नकल और दोहराव का फिल्मी हॉरर


[EDITED BY : Uday] PUBLISH DATE: ; 30 March, 2019 11:24 AM | Total Read Count 233
नकल और दोहराव का फिल्मी हॉरर

श्रीशचंद्र मिश्र पिछले करीब एक साल में आई दो फिल्मों ‘स्त्री’ व ‘परी’ की सामान्य बाक्स आफिस सफलता के आधार पर यह धारणा बना लेना गलत होगा कि दर्शकों को भुतहा आतंक भाने लगा है। ‘परी’ और उससे पहले अनुष्का शर्मा की ही ‘फिल्लौरी’ के लिए उत्सुकता जगी तो अनुष्का की उपस्थिति में ‘स्त्री’ को भी इन दो फिल्मों में जोड़ ले तो तीनों फिल्में पसंद कई गई तो लोक कथाओं के करीब होने और उनमें सितारों की मौजूदगी की वज से। बहरहाल बड़ा तथ्य यह है कि कुछेक अपवादों को छोड़कर हॉरर परोसने वाली यानी भुतहा या डरावनी फिल्मों का अपने यहां उपयुक्त बाजार विकसित नहीं हो पाया। वजह दो हैं।

अपवाद के रूप में कमाल अमरोही की ‘महल’ और हेमंत कुमार की ‘बीस साल बाद’ जैसी गिनी चुनी फिल्मों को छोड़ दिया जाए तो हिंदी की ज्यादातर हॉरर फिल्मों में मौलिकता का नितांत अभाव रहा है। विदेशी, खास कर हॉलीवुड की हॉरर फिल्मों की लुगदी को ही बड़ी ‘श्रद्धा’ से इस्तेमाल किया जा रहा है। दसूरी वजह आम तौर पर कोई नामी स्टार इस तरह की फिल्मों का हिस्सा बनने में रुचि नहीं दिखाता। ले देकर विपाशा बसु ही ऐसा बड़ा नाम है जो ‘हॉरर’ फिल्मों का पसंदीदा चेहरा बनी हुई है।

पिछले करीब दस साल में विपाशा बसु की पहचान एक सशक्त अभिनेत्री के रूप में भले ही न बन पाई हो, उनके अभिनय की कम और बनते-बिगड़ते रिश्तों की चर्चा ही ज्यादा होती हो लेकिन एक मामले में वे अपनी समकालीन अभिनेत्रियों से बेहतर साबित हुई हैं। डरावनी फिल्मों की वे सबसे पसंदीदा अभिनेत्री मान ली गई है। भुतहा और पारलौकिक मान्यताओं पर केंद्रित सबसे ज्यादा फिल्में उन्होंने ही की है।

शायद इसकी एक वजह यह है कि मॉडलिंग की दुनिया में अच्छा भला नाम कमा चुकने के बाद विपाशा ने जब फिल्मों में कदम रखा तो उनकी पहली फिल्म ‘राज’ भुतहा फिल्म थी। महेश भट्ट के फिल्म बनाने के कारखाने से निकली यह फिल्म विपाशा के उत्तेजनात्मक देह प्रदर्शन की वजह से खासी सफल रही थी। आंतक या हॉरर का इसमें योगदान था या नहीं, इस पचड़े में फंसने की बजाए निर्माताओं ने उन्हें भुतहा फिल्मों के लिए सबसे ज्यादा उपयुक्त मान लिया।

यही वजह है कि विपाशा ने अभी तक जो साठ फिल्में की हैं उनमें से करीब आधी आंतक व  अंध मान्यताओं पर केंद्रित रही है। ‘राज-3’ में उन्हं दोहराया गया और फिर ‘आत्मा’, ‘क्रिएचर थ्री डी’ के बाद विपाशा ने ‘एलोन’ में फिर हॉरर का सहारा लिया। पिछले कुछ सालों में भुतहा फिल्मों का नया दौर शुरू हो गया है। हालांकि यह कोई नई परंपरा नहीं है। हर बार जब भी फिल्मकारों को कोई नया विषय नहीं सूझता तो भूत प्रेतों की काल्पनिक दुनिया से दर्शकों को रोमांचित करने का नुस्खा झाड़ पोंछ कर वे फिर सामने लागते रहे हैं।

इस तरह की फिल्में बनाने में ज्यादा दिक्कत भी नहीं होती और उनके लिए ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती। विषय और उसके प्रस्तुतिकरण का आइडिया तो हॉलीवुड की फिल्मों से मिल ही जाता है। सबसे बड़ी राहत यह है कि ऐसी फिल्मों में तर्क या विश्वसनीयता का ध्यान रखने की कोई जरूरत नहीं होती। भूत प्रेत की अवधारणा भी ऐसी है कि न तो उसे खारिज किया जा सकता है और न ही वैज्ञानिक आधार पर उसके अस्तित्व की पुष्टि की जा सकती है। इससे फिल्म में कुछ भी दिखाने की छूट मिल जाती है।

अब तो तकनीक इतनी विकसित हो गई है कि स्पेशल इफेक्ट्स की मदद से डरावना माहौल आसानी से रचा जा सकता है। कुछ निर्माता तो भुतहा फिल्मों को लेकर इस कदर आश्वस्त हैं कि वे जब भी मौका मिलता है, भुतहा फिल्म बना डालते हैं। महेश भट्ट तो ‘मर्डर’ और ‘राज’ शीर्षक की चार फिल्में बना चुके हैं।  ‘क्रोधी’, ‘दौड़’ ‘रंगीला’ तक कुछ नया कर दिखाने की कोशिश में रहे राम गोपाल वर्मा जब ‘मस्त’ व ‘नाच’ जैसी फिल्मों में हाथ झुलसा बैठे तो उन्होंने अपनी फिल्म निर्माण फैक्टरी को माफिया या भुतहा फिल्मों में झोंक दिया।

विडंबना यह है कि एक दो अपवाद को छोड़कर भारत में बनी हर भुतहा फिल्म हॉलीवुड फिल्मों की कोरी नकल पर बनी है। और चीजों की तरह आत्माओं की कहानी विदेशों से आयात करना फिल्मकारों को हमेशा सुविधाजनक लगा। ‘राज’ से शुरू हुआ इस बार का दौर ‘आत्मा’, ‘भूत-2’ ‘1921’ व ‘तलाश’ से होता हुआ ‘एक थी डायन’ से होता हुआ ‘एलोन’ तक आ पहुंचा है। विराम यही नहीं लगा है। पिछले साल ही आधा दर्जन फिल्में डराने का लक्ष्य लेकर आईं। इस तरह की फिल्में हमेशा सफल हों, यह जरूरी नहीं है।

फिल्म भी ऐसी फिल्में लोगों में उत्सुकता जगाती है। कभी फिल्म की कपोल कल्पना उन्हें खिझाती है तो कभी डरा भी देती है। भूत होते हैं या नहीं, यह वैज्ञानिक बहस का नहीं अंधविश्वास का विषय है। फिल्म बनाने वाले भूतों का अस्तित्व शुरू से ही मानते आए हैं। सिर्फ भारत जैसे दकियानूसी माने जाने वाले देश के लकीर के फकीर फिल्मकार ही नहीं, आधुनिक और वैज्ञानिक नजरिया अपनाने वाले कई संपन्न देशों की जानी मानी हस्तियां भी भूतों की दुनिया दिखाने में पीछे नहीं है। भय और आतंक को मनोरंजन का एक जरिया पूरी दुनिया में स्वीकार कर लिया गया है। यही वजह है कि भूतों की दुनिया के अजब गजब रंग दशकों से दिखा कर फिल्में सफलता पाती रही हैं।

अपने यहां पिछले कुछ सालों से भूत-प्रेत की अवधारणा को मान्यता दिलाने की कोशिश कई फिल्मों ने की है। लेकिन ‘रागिनी एमएमएस’, ‘हेट स्टोरी’ व ‘राज-3’ को छोड़ कर और कोई भी फिल्म सफल नहीं हो सकी। ‘रागिनी एमएमएस’ का सीक्वल ‘बेवी डॉल मैं सोने की’ गीत की अपार लोकप्रियता और सनी लियोन के उत्तेजनात्मक देह प्रदर्शन के बावजूद दर्शकों को लुभा नहीं सका। ‘हेट स्टोरी-2’ को मसालेदार बनाने के लिए सेक्स और सनी लियोन के आइटम गर्ल का तड़का लगाया गया। ‘मनु वेड्स तनु’ व ‘रांझना’ में अपने स्वाभाविक अभिनय की छाप छोड़ने वाली स्वरा भास्कर खासी मशक्कत के बाद भी फिल्म ‘मछली जल की रानी है’ को डूबने से बचा नहीं पाईं।

‘एलोन’ और उससे पहले ‘आत्मा’ में विपाशा बसु का उत्तेजनात्मक देह प्रदर्शन भी रंग नहीं जमा पाया। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। क्या दर्शक अब भुतहा फिल्मों से डरते नहीं या उन्हें अब ऐसी फिल्मों से मनोरंजन की खुराक पूरी होती नहीं लगती? वजह कई हैं। सबसे बड़ी वजह तो कल्पनाशीलता का अभाव है। लगभग सभी फिल्मों में डराने के वही जाने पहचाने नुस्खे आजमाए जा रहे हैं। एक जमाने में सुनसान हवेली, कब्रिस्तान, खूंखार चेहरे और धुंआ उड़ा कर डर का माहौल गढ़ा जाता था।

तकनीक सुधरी तो स्पेशल इफेक्ट्स से डर का दायरा बढ़ाया गया। शुरू में इस प्रयोग ने रोमांचित किया लेकिन बाद में ऐसे ही तरीकों के बार-बार के दोहराव ने आतंक दृश्यों को कामेडी दृश्यों में बदल दिया। देखने वालों को पूर्वाभास होने लगा कि अब कौन सा नया कौतुक सामने आएगा। भुतहा फिल्में एक परंपरा का पालन करने के लिए ही आम तौर पर बनती हैं। हॉलीवुड में बनी फ्रैकेंस्टाइन व ड्रेकुला कड़ी की भुतहा फिल्मों की नकल पर हिंदी फिल्मों में भी भूत प्रेत का अस्तित्व दर्शकों के गले उतारने की पिछले पांच दशक में काफी कोशिश हुई, लेकिन छोटे स्तर पर। रामसे परिवार ने अपेक्षाकृत कम लोकप्रिय कलाकारों को लेकर छोटे बजट की भुतहा फिल्में बनाने का सिलसिला चलाया।

आज यह सिलसिला ज्यादा व्यापक हो गया है। महेश भट्ट, एकता कपूर व राम गोपाल वर्मा की फिल्म फैक्टरियों से दनादन निकली भुतहा फिल्मों ने कल्पना से परे की एक ऐसी दुनिया खड़ी की जिसे न तो आसानी से स्वीकार किया जा सकता है और न झटके से खारिज ही किया जा सकता है। एक समय था जब भुतहा फिल्में छोटे केंद्रों में ही चलती थीं। ‘राज-3’ व ‘मर्डर-3’ की सफलता ने साबित किया कि ऐसी फिल्में महानगरों में भी पसंद की जाने लगी हैं। लेकिन सभी फिल्मों को यह नसीब नहीं हो पाता।

सवाल यह उठता है कि ये फिल्में दिखा क्या रही हैं? 25 करोड़ रुपए में बनी और 94 करोड़ रुपए कमाने वाली ‘राज-3’ एक ऐसी अभिनेत्री की कहानी थी जो सफलता के लिए पहले पूजा पाठ करती है और फिर बुरी आत्माओं की शरण में चली जाती है। एक प्रेतात्मा उसकी सौतेली बहन को पृथ्वी और आकाश के बीच एक अनजाने लोक में कैद कर देता है। यह लोक पहले फ्लैट जैसा दिखाया गया है। क्लाइमैक्स में उसे झुग्गी बस्ती बना दिया गया और हास्यास्पद यह रहा कि उस परलोक की एक झुग्गी की टीन की दीवार पर हाथी का फोटो था और बसपा के लिए वोट मांगा गया था। ‘मर्डर-3’ भी महेश भट्ट की फिल्म थी जिसे उनके भतीजे विशेष भट्ट ने निर्देशित किया था।

हॉलीवुड की ‘द हिडन फेस’ की हूबहू नकल पर बनी इस फिल्म में भुतहा दुनिया का वही रूप दिखाया गया जो हॉलीवुड की फिल्मों की पहचान है। ‘आत्मा’ में तो एकदम नया विषय लिया गया। एक पिता की आत्मा अपनी बेटी को साथ ले जाना चाहती है। इसे ही आधार बना कर फिल्म का ताना बाना बुना गया। एक ‘आत्मा’ पहले भी बनी थी और उसमें आत्मा की परिभाषा, उसकी ताकत और उसकी गतिविधियां अलग दिखाई गई थीं। दरअसल भुतहा फिल्म बनाने वालों में इस बात पर एका नहीं हो पाया है कि आत्मा को या भूत प्रेत को क्या पहचान दी जाए? सभी अपनी सुविधा और ज्यादा आतंक रचने की होड़ में अलग अलग व्याख्या कर देते हैं। ‘काल’ में आत्मा कभी आदमी बन जाती है तो कभी बाघ।

‘थ्री जी’ में मोबाइल फोन पर भूत कब्जा कर लेता है। हॉलीवुड में तो ड्रेकुला टाइप की भुतहा फिल्मों का जलाव शुरुआती दौर में रहा और 1960 के दशक तक उनकी चमक धुंधला जाने के बाद ‘द ममीज’ सीरिज की फिल्मों के अलावा ‘द ओमेन’, ‘एक्सजार्सिस्ट’, ‘द रिंग’, ‘ग्रुज’ जैसी कई फिल्में बनी जिन्होंने भुतहा अवधारणा का पश्चिमी रूप दिखाया। भारतीय फिल्मकारों को इसी की नकल करना ज्यादा सुविधाजनक लगा। सालों तक तो हिंदी फिल्में सस्पेंस से ही दर्शकों को अचंभित या रोमांचित करने में यकीन करती रहीं।

1949 में बनी बांबे टाकीज की फिल्म ‘महल’ को कुछ हद तक सस्पेंस नुमा भुतहा फिल्म माना जा सकता है। कमाल अमरोही के निर्देशन में पुनर्जन्म पर बनी इस फिल्म में देसी टच भी था। 1958 में विमल राय ने भी इसी कड़ी में एक फिल्म बनाई ‘मधुमती’ जिसमें आत्मा अपनी हत्या का बदला लेती है। यही कहानी ‘जन्म जन्म’ व ‘ओम शांति ओम’ में भी दोहराई गई।  भारत में आतंकित करने वाली जितनी भी फिल्में शुरू में बनीं चाहें ‘अपराधी कौन’ (1957) हो,  ‘बीस साल बाद’ (1962), ‘वोह कौन थी’ (1964), ‘मेरा साया’ (1966), ‘अनिता’ (1967) हो अथवा ‘राज’ (1968) सभी ने भूत प्रेत या आत्मा होने का आभास दिला कर दर्शकों को डराया जरूर लेकिन बाद में यह जाहिर भी कर दिया कि सारा किया धरा खलनायक का था। भूत-प्रेत जैसे विषय को छूने की हिम्मत इसलिए नहीं की गई क्योंकि एक तो उनका सफल होना उन्हें संदिग्ध लगा। दूसरे, ऐसी फिल्मों से उनकी छवि बिगड़ सकती थी। उन्हें दकियानूसी व पिछड़ा हुआ माना जाता।

नकल या प्रेरणा से ‘भूत बंगला’, ‘यह रात फिर न आएगी’ जैसी थोड़ी भुतहा फिल्मों की कमान धीरे-धीरे निर्माताओं के हाथ से छूटती गई। सस्पेंस को हॉरर का पर्याय मानने की परंपरा को तोड़ा रामसे ब्रदर्स ने। 1970 में ‘एक नन्हीं मुन्नी लड़की थी’ में नाकाम रहने के बाद एफयू रामसे ने 1972 में हॉरर फिल्म ‘दो गज जमीन के नीचे’ बनाई। सुनसान हवेली, कब्रिस्तान से आत्मा का निकलना, कौंधती बिजली और साउंड व लाइट का इफेक्ट- इन सभी तत्वों को जोड़ने और संवारने में पूरा रामसे परिवार लगा। अवधारणा से लेकर सेटअप और प्रस्तुतिकरण सब कुछ हॉलीवुड की फिल्मों से उड़ा कर इस परिवार ने एक समय तो ‘दरवाजा’, ‘वीराना’, ‘पुराना मंदिर’, ‘पुरानी हवेली’, ‘सामरी’ जैसी हॉरर फिल्मों की लाइन लगा दी। इन फिल्मों में ज्यादातर कलाकार नए होते थे।

बजट कम होने की वजह से हॉलीवुड की फिल्मों जैसी तकनीकी दक्षता इन फिल्मों में नहीं आ पाती थी। फिर भी इन फिल्मों ने अपना बाजार बनाया ही। ‘एक्सजार्सिस्ट’ ने भारतीय बाजारों में खासा तहलका मचाया था। इसी से उत्साहित होकर जासूसी फिल्में बनाने में सिद्धहस्त रविकांत नगाइच ने 1977 में ‘जादू टोना’ बनाई। परिवेश भारतीय लेकिन मान्यता और अवधारणा के आधार विदेशी। अरसे बाद बड़े सितारों को लेकर बनी यह भुतहा फिल्म इसलिए नहीं चल पाई क्योंकि मूल फिल्म देख चुके लोगों को उसकी भोंड़ी नकल हजम नहीं हुई।

1981 में अरुणा-विकास ने फिल्म ‘गहराई’ में पदमिनी कोल्हापुरे व अमरीशपुरी को लेकर इसी विषय को देशज पहचान दी लेकिन सीमित साधनों की वजहसे फिल्म अपनी व्यापक पहुंच नहीं बना पाई। जब यह मान लिया गया था कि भारत में भुतहा फिल्मों का दौर खत्म हो गया है। तभी फिल्में बनाने का कारखाना चला रहे राम गोपाल वर्मा ने कोई दो दशक पहले हॉरर फिल्में बनाने का मानो ठेका ले लिया। तेलुगू में पहले बनी ‘रात्रि’ को 1992 में उन्होंने हिंदी में ‘रात’ शीर्षक से बनाया। इसमें पहली बार भूत प्रेत की अवधारणा को मनोवैज्ञानिक नजरिए से देखा गया। पृष्ठभूमि ग्रामीण रखी लेकिन कहानी का विस्तार उन्होंने विदेशी अंदाज में किया। लिहाजा फिल्म पिट गई।

1999 में मनोज वाजपेयी और उर्मिला मातोंडकर को लेकर संस्पेस और हॉरर का मिला जुला फार्मूला अपनाया ‘कौन’ में। तीस साल पहले यश चोपड़ा की फिल्म ‘इत्तफाक’ का आधार भी लगभग यही था। लेकिन यह कतई संयोग नहीं था कि दोनों फिल्मों का आइडिया हॉलीवुड की फिल्म से उड़ाया गया था। ‘जंगल’ रामगोपाल वर्मा की मौलिक प्रस्तुति थी इसलिए डराने की बजाए खिझाती ज्यादा रही। ‘भूत’ पर फिर विदेशी फिल्मों का असर दिखा लेकिन नकल तमीज से हुई थी इसलिए रास आ गई।

वैसा जादू हालांकि उनकी कोई और भुतहा फिल्म नहीं दिखा पाई लेकिन राम गोपाल वर्मा ने ‘डरना मना है’, ‘डरना जरूरी है’, ‘नैना’, ‘वास्तु शास्त्र’, ‘फूंक’, ‘भूत रिटर्सं’ व ‘रक्त’ जैसी भुतहा फिल्मों में नए नए प्रयोग करना जारी रखा। ‘फूंक’ के लिए तो उन्होंने खुली चुनौती दी कि जो भी बिना डरे अकेले सिनेमाघर में बैठ कर पूरी फिल्म देख लेगा उसे वे पांच लाख रुपए देंगे। पता नहीं चल पाया कि कोई दर्शक इस कसौटी पर खरा उतर पाया या नहीं? क्योंकि फिल्म देखने ज्यादा दर्शक सिनेमाघर पहुंचे भी नहीं। यह मान्यता पूरी दुनिया में है कि मृत्यु के बाद की भी एक ऐसी दुनिया होती है जहां भूत-प्रेतों का अस्तित्व होता है। भारत में तो भूत प्रेतों की अवधारणा सदियों से गहरी जड़े जमा चुकी हैं।

अतृप्त आत्मा का होना तंत्र मंत्र और तांत्रिक अनुष्ठानों का सबसे बड़ा आधार रहा है। ग्रामीण परिवेश में ही नहीं शहरी माहौल में भी लोग इन बातों पर भरोसा करते हैं। मृत व्यक्ति का पिंडदान इसी आस्था के साथ किया जाता है कि उसकी आत्मा भटके नहीं। कुछ समय एक खबर आई थी कि मेहसाणा (गुजरात) का एक पुलिस स्टेशन सात साल से उजाड़ पड़ा है। वहां कोई जाना नहीं चाहता। मान्यता है कि उसी पुलिस स्टेशन के एक कांस्टेबल ने आत्महत्या कर ली थी और उसकी आत्मा वहां मंडराती रहती है। आश्चर्य की बात तो यह है कि इस डर को दूर करने की सात साल में कोई सरकारी कोशिश नहीं की गई। पारलौकिक दुनिया से संपर्क जोड़ने वाली कई लोककथाएं भी अपने यहां हैं।

राजस्थान की ऐसी ही एक लोककथा को साहित्यकार विजयदान देथा ने विस्तार दिया। उनकी लिखी कहानी पर मणि कौल ने कई साल पहले ‘दुविधा’ और बाद में शाहरुख खान ने अमोल पालेकर के निर्देशन में ‘पहेली’ बनाई। एक गांव के साहूकार का बेटा शादी वाले दिन कारोबार के लिए दूसरे शहर चला जाता है। उसे जाते देख पेड़ पर बैठा भूत उसकी शक्ल बदल कर उसके घर में रहने लगता है। जब असली व्यक्ति लौटता है तो पूरे परिवार के सामने उलझन खड़ी हो जाती है कि किसे स्वीकार करें? पाश्चात्य देशों में भी भूत प्रेत मानने का अंध विश्वास खासा है।

इन दिनों यह वहां ज्यादा बढ़ गया है। वह फिल्मों में दिखता भी है। वहां की कुछ फिल्मों में प्रेतात्मा के होने या न होने की मनोवैज्ञानिक पड़ताल करने की आधी अधूरी कोशिश भी हुई लेकिन अंत में मान लिया गया कि इस दुनिया से परे भी कोई दुनिया है जिसके रहवासी ज्यादा ताकतवर हैं। क्रास के जरिए इन ताकतों का मुकाबला कर इन फिल्मों ने धर्म के प्रति आस्था मजबूत करने का काम किया। हिंदी फिल्मों में इसके लिए त्रिशूल का सहारा कई फिल्मों में लिया गया। अब क्योंकि भारतीय संदर्भ की बात करना फिल्मकारी को पिछड़ापन लगने लगा है इसलिए वे त्रिशूल, पूजा पाठ या तंत्र मंत्र से परहेज करने लगे हैं। विदेशी फिल्मों का आधुनिक समाधान उन्हें ज्यादा उपयुक्त लगता है।

पिछले तीन दशक में भारत में बनी भुतहा फिल्मों में बुनियादी रूप से एक बड़ा बदलाव आया है। इस अरसे में बनी ज्यादातर फिल्मों की पृष्ठभूमि महानगर या बड़े शहरों के संपन्न व आधुनिक माने जाने वाले समाज पर केंद्रित हो गई है। विदेशी फिल्मों की नकल करने पर यह ढांचा अपनाने में उन्हें सहूलियत भी रहती है। पिछले कुछ सालों में ‘शैतान’, ‘घोस्ट’, ‘हांटिड’, ‘ए फ्लैट’, ‘1920’ और ‘1920-इविल रिटर्सं’ जैसी कई भुतहा फिल्में आई लेकिन एकता कपूर की फिल्म ‘एक थी डायन’ जितनी चर्चित व विवादास्पद फिल्म कोई और नहीं रही। राष्ट्रीय महिला आयोग लाख कोशिश के बाद भी शीर्षक से डायन शब्द नहीं हटवा पाया।  फिल्म के प्रमोशन के लिए एकता ने अपने पुराने सीरियल की आठ नायिकाओं को लेकर दो-दो एपिसोड का एक सीरियल ‘एक थी नायिका’ बना डाला।

‘एक थी डायन’ में पहले विद्या बालन व रानी मुखर्जी को लेने की योजना थी। उनका कहना है कि रोल चुनौतीपूर्ण नहीं था। हालांकि कहा जाता है कि दोनों को भुतहा फिल्म से अपने इमेज बिगड़ जाने का खतरा दिख रहा था। पारिवारिक सीरियल बनाने के लिए विख्यात रहीं एकता कपूर की भुतहा विषयों में काफी रूचि रही है। 1995 में उन्होंने भुतहा सीरियल ‘मानो या ना मानो’ भी बनाया। फिल्म निर्माता बनने केबाद उन्होंने ‘रागिनी एमएमएस’ व ‘कृष्णा काटेज’ जैसी भुतहा फिल्में बनाई। ‘रागिनी एमएमएस’ का तो उन्होंने सीक्वल भी बना डाला। लेकिन डराने की बजाए सेक्स के जरिए दर्शकों को लुभाने की उनकी कोशिश ज्यादा रही। महेश भट्ट बेहद जागरूक व समझदार फिल्मकार माने जाते है।

सामाजिक और पारिवारिक द्वंद्वों को विषय बनाना वे अपनी विशेषता बताते रहे हैं। लेकिन जब से निर्देशन का दायित्व उन्होंने छोड़ा है तब से उनकी विचारशीलता सेक्स और भूत प्रेत तक सिकुड़ कर रह गई है। उनकी ताजा फिल्म ‘खामोशिया’ ने भी डगर नहीं बदली है। ‘राज’ सीरिज की चारों फिल्मों को वे भले ही अपनी मौलिक उपलब्धि माने लेकिन वे हालीवुड की फिल्मों से प्रेरित थीं। राम गोपाल वर्मा हो या एकता कपूर अथवा महेश भट्ट, इस आरोप से नहीं बच सकते कि अपने व्यावसायिक फायदे के लिए उन्होंने अंधविश्वास को दर्शकों के गले उतारा।

दर्शकों ने अपनी प्रतिकूल प्रतिक्रिया देकर फिलहाल तो इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने की चेतावनी दे दी है। लेकिन यह सिलसिला थमने वाला नहीं है। आतंकित करने का कोई नया नुस्खा दुनिया में कहीं भी किसी फिल्मकार को सूझ गया और वह दर्शकों को रोमांचित कर गया तो उसकी नकल पर सरपट दौड़ने में अपने फिल्म वाले पीछे नहीं रहने वाले। डर एक ऐसी चीज है कि इसे लेकर उत्सुकता, उत्कंठा और आतंक का अहसास हर व्यक्ति को कभी न कभी होता है। हॉरर की एकरसता या उसकी जरूरत से ज्यादा मात्रा लोगों को इस तरह की फिल्मों से कुछ समय के लिए विमुख भले ही कर दे, उनसे उनका लगाव पूरी तरह छूट नहीं पाता। अदृश्य, अनजान व विचित्र दुनिया को जानने की जिज्ञासा कभी खत्म नहीं हो पाती। इसीलिए हॉरर फिल्मों का दौर बार-बार जाकर फिर लौट आता है।

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