• [EDITED BY : Uday] PUBLISH DATE: ; 02 March, 2019 11:16 AM | Total Read Count 277
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हास्य फिल्मों का बदलता मिजाज

दिग्गज फिल्मकार भी मानते हैं कि हास्य फिल्म बनाना सबसे नाजुक और मुश्किल काम है। जरा सी सीमा पार होते ही फिल्म फूहड़ हो सकती है। फिल्मों के जरिए व्यंग्य करना उससे ज्यादा मुश्किल होता है। इसके लिए विषय और स्थितियों को गहराई से समझना जरूरी है। यही वजह है कि अच्छी हास्य फिल्में फिर भी थोड़ी बहुत बन जाती हैं, लेकिन व्यंग्यात्मक फिल्में कभी कभार ही सामने आ पाती हैं। राज कपूर ने ‘श्री 420’ में सामाजिक व्यवस्था की विसंगति पर खासा कटाक्ष किया। ‘जागते रहो’ में एक गरीब पानी पीने के लिए एक इमारत में दाखिल होता है। लोग उसे चोर समझ लेते हैं। बचते बचाते वह समाज के कई रूप देख लेता है।

वह घबराया हुआ होता है लेकिन उसके साथ घटने वाली परिस्थितियों ने दर्शकों को काफी गुदगुदाया। कई फिल्मकारों ने सार्थक हास्य फिल्में बनाने की कोशिश तो की लेकिन स्थितियों पर कटाक्ष करने वाली सबसे महत्वपूर्ण फिल्म कुंदन शाह की ‘जाने भी दो यारों’ रही। अजीज मिर्जा ने ‘फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’ में इलेक्ट्रानिक मीडिया की आगे रहने की होड़ का दिलचस्प खाका खींचा। इन दोनों फिल्मों के बीच ऋषिकेश मुखर्जी ने ‘गोलमाल’, ‘चुपके चुपके’ व ‘रंग बिरंगी’ बासु चटर्जी ने ‘चमेली की शादी’, ‘खट्टा मीठा’ व ‘छोटी सी बात’, सई परांजपे ने ‘कथा’, ‘दिल्लगी’ व ‘चश्मे बद्दूर’, गुलजार ने ‘अंगूर’ जैसी उत्कृष्ट हास्य फिल्में दी।

अस्सी के दशक में हिंसा व पारिवारिक मेलोड्रामा से लथपथ हो गए दौर में डेविड धवन ‘आंखे’ से और प्रियदर्शन ‘मुस्कुराहट’ से सामने आए। दोनों का अंदाज अलग-अलग था। डेविड चुलबुली शैली को अपनाते हुए कहीं कहीं फूहड़ता का सहारा लेते दिखे तो प्रियदर्शन प्राकृतिक हास्य पर केंद्रित रहे। लेकिन जल्दी ही उनकी शैली बदल गई। डेविड धवन फूहड़ता पर उतर आए तो प्रियदर्शन ज्यादा फिल्में एक साथ करने के चक्कर में सहज हास्य पर अपनी पकड़ खो बैठे। हास्य फिल्म बनाना तो खैर नाजुक काम है ही, फिल्मों के जरिए  व्यंग्य करना उससे ज्यादा मुश्किल है। इसके लिए विषय को गहराई से समझना जरूरी है।

यही वजह है कि अच्छी हास्य फिल्में फिर भी थोड़ी बहुत बन जाती हैं लेकिन व्यंग्यात्मक फिल्में कभी कभार ही आती हैं। पिछले एक डेढ़ दशक में यह क्रम टूटा है। खास बात यह है कि इस तरह की फिल्में बनाने का उत्साह हर वर्ग के फिल्मकारों ने दिखाया है। राज कुमार हीरानी ने ‘मु्न्ना भाई एमबीबीएस’ में चिकित्सा व्यवस्था की जड़ता व खामियों को उजागर किया। इसी कड़ी की अगली फिल्म ‘लगे रहे मुन्ना भाई’ में महात्मा गांधी के विचारों के सरलीकरण या फिल्मीकरण की आलोचना भले ही हुई लेकिन एक रिवाज की तरह गांधी का नाम जपने वाले देश में फिल्म ने गांधीगिरी का एक नया नारा दिया जो समाज और परिवार को जोड़ने वाला था। फिल्म ने व्यवस्था में बदलाव का एक सांकेतिक आधार भी दिया था। उसे व्यावहारिक नहीं माना गया।

लेकिन फिल्म से प्रेरणा लेकर विरोध जताने में इसी फिल्मी गांधीगिरी का इस्तेमाल खूब हुआ। बाद में राज कुमार हीरानी ने ‘थ्री इडियट्स’ में देश की शिक्षा व्यवस्था और आगे बढ़ने की होड़ पर कटाक्ष किया और ‘पी के’ में धार्मिक आस्था पर चुभते हुए सवाल उठाए। कुछ साल पहले ‘खोसला का घोसला’, ‘ओए लकी लकी ओए’,  ‘लव शव ते चिकन खुराना’, ‘शीरीन फरहाद की तो निकल पड़ी’, ‘किस्मत पैसा लव दिल्ली’, ‘मेरे डैड की मारुति’, ‘भेजा फ्राय’, ‘तेरे बिन लादेन’ और ‘पीपली लाइव’ जैसी कई फिल्मों ने हास्य का सहारा लेकर लोगों को गुदगुदाया। खास बात यह रही कि इन फिल्मों ने फूहड़ता से बचे रह कर हर तरह के समाज की बेबसी और आकांक्षाओं को दिखाया। समाज में जो कुछ घट रहा है, उसका स्वाभाविक चित्रण इन फिल्मों में दिखा।

समाज जिन चुनौतियों का सामना कर रहा है और उसमें वह तरह-तरह के प्रलोभनों से बचते हुए अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए जूझ रहा है, उस पर टिप्पणी करते हुए हंसाना आसान काम नहीं है। यह काम पहले भी हालांकि फिल्मों ने किया है। लेकिन अब यह सिलसिला बढ़ रहा है। अंशुल शर्मा के निर्देशन में तीन साल पहले रिलीज हुई फिल्म ‘सारे जहां से महंगा’ ने उस समस्या को उठाया गया जिससे पूरा देश त्रस्त है। फिल्म में संजय मिश्रा के अलावा कोई ज्यादा चर्चित कलाकार नहीं था। महंगाई ने सामान्य परिवार का जीवन कितना दूभर कर दिया है, फिल्म में उसी का चित्रण था।

हर पात्र की वेदना टीस जरूर पैदा करती है लेकिन कटाक्ष गुदगुदाता है। विशाल भारद्वाज ने ‘मटरू की बिजली का मंडोला ’ में किसानों की जमीन हथियाने की राजनीति को दिखाया। आमतौर पर गंभीर फिल्में बनाते रहे विशाल भारद्वाज ने फिल्म में देशज माहौल तो बनाए रखा ही, राजनीतिज्ञों और उद्योगपतियों के गठजोड़ को रोचक तरीके से उभारा भी। व्यंग्यात्मक फिल्में बनाने वाले सभी फिल्मकार मानते हैं कि कुंदन शाह की 1983 में बनी फिल्म ‘जाने भी दो यारों’ से उन्हें प्रेरणा मिली।

नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, पंकज कपूर, सतीश शाह, रवि वासवानी, भक्ति वर्बे फिल्म के मुख्य कलाकार थे और सिर्फ सात लाख रुपए में बनी थी। इस फिल्म का डिजीटल प्रिंट पिछले साल रिलीज किया गया और काफी सराहा गया। इस तरह की हास्य फिल्मों के प्रति फिल्मकारों में उत्साह इसलिए बढ़ा है क्योंकि दर्शकों का सहारा ऐसी फिल्मों को मिलने लगा है। हालांकि इस तरह की फिल्म बनाना सभी चुनौतीपूर्ण मानते हैं। ‘जॉली एलएलबी’ में खुर्राट वकील बने बोमन ईरानी का कहना है- ‘व्यंग्य सही माने में हास्य है।

लेकिन यह तभी हो सकता है जब चुने गए विषय के तमाम पहलुओं को समझ कर उन्हें उभारा जाए।’ हास्य फिल्में तभी दमदार हो सकती हैं जब कहानी को सीधे सादे ढंग से कहा जाए। और पिछले कुछ साल की कई फिल्में इसी राह पर चलते हुए सफलता पा रही हैं। पहले की तरह स्थापित हास्य कलाकारों को लेकर या प्रमुख कलाकारों से जबरन हास्य भूमिका कराने की परंपरा टूट रही है। यह फिल्मों में स्वस्थ हास्य में बचे रह पाने का अच्छा संकेत है। 

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