• [EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 06 May, 2019 06:54 AM | Total Read Count 898
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यह मोदी का आत्मविश्वास या घबराहट?

नरेंद्र मोदी के भाषण पहेली बनते जा रहे हैं। समझ नहीं आ रहा है कि वे चुनाव को ले कर घबराएं हुए हैं या अपने को जीता माने बैठ इस आत्मविश्वास में हैं कि वे कुछ भी बोले उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। हां, विरोधी नेताओं को जेल में डालने, राजीव गांधी को भ्रष्टाचारी नंबर वन कहने, कांग्रेस उनको मरवा देना चाह रही जैसे वाक्यों से अपने को लगता है विनाश काले विपरित बुद्धि। पर फिर ख्याल आता है कि मोदी-शाह तो पल-पल जमीनी फीडबैक ले रहे होंगे। ऐसे में ये ममता बनर्जी, शरद पवार, मायावती, राहुल गांधी आदि सबसे इतना भारी पंगा कैसे ले रहे हैं?

सचमुच बतौर व्यक्ति, बतौर प्रधानमंत्री, बतौर राष्ट्रीय नेता के नाते नरेंद्र मोदी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में जैसा जो बोला है वह उनके व्यक्तित्व-कृतित्व में पुण्यता जोड़ने वाला नहीं है बल्कि उसे काला बनाने वाला है। 72 साल के आजाद भारत के इतिहास में किस प्रधानमंत्री ने ऐसे वाक्य बोले हैं जो नरेंद्र मोदी ने चुनावी अधिसूचना के बाद बोले हैं? नरेंद्र मोदी को इतना तो ख्याल होना चाहिए कि आने वाली पीढ़ियों में बतौर प्रधानमंत्री उनके मनसा, वाचा, कर्मा में उनके वाक्य भी बानगी होंगे। तात्कालिकता में जनता कितनी ही मूर्खता में रहे, उसे कितना ही मूर्ख बना ले लेकिन भविष्य तो मोदी द्वारा देश को मूर्खताओं में ले जाने और उसके लिए बोले जुमलों का मोदीनामा लिए होगा। मोदी कैसे प्रधानमंत्री थे और उन्होंने वोट, सत्ता के लिए जनता को बांटने, विपक्ष को देशद्रोही, पाकिस्तानी एजेंट बताने, संस्थाओं के दुरूपयोग में कैसे-क्या किया यह इतिहास तो लिखा ही जाना है। कैसे ये बाते इतिहास में विलुप्त हो सकती है कि मोदी सेना को वोट का कटोरा बना कर वोट मांगने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री थे! उन्होंने चुनाव काम, उपलब्धियों पर नहीं लड़ा बल्कि गालियों, हिंदुओं को डरा कर, विपक्ष को धमका कर लड़ा! 

मोदी का यह ताजा बयान मूल सवाल पर लौटाता है कि उन्हें क्यों यह कहने की जरूरत हुई कि राजीव गांधी उर्फ मिस्टर क्लीन का जीवन भ्रष्टाचारी नंबर वन के रूप में खत्म हुआ। ध्यान रहे राजीव गांधी के ऊपर बोफोर्स तोप घोटाले का जो आरोप लगा था वह लंबी जांच, वाजपेयी सरकार की कानूनी कार्रवाईयों के बावजूद सही साबित नहीं हुआ था। फिर अभी नरेंद्र मोदी- अमित शाह के पास राहुल, सोनिया, प्रियंका, रार्बट वाड्रा का पूरा परिवार निशाने में जब है तो उसी पर टिके रहने के बजाय एक दिवंगत प्रधानमंत्री पर बोलने की मोदी को भला क्यों जरूरत हुई?  

एक वजह शायद राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा का घबराना नहीं है। भाई-बहिन दोनों जिस हिम्मत से चुनाव लड़ रहे हैं उससे मोदी-शाह निश्चित ही हैरान हैं। मैं पहले भी लिख चुका हूं कि राहुल गांधी ने हिम्मत गजब दिखाई। राफेल सौदे में नरेंद्र मोदी को चोर बताने और साथ में अंबानियों-अदानियों-खरबपतियों के खिलाफ जो साहस राहुल गांधी ने दिखाया है वह बेमिसाल है। सोचें, यदि नरेंद्र मोदी, चौकीदार चोर का हल्ला नहीं होता और राहुल गांधी से ले कर ममता बनर्जी जनसभाओं में चौकीदार चोर के जनता से नारे नहीं लगवा रहे होते तो इस चुनाव में नरेंद्र मोदी को घेरने वाला मुद्दा क्या होता? राहुल गांधी को दस तरह से डराने, दबाने की कोशिश हुई लेकिन राहुल ने रत्ती भर चिंता नहीं की। आज भी पूरे देश में, विपक्ष की जनसभाओं में, राहुल-ममता बनर्जी से ले कर राज ठाकरे सभी की जनसभाओं में चौकीदार चोर नंबर एक हल्ला है। 

तब नरेंद्र मोदी क्यों राजीव गांधी उर्फ मिस्टर क्लीन को भ्रष्टाचारी नंबर वन बोल कर बदला नहीं ले? इसलिए राहुल गांधी और ममता बनर्जी से नरेंद्र मोदी बदला लेते हुए दिख रहे हैं। पर क्या बात इतनी सीधी है? मैं नहीं मानता। मैं मानता हूं कि वक्त खराब है, विनाशकाले विपरित बुद्धि है इसलिए मोदी-शाह एक के बाद एक गलती कर रहे है। 24 मार्च से ले कर अब तक नरेंद्र मोदी ने जितने भाषण दिए, जैसा नैरेटिव बनाया उससे उनके प्रति मन ही मन उन सबमें खुन्नस, एलर्जी बनी होगी जिनका 23 मई के बाद मोदी-शाह को साथ चाहिए। मोदी के भाषण भक्तों में हिट हो सकते हैं मगर तटस्थ मतदाताओं, विरोधी मतदाताओं को लुभाने, उनके दिल-दिमाग से नाराजगी मिटाने वाले, नए वोट पटाने वाले कतई नहीं है। मोदी-शाह के भाषण और प्रचार शौर-गूंज ऐसा एक कमरा, चैंबर है जिसके इको से, उसी का हल्ला सुन-सुन कर मोदी-शाह तीर मार लेने की खामोख्याली में हैं। खुद के बजवाएं नगाड़ों से ही जीत के मुगालते में हैं।  

यदि यह गलत है तो मानना होगा कि मोदी वापिस प्रधानमंत्री बनना गारंटीशुदा मान रहे हैं। नरेंद्र मोदी को आगे की चिंता नहीं है। नरेंद्र मोदी ने जितनी तरह से गालियां, धमकियां विरोधी नेताओं को दी है उसका अर्थ है कि उनमें तनिक भी चिंता नहीं है कि यदि उन्हे 200 से कम सीटे मिली तो उनको कौन समर्थन देगा? यह चिंता नहीं हैं कि यदि वापिस प्रधानमंत्री नहीं बने तो अगली सरकार उनकी और अमित शाह की क्या दशा करेगी? फिर सवाल उठता है जब ऐसा है तो भला राजीव गांधी पर भ्रष्टाचारी नंबर वन की गाली चस्पाने की प्रधानमंत्री पद को जरूरत क्यों हुई? 

इस बिंदु पर फिर लगता है मोदी में घबराहट है। खराब वक्त में विनाश काले विपरित बुद्धि है। यदि नरेंद्र मोदी जीत गारंटीशुदा मान रहे होते तो न सेना के कटोरे की जरूरत होनी थी और न मतदाताओं को मूर्ख बनाने के लिए दस तरह के जुमले बोलने थे। आप भी सोचिए मोदी किस मनोदशा में हैं।

वाह! सुपरहिट मायावती
मैं ने गड़बड़ की जो अयोध्या में नरेंद्र मोदी की जनसभा देखी और लिख मारा कि यूपी में मोदी की जनसभाएं फ्लाप है। मेरे उस कालम का पता नहीं क्या असर हुआ जो मोदी-शाह ने सुनील बंसल को हेलिकॉप्टर से फैजाबाद-अंबेडकरनगर में लैंड कराया। संघ वाले पहुंचे। हाइपर एक्शन में अयोध्या, फैजाबाद में दो रोड शो फटाफट हुए। उस सबका ब्यौरा देते हुए फैजाबाद के पुराने साथी पत्रकार त्रियुग नारायण ने आश्चर्य जतलाते हुए कहा अंबेडकरनगर में मायावती की आज की सभा गजब हुई। अदूभुत थी। हां, मैं त्रियुग को मोदी की सभा के अनुभव के बाद आगे की फीडबैक के लिए कह कर आया था।  

त्रियुग ने गुलाबबाड़ी में अखिलेश की जनसभा और अंबेडकरनगर में मायावती की सभा देख बताया एलायंस के वोटर जूनूनी है। मायावती खुद भीड़ व माहौल देख हैरान थी। आश्चर्य से बोली इतनी भीड देख कर लगता है सब लोग दिल्ली की नमो सरकार को हटाने में लग गए है लेकिन हमें आगे चल कर योगी सरकार को भी हटाना है। त्रियुग अनुसार दलित-यादव-मुस्लिम सहित अति पिछड़ी जातियों के लोगों की भीड़ ने गर्मी के बावजूद मायावती को सुना और पूरे जोश से। मोदी के भक्तों, कार्यकर्ताओं की तरह एलायंस के कार्यकर्ता और वोटर सभा शुरू होते रवाना नहीं होने लगे। 

पर मैं त्रियुग की इस फीडबैक से सहमत नहीं हूं कि उसे फील हो रहा है कि फैजाबाद में एलायंस और कांग्रेस में आमने-सामने का मुकाबला बनता दिखने लगा है। भाजपा 2014 से पहले तीसरे नंबर पर जैसे हुआ करती थी वैसे जा सकती है। कांग्रेस के निर्मल खत्री और एलायंस-सपा के आनंद सेन में ही मुकाबला बनता दिखता है। ध्यान रहे 2009 और 2004 में भाजपा के ललूसिंह हारते रहे है। 2004 व 2009 के चुनाव का आंकड़ा बोलता है कि अयोध्या कि इस सीट में भाजपा का कोर वोट सिर्फ 20 से 25 प्रतिशत के बीच है। वह 2014 में मोदी आंधी से 48 प्रतिशत हुआ। तब कांग्रेस के निर्मल खत्री का वोट एकदम पैंदे 13 प्रतिशत पर चला गया था जबकि सपा-बसपा एलायंस का कुल वोट तब भी 43 प्रतिशत था। इससे पहले 2009 में निर्मल खत्री 28 प्रतिशत वोट ले कर जीते थे। इस गणित में अपना मानना है कि निर्मल खत्री-कांग्रेस से भाजपा को 2014 में गए वोट का 5-10 प्रतिशत भी कांग्रेस को वापिस लौटा ले तो एलायंस उम्मीदवार आनंद सेन के मजे हैं। निर्मल खत्री का जोर बन रहा है तो उससे भाजपा के ललू सिंह को खतरा है। एलायंस का तो 2014 जितना वोट पड़ गया तो भी बहुत होगा बेशर्ते यदि कांग्रेस के निर्मल खत्री फैजाबाद-अयोध्या शहर में अपने पुराने वोटों का पांच प्रतिशत वोट लौटा ले। और जहा तक अंबेडकर नगर की सीट का सवाल है तो उसमें फैसला मायावती की आज की सभा और गुरूवार की मोदी की सभा से अपने आप बनता दिखता है। हालांकि मेरा आज यह लिखना संघ-भाजपा को और हाइपर बनवा देगा आखिर मामला अयोध्या का है। तभी मैं जानबूझ कर इस बार विश्लेषण में सीटवार तस्वीर से बच रहा हूं। 

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