• [EDITED BY : Uday] PUBLISH DATE: ; 06 April, 2019 11:39 AM | Total Read Count 193
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दक्षिण की फिल्मी राजनीति तो गजब

मुंबइया सितारों को राजनीति में उतरने का हौंसला देने वाली दक्षिण की फिल्मी हस्तियों ने प्रचार का अभिनव तरीका भी खोज लिया है। अधिसूचना जारी होने के बाद चुनावी अखाड़े में उतरीं फिल्म हस्तियों की फिल्मों का सिनेमाघर या टीवी पर प्रदर्शन आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन माना जाता है। 2014 में तमिलनाडु व पुडुचेरी की सभी चालीस लोकसभा सीटें जीत कर प्रधानमंत्री बनने का सपना देखने वाली मुख्यमंत्री जयललिता ने इसकी काट का भी तरीका तलाश लिया। अन्नाद्रमुक के संस्थापक एमजी रामचंद्रन की राजनीतिक वारिस जयललिता व एमजीआर की साठ और सत्तर के दशक में कई तमिल फिल्में सुपरहिट हुईं।

लेकिन जयललिता ने चुनी 1965 में बनी तमिल फिल्म ‘एइरातिल ओरुवन’ (हजारों में एक) जिससे पहली बार एमजी रामचंद्रन के साथ उनकी जोड़ी बनी थीं। र्माता-निर्देशक बीआर पंतुलु की यह फिल्म एमजी रामचंद्रन के राजनीति में सक्रिय होने से पहले की सुपरहिट फिल्मों में से एक थी। जयललिता ने इस फिल्म को पूरे राज्य में रिलीज कराया। चेन्नई के देवी थिएटर में फिल्म के पहले शो की शुरुआत जुलूस की शक्ल में नारे तगाती भीड़ के सिनेमाघर तक पहुंचने से हुई। वहां पूजा हुई, मिठाई बांटी गई और तब कहीं जाकर शो शुरू हुआ। फिल्म का पहला दिन शानदार रहा। लेकिन जल्दी ही लोगों का बुखार गया। मदरै को धर्मनगरी कहा जाता है लेकिन वही ऐसा केंद्र है जो किसी फिल्म के हिट या फ्लाप होने की नब्ज बताता है। वहां दो दिन तक तो दर्शकों की भीड़ रही।

तीसरे दिन हालत यह हो गई कि सिर्फ तीन लोगों के आने की वजह से वहां के एक सिनेमाघर का शो रद्द कर दिया गया। सौंवी फिल्म ‘कैप्टन प्रभाकरन’ (1991) के बाद से कैप्टन के नाम से पुकारे जाने वाले विजय राज अलगर स्वामी उर्फ विजय कांत ने 2005 में उस समय देसिया मुरपोक्कू द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमडीके) नाम की पार्टी बनाई जब दो सौ से ज्यादा फिल्मों में काम करने के बाद अभिनय से उनका मन उकता गया और राजनीति का चस्का लग गया। पार्टी एक तरह से उनका पारिवारिक संगठन ही है जिसे वे खुद, उनकी पत्नी प्रेमलता व प्रेम लता का भाई सुधीश संचालित करते हैं।

2009 में तमिलनाडु से डीएमडीके ने सभी 39 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा मगर एक में भी जीत नहीं पाई। 2011 के विधानसभा चुनाव में जयललिता के साथ मिल कर पार्टी ने खासा धमाका कर दिया। 41 सीटों पर चुनाव लड़ा और आठ प्रतिशत वोटों के साथ 29 सीटें जीत कर द्रमुक को तीसरे स्थान पर धकेल दिया। अब विजय कांत भाजपा के साथ हैं। चौदह सीटों पर डीएमडीके चुनाव लड़ेगी। विजय कांत का पूरा चुनाव प्रचार फिल्मी संवादों पर आधारित होता है। फिल्म ‘कैप्टन प्रभाकरन’ से उन्होंने अपने ईमानदार होने की ऐसी छवि बनाई जो आज तक नहीं धुली है। उसके संवाद विजय कांत आज भी उसी अंदाज में बोलते हैं।

‘नरसिम्हा’ में पाकिस्तान की जेल में जब उन्हें बिजली का झटका दिया जाता है तो वे कहते हैं- ‘मुझ पर नहीं बिजली पर मेरा झटका लग जाएगा।’ संवाद खत्म होते ही बिजली गुल हो जाती है। विजय कांत एक दिन में बीस सभाओं में अपनी फिल्मों के संवाद के जरिए तालियां पिटवा रहे हैं। राजनीति में फिल्मी तड़का आंध्र प्रदेश मे भी लगा हुआ है। राज्य के विभाजन ने उसे और तेज कर दिया है।

तेलुगू फिल्मों के कभी सुपरस्टार माने जाने वाले चिरंजीवी ने लोकसभा व विधानसभा चुनाव में प्रजाराज्यम पार्टी बना कर फिल्मी लोकप्रियता भुनाने की कोशिश की। सफलता नहीं मिली तो कांग्रेस का दामन थाम लिया और केंद्र में मंत्री भी बन गए। अब उनके भाई के पवन कल्याण ने जन सेना पार्टी बना कर और भाजपा से तालमेल कर सीमांध्र से कांग्रेस का सफाया करने का संकल्प ले लिया है। मुकाबला अब दो भाइयों में होगा। पवन कल्याण खुद चुनाव नहीं लड़ेंगे पर अपने फिल्मी अंदाज में प्रचार करेंगे।

फिल्मी सितारों के राजनीति में धमकने की पहल दक्षिण में हुई और उसका वहां की राजनीति पर गहरा प्रभाव भी पड़ा। तमिलनाडु में तो पिछले चार दशक से शासन की बागडोर फिल्में से जुड़े लोगों के ही हाथ में रही है। आजादी के बाद कांग्रेस की एकाधिकारवाद की प्रवृत्ति के विरोध में अझागिरि स्वामी ने जस्टिस पार्टी बनाई जिससे प्रभावित होकर तब के मशहूर पटकथा और संवाद लेखक एम करुणानिधि राजनीति में आए। कथित रूप से हिंदी थोपे जाने के विरोध और तमिल अस्मिता की सुरक्षा के लिए बने राजनीतिक दल द्रविड़ मुनेत्र कझगम (द्रमुक) को अप्रत्याशित रूप से व्यापक जनसमर्थन मिला और इससे तमिलनाडु की राजनीति का चेहरा ही बदल गया।

एमजी रामचंद्रन ने इसमें नया आयाम जोड़ दिया। नंदमुरि तारक रामराव यानी एनटीआर पौराणिक पात्रों की भूमिका करने की वजह से आंध्र प्रदेश के घर-घर में पूजे गए और लोगों के मन में अपने लिए गहरी जम गई इसी आस्था की बदौलत तेलुगू देशम पार्टी (तेपेदा) के नेता के रूप में 1983 से 1994 के बीच तीन बार मुख्यमंत्री रहे। तेलुगू सिनेमा के स्टार चिरंजीवी ने तेदेपा की जगह लेने के लिए 2008 में ‘प्रजा राज्यम पार्टी’ बनाई लेकिन अगले साल हुए विधानसभा चुनाव में 18 सीटें ही मिलने की वजह से उन्हें अपनी क्षमता व लोकप्रियता का आभास हो गया और 2011 में अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर उन्होंने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को विराम दे दिया।

करुणानिधि, एमजी रामचंद्रन व एनटी रामराव के सत्ता की दहलीज लांघ जाने का ही यह असर है कि उनके बाद राजनीति में उतरे लोग भी अपना थोड़ा बहुत खंभा गाड़ने में सफल हो गए। इसका सबसे बड़ा कारण रहे, सितारों के फैंस क्लब। मुंबइया सितारों के मंदिर बना कर उनकी पूजा करने का चलन कभी नहीं पनपा। दक्षिण में हर सितारों के फैंस क्लब हैं, जिनके सदस्यों की संख्या हजारों लाखों में हैं। ये प्रशंसक सितारों की फिल्म देखने से पहले बाकायदा उनके चित्र की पूजा करते हैं। फिर नंगे पैर जुलूस की शक्ल में सिनेमाघर जाकर अपने प्रिय सितारे के कटआउट पर फूल माला चढ़ाते हैं।

बड़े सितारों की बात तो दूर रही, छोटे कलाकारों तक के दक्षिण में मंदिर बने हुए हैं जहां रोज पूजा अर्चना होती है। कुछ सितारों की महिमा में आरती भी होती है। ममता कुलकर्णी कभी फिल्मों में काम करती थीं, यह कम ही लोगों का पता होगा, हिंदी फिल्में करने से पहले उन्होंने दक्षिण में कुछ फिल्में क्या कर लीं कि उनका भी मंदिर बन गया। इसी अंधभक्ति ने दक्षिण में सितारों को राजनीति में शिखर तक पहुंचा दिया। राजनीति और फिल्म के इस विलय ने एक अरसे से दक्षिण भारत में रंग जरूर जमा रखा है।

हिंदी फिल्मों में सफल नहीं हो पाईं रामय्या पिछले साल हुए उपचुनाव में कांग्रेस के टिकट पर कर्नाटक के मांड्या से चुनाव लड़ी और आसानी से जीत भी गई तो सिर्फ अपने प्रशंसकों की वजह से। हिंदी में ‘ईश्वर’, ‘तेजस्विनी’ जैसी कुछ फिल्में करने वाली और दक्षिण में मर्दाना रोल करने के लिए ज्यादा विख्यात विजया शांति ने 2009 में आंध्र प्रदेश के मेढ़क से चुनाव जीता। आंध्र प्रदेश के विभाजन की प्रबल समर्थक रहीं विजया शांति कांग्रेस में जाने के बाद से राजनीति में कमजोर पड़ गई हैं।

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