई बहुमत से जीतने का रहा है। सही है कि 2014 के माहौल की पुण्यता में मोदी-शाह प्रदेशों में एक-एक कर चुनाव जीतते गए। इसलिए वे सही भी साबित हुए। लेकिन दिल्ली, बिहार, गुजरात, कर्नाटक से लेकर हाल के विधानसभा चुनाव में भाजपा हारी तो मतगणना के दिन तक अमित शाह हार नहीं मान रहे थे। ऐसा होना भी चाहिए। लड़ाई हो या चुनाव और उसमें भी राजा और उसकी फौज है तो लड़ाई से पहले मनोबल कमतर नहीं बतलाया जा सकता। 

इस मामले में भाजपा अध्यक्ष अमित शाहसचमुच बेज़ोड़ हैं। वे जीतने की घोषणा करके चुनाव लड़ते हैं। याद करें ये वाक्य कि- यूपी में हमें 73 से बढ़ कर 74 सीटें मिलेगी, भाजपा की 72 सीटें नहीं होने जा रही है। मैं बंगाल में 23 सीटें जीतने को लेकर आश्वस्त हूं। या ओड़िशा में जनता बताएगी कि नवीन बाबू को सीखना है कि कैसे 120 (मतलब विधानसभा में बहुमत से पार) गिना जाता है। मतगणना के दिन सुबह साढ़े दस बजे हम 120 सीट जीतेंगे और ओड़िशा में दो-तिहाई बहुमत से सरकार बनाएंगे। 

ऐसे वाक्य अमित शाह विधानसभा चुनावोंमें भी बोलते थे। वे कार्यकर्ताओं के साथ महामंथन कार्यक्रम में बोले - बीजेपी तीनों राज्यों में सरकार बनाएगी। मध्यप्रदेश में भाजपा अंगद के पैर की तरह अडिग है उसे कोई नहीं उखाड़ सकता। अमित शाह ने बिहार या दिल्लीसे लेकर कर्नाटक विधानसभा के सभी चुनावों में डंके की चोट पहले हमेशा ऐलान किया कि हम तो पहले से ज्यादा सीटों के साथ सरकार बनाने वाले हैं। अमित शाह का 2019 के लोकसभा चुनाव पर भी ऐलान हुआ पड़ा है कि बीजेपी 2014 से भी ज्यादासीटें जीतेगी। ऐसे ही प्रधानमंत्री नरॆंद्र मोदी भी औसतन सभी जनसभाओं में जमा हुए कार्यकर्ताओं की भीड़ को जरूर कहेंगे कि... इतनी बड़ी संख्यामेंआपका यहां आना यह दिखाता हैकि2014 का रिकार्ड तोडने जा रहे हैं।या यह वाक्य कि ऐसा लग रहा हैकिआप सब विजय डंका बजाने यहां आए हैं।

तभी 2019 का लोकसभा चुनाव पार्टियों व नेताओं के मनोबल की परीक्षा का भी चुनाव है। मतलबमोदी-शाह ने राहुल, प्रियंका, अखिलेश, मायावती, ममता बनर्जी से ले कर शरद पवार, अशोक गहलोत, कमलनाथ, दिग्विजयसिंह आदि की ऐसी विकट परीक्षा का यह चुनाव बनाया है कि ये पांच चरण के बाद भी यदि मैदान में डटे हुए हैं तो यह आश्चर्यजनक है। इन सबका डटे रह कर चुनाव लड़ना प्रमाण है कि इन्हें जनता के बीच से हौसला, मनोबल मिल रहा है। सोचें, क्या ये सब हारी हुई लड़ाई या बूझे मन से चुनाव लड़ रहे हैं? क्या ममता बनर्जी, मायावती, अखिलेश, तेजस्वी का चेहरा हारा, घबराया दिख रहा है या मोदी-शाह ज्यादा हैरान-परेशान दिख रहे हैं? 

कोई माने या न माने इस चुनाव में नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने विपक्ष के सभी नेताओं और खुद एनडीए व भाजपा के नेताओं पर जितनी तरह के जैसे जो दबाव बनाए है, उन्हें जैसे हैरान-परेशान किया है, उनके मनोबल को, चुनाव लड़ने की हिम्मत को तोड़ने के जितनी तरह के जतनहुए हैं उसके चलते चुनाव एकतरफा हो जाना चाहिए था। मतलब मोदी-शाह के आगे विपक्ष चुनाव नहीं लड़ता हुआ समझ आना था। इस पैमाने में यदि सर्वाधिक विचारणीय प्रदेश है तो वह महाराष्ट्र है। अपनी जानकारी अनुसार महाराष्ट्र में कांग्रेस ने मरे हुए अंदाज में चुनाव लड़ा। वह तो शरद पवार ने चुनाव संभाला और शरद पवार ने ही कांग्रेस का काम आउटसोर्स में लेते हुए जैसे राज ठाकरे से प्रचार कराया उससे लड़ाई बनी। अन्यथा लग रहा था कि प्रदेश में भाजपा के आगे विपक्ष कहां है? लेकिन अब रिपोर्ट है कि विदर्भ में जनता ने खुद विपक्ष की तरफ से चुनाव लड़ा। जनता को सुनने का मौका मिला नहीं कि राज ठाकरे की सभाओं में भीड़ टूट पड़ी। लब्बोलुआब में जो रिपोर्ट है उस अनुसार महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना को कम से कम पंद्रह सीटों का नुकसान है। 

मैं भटक गया हूं। पते की मूल बात पर लौटा जाए कि भाजपा के लांच पैड याकि गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान में यदि मोदी की आंधी को मान लें तो उससे बनना क्या है? इन तीन राज्यों में 10 से 15सीटों का छोटा नुकसान भी हो तो उसकी भरपाई क्या यूपी, बंगाल से हो जाएगी? कतई नहीं हो रही है। 2019 के चुनाव की एक खूबी यह भी है कि जो मौन है उसे नरेंद्र मोदी और अमित शाह नहीं बूझ रहे हैं। आप मेरे चुनावी विश्लेषण में भी देख रहे होंगे कि मैं मुसलमान वोट का जिक्र ही नहीं करता हूं। ऐसा इसलिए क्योंकि वह सचमुच मौन है। उत्तर भारत की कांटे की लड़ाई वाली सीटों पर मुसलमान वोट दस से तीस प्रतिशत के बीच है। लेकिन इस चुनाव में मुस्लिम नेताओं, मौलनाओं के दस वाक्य नहीं सुनाई दिए होंगे। मुसलमान और ईसाई सौ टका मौन है तो उत्तरप्रदेश में दलितऔर यादव वोट व बाकी जगह आदिवासी वोट ऐसे व्यवहार कर रहा है मानो उनके लिए चुनाव हो ही नहीं रहा है। जबकि असलियत में ये रिकार्ड तोड़ मतदान कर रहे हैं। ये मौन हैं और शोर बामन, बनियों, ठाकुरों मोदी भक्तों से है।

जो हो, मध्यप्रदेश और राजस्थान के मोदी हल्ले ने सोचने के कई बिंदु दिए। बचा बिंदु यह है कि मोदी के इन कथित गढ़ में छोटे-छोटे सुराख भी कथित मोदी आंधी के लिए घातक होंगे। मोदी-शाह के चुनावी रथ के टायर इन छोटी कीलों से ज्यादा पंक्चर होंगे। इस पर कल विचार।

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