• [EDITED BY : Uday] PUBLISH DATE: ; 06 April, 2019 11:36 AM | Total Read Count 242
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सितारों की राजनीतिः मसाला फिल्मों जैसी!

श्रीशचंद्र मिश्र  सलमान खान के साथ अपनी फिल्म ‘बागी’ के हिट होने के बाद दिल्ली आई नगमा ने अनौपचारिक बातचीत में कहा था कि उन्हें राजनीति में कोई रुचि नहीं है और राजनीतिक चर्चा उनके सिर में दर्द कर देती है। हिंदी फिल्मों में गाड़ी नहीं चल पाई तो दक्षिण व भोजपुरी की फिल्में कर नगमा ने करिअर को लंबा खींचने की कोशिश की। नतीजा सामान्य से बेहतर नहीं हो पाया तो थक हार कर राजनीति में छलांग लगा ली। 2009 के आम चुनाव में भी वे टिकट की दावेदार थीं पर कांग्रेस ने उनके फिल्मी ग्लैमर का इस्तेमाल कर चुनाव प्रचार में ही उन्हें झोंके रखा। 2014 में नगमा को चुनावी मैदान में उतार दिया गया। वे मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश) से टिकट चाहती थीं।

उन्हें लगता था कि एक समय रही भोजपुरी फिल्मों की सुपर स्टार वाली इमेज उन्हें चुनाव जीतने में मददगार साबित होगी। लेकिन कांग्रेस ने मुरादाबाद सीट क्रिकेटर मोहम्मद कैफ की झोली में डाल कर नगमा को मेरठ थमा दिया। नई जगह, नए लोग और उस पर अपनी फिल्मी पहचान को चमकाना उनके लिए आसान नहीं रहा। और वे चुनाव हार गईं। पूर्व अभिनेत्री ही सही, उनसे जुड़े फिल्मी ग्लैमर का नगमा को यह फायदा तो मिला ही है कि सड़कों, गलियों में उनके आने की आहट पा कर ही लोगों का हुजूम उन्हें देखने उमड़ पड़ा। बाहरी होने का फिर भी उन्हें विरोध झेलना पड़।’ आजम खान के विरोध के बावजूद समाजवादी पार्टी के टिकट पर रामपुर से 2004 व 2009 में लोकसभा का चुनाव जीतीं जयाप्रदा ने 2014 में  कांग्रेस का दामन थाम कर मुरादाबाद से चुनाव लड़ना चाहती थीं।

इससे पहले उन्होंने चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी में भी अपने लिए संभावना तलाशी थी। चंद्रबाबू के ससुर एनटीआर ही जयाप्रदा को राजनीति में लाए थे। कहीं दाल नहीं गली। कांग्रेस समाजवादी पार्टी को नाराज नहीं करना चाहती थी। लिहाजा उसने जयाप्रदा व उनके राजनीतिक संरक्षक अमर सिंह को अपने सहयोगी राष्ट्रीय लोकदल में ठौर दिला दिया। ‘रामपुर की कली’ के नाम से मशहूर जयाप्रदा लेकिन बिजनौर की रानी नहीं बन पाईं। इस बार वे रामपुर से भाजपा की उम्मीदवार हैं। चुनावी सभाओं में भारतीय जनता पार्टी का प्रचार करते हुए सालों फिल्म ‘शोले’ के बसंती वाले संवाद सुना कर भीड़ का मनोरंजन करने वाली डीर्म गर्ल हेमा मालिनी को इस सेवा का प्रतिफल राज्यसभा की सदस्यता के रूप में तो मिल गया। पर उनकी महत्वाकांक्षा लोकसभा में पहुंचने की थी।

दिल्ली में भाजपा को ठीकठाक उम्मीदवार खोजे नहीं मिल रहा था तो पार्टी ने हेमा मालिनी पर निगाह टिकाई। हेमा ज्यादा उत्सुक नहीं दिखीं तो उनकी मनपसंद मथुरा सीट उनके हवाले कर दी गई। बकौल उनके उन्होंने मथुरा में कितना काम किया, यह उन्हें याद नहीं है। बहरहाल उसी ‘काम’ के सहारे वे फिर मैदान में हैं। मुंबई में बारह रुपए में एक व्यक्ति को भोजन उपलब्ध होने की बात कह कर विवादों में घिर गए राजबब्बर आगरा से फतेहपुर सीकरी होते हुए 2014 में गाजियाबाद सीट पर पहुंच गए। पिछले पंद्रह साल के राजनीतिक सफर में उन्होंने अपनी राजनीति निष्ठा जरूर बदल ली है। दो बार समाजवादी पार्टी के टिकट पर आगरा से सांसद रहे राज बब्बर के लिए कांग्रेस में जाकर 2009 का चुनाव फतेहपुर सीकरी से लड़ना भारी पड़ गया। यह खुशकिस्मती रही कि फिरोजाबाद सीट पर उपचुनाव हुआ और राज बब्बर अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल को हरा कर फिर लोकसभा पहुंच गए।

2014 में वे गाजियाबाद से हार गए। अब फतेहपुर सीकरी से उम्मीदवार हैं। राज बब्बर की ही तरह लंबी चुनावी पारी खेलने वालों में शाटगन के नाम से फिल्मों में मशहूर रहे शत्रुघ्न सिन्हा भी हैं। दो बार वे राज्यसभा के सदस्य रहे और 1999 में जब भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी तो वे स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्री रहे। शत्रुघ्न सिन्हा के बड़बोलेपन को ‘खामोश’ नहीं कर पाने की वजह से भाजपा की कई बार किरकिरी हो चुकी है। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने के विरोधियों में शत्रुघ्न सिन्हा सबसे ज्यादा मुखर थे। इसके बावजूद बिहार के पटना साहिब से उन्हें 2014 में फिर टिकट दे दिया गया अब वे कांग्रेस में हैं।

खलनायक से नायक बन कर शत्रुघ्न सिन्हा की ही तरह मिसाल कायम करने वाले विनोद खन्ना ने भी राजनीतिक पारी की शुरुआत भारतीय जनता पार्टी के आंगन से ही की। 1997 में वे भाजपा से जुड़े और तीन बार गुरदारसपुर (पंजाब) से सांसद रहे। वे एनडीए सरकार में संस्कृति व पर्यटन और विदेश मंत्रालय में राज्य मंत्री का पद संभाल चुके हैं। 2009 के आम चुनाव में उनकी हार ने उनके राजनीतिक भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया। विनोद खन्ना ने लो प्रोफाइल में रह कर किसी भी तरह के राजनीतिक वाद-विवाद में उलझने से खुद को बचाए रखा और राजनीति मे कुछ पाने की लालसा न रख फिल्मों में ही ठिकाना तलाशने पर जोर दिया। बहरहाल भाजपा ने 2014 में गुरदासपुर से फिर उन्हीं पर दांव चलने का फैसला किया और यह सही साबित भी हुआ। क्षेत्रीय राजनीति में जमे फिल्मी आधिपत्य का राष्ट्रीय राजनीति पर असर तभी दिखा जब मुंबइया कलाकार मैदान में उतरे। 1967 में फिल्मी बिरादरी का एक ही सदस्य लोकसभा में पहुंच सका था।

1971 और 1977 में फिल्मी प्रतिनिधित्व शून्य रहने के बाद 1980 में अभिनेत्री वैजयंतीमाला ने इस जड़ता को तोड़ा। वे दिल्ली और तमिलनाडु से दो बार चुनाव जीतीं। इसे व्यापक विस्तार मिला 1984 में जब सुनील दत्त और अमिताभ बच्चन चुनाव जीत गए। तब लोकसभा में पांच फिल्मी लोग पहुंचे थे लेकिन इनमें से राजनीति को गंभीरता से सुनीलदत्त ने ही लिया। गांधी परिवार के करीब रहे अमिताभ बच्चन 1984 में इलाहाबाद से सांसद चुने गए थे और वह भी हेमवती नंदन बहुगुणा जैसे दिग्गज को हरा कर। पर इसमें उनकी खुद की राजनीतिक महत्वकांक्षा कम, अपने पारिवारिक मित्र राजीव गांधी की मदद करने की मंशा ज्यादा थी। वैसे भी उन दिनों अमिताभ का करिअर ढीला चल रहा था। ऐसे में थोड़ी बहुत राजनीतिक व्यस्तता वे झेल सकते थे। हालांकि उसके बाद बोफर्स मामले को लेकर जो छींटाकशी हुई उससे राजनीति से उनका मोहभंग हो गया। और इंदिरा गांधी परिवार से उनकी दूरियां भी बढ़ गईं।

बाद में मुलायम सिंह यादव से ब रास्ते अमर सिंह उनकी नजदीकी बढ़ी। सपा के लिए उन्होंने चुनाव प्रचार भी किया लेकिन खुद राजनीति में नहीं उतरे। हां, उनकी पत्नी जया भादुड़ी जरूर सपा के समर्थन में राज्यसभा पहुंची। हालांकि तब तक उनका अभिनय से नाता विशेष आग्रह पर या लिहाज में कुछेक फिल्में कर लेने तक ही सीमित रह गया था। राजनीति में सबसे लंबी पारी सुनीलदत्त ने खेली। मुंबई से अमृतसर के स्वर्ण मंदिर तक पदयात्रा कर उन्होंने राजनीति की शुरुआत की। मुंबई उत्तर पश्चिम के अपने निर्वाचन क्षेत्र से वे कभी नहीं हारे। 1984 से 2004 तक वे पांच बार सांसद रहे। वे राजनीति में किसी स्वार्थ या पद लालसा में नहीं कूदे थे। एक आदर्श जनप्रतिनिधि को अपने क्षेत्र के लोगों की आकांक्षाओं और तकलीफों के प्रति कितना संवेदनशील होना चाहिए, इसकी मिसाल थे सुनील दत्त। यह सच है कि पहली बार सांसद बनते समय अभिनय से उनका वास्ता टूट चुका था। और निर्माता-निर्देशक के रूप में भी वे पहले जितना सक्रिय नहीं रह पाए थे।

इसके बावजूद उनकी एक हैसियत थी, सम्मान था। लेकिन उन्होंने कभी मंत्री पद नहीं चाहा। राज्य की राजनीति में टांग नहीं अड़ाई। आखिरी दिनों में उन्हें खेल व युवा मामलों का सामान्य सा विभाग देकर केंद्र में मंत्री बनाया गया। उस दायित्व को भी उन्होंने पूरी निष्ठा से निभाया। उनकी जगह उनकी बेटी प्रियादत्त सांसद बनीं। सुपर स्टार की परिभाषा गढ़ी गई राजेश खन्ना के लिए। उनका जलवा जब फिल्मों में कम होने लगा तो उन्होंने राजनीति का दामन थाम लिया। नई दिल्ली से लोकसभा का चुनाव लड़ा। 1991 में वे भाजपा के दिग्गज नेता लाल कृष्ण आडवाणी से सिर्फ 1589 वोट से हारे। 1992 के उपचुनाव में उन्होंने शत्रुघ्न सिन्हा को मात दी। 1996 में वे हार गए। लेकिन राजनीतिक पारी में फिल्मों जैसा करिश्मा वे नहीं दिखा पाए। न तो कोई स्क्रिप्ट लिखने वाला था और न निर्देशन देने वाला।

फिल्मी लटकों झटकों को तो लोग पहले ही नकार चुके थे। लिहाजा राजनीति में उन्हें कौन पूछता? राजनीति में गोते खाने की कोशिश समय-समय पर कुछ और सितारों ने भी की है। शेखर सुमन 2009 में कांग्रेस के टिकट पर पटना साहिब से शत्रुघ्न सिन्हा के मुकाबले उतरे लेकिन तीसरे स्थान पर रहे। ‘जुनून’ व ‘मेजर साब’ में अभिनय करने वाली नफीसा अली समाजवादी पार्टी के टिकट पर लखनऊ से चुनाव मैदान में उतरीं लेकिन जीत नहीं पाईं। 2014 में लगभग सभी पार्टियों ने फिल्मी सितारों पर दांव खेला है। राज बब्बर, शत्रुघ्न सिन्हा और जयाप्रदा जैसे अनुभवी सांसदों के साथ नवोदित नगमा तो मैदान में उतरी हीं, तृणमूल कांग्रेस ने मुनमुन सेन को सांसद बनाने की ठान ली। मुनमुन सेन बांकुरा (पश्चिम बंगाल) से और विश्वजीत नई दिल्ली से तृणमूल उम्मीदवार बने। भोजपुरी फिल्मों के विस्तार और बढ़ते असर का ही यह नतीजा था कि कांग्रेस और भाजपा दोनों ने उन फिल्मों के एक-एक सुपर स्टार को दबोच लिया है।

2009 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर गोरखपुर से चुनाव लड़े मनोज तिवारी तीसरे स्थान पर रहे। फिर वे भाजपा में आ गए और उत्तर पूर्वी दिल्ली से उन्होंने चुनाव लड़ा। कांग्रेस ने मनोज तिवारी के कड़े प्रतिद्वंदी रहे रवि किशन को उत्तर प्रदेश से जौनपुर का टिकट थमा दिया। 2012 के विधानसभा चुनाव में मोदी के लिए प्रचार करने वाले परेश रावल को अमदाबाद से भाजपा ने खड़ा कर दिया। अमरावती (महाराष्ट्र) से कांग्रेस ने नवनीत कौर राणा को उम्मीदवार बना कर सभी को चौंका दिया है। पंजाबी परिवार में जन्मी और मुंबई में पली बढ़ी 27 साल की नवनीत 2004 से दक्षिण की फिल्मों में काम कर रही थी। खास बात यह है कि वे बाबा रामदेव को अपने पिता जैसा मानती हैं और बाबा के निर्देश पर ही उन्होंने 2011 में हुए सामूहिक विवाह समारोह में करीब तीन हजार जोड़ों के साथ विधायक रवि राणा से शादी की।

कांग्रेस ने ओडिशा की भुवनेश्वर सीट से बिजय मोहंती को और अपराजिता मोहंती को कटक सीट से उम्मीदवार बनाया। बिजय नहीं मानते कि उन्होंने डूबते जहाज से नाता जोड़ कर कोई गलती की थी। उनका कहना है कि वे हार से नहीं डरते। भाजपा ने ओडिशा में पिंटू नंदा, श्रीतम दास व पिंकी प्रधान जैसे सितारों का सहारा पकड़ा है तो वहीं सत्तारूढ़ बीजू जनता दल ने मिहिल दास, सात्यकी मिश्रा के साथ गायिका तृप्ति दास को भी पार्टी में शामिल कर लिया। ओडिशा में फिल्मी सितारों के चुनाव लड़ने की शुरुआत सत्तर के दशक में सरत पुजारी ने उत्कल कांग्रेस के टिकट पर की थी।

सरत और उनके बाद संगीतकार व गायक अक्षय मोहंती, प्रफुल्लकर व धीर विस्वाल की हार ने जो उत्साह ठंडा किया, वह फिर रंग दिखाने लगा है। राज्य के पूर्व मंत्री पंचानन कानूनगो का कहना है- ‘हम नेता तो घटिया नौटंकी में व्यस्त रहने की वजह से आम लोगों की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पाए। अभिनेता शायद मानते हैं कि वे हमसे बेहतर नौटंकी कर सकते हैं।’ सबसे दिलचस्प मुकाबला चंडीगढ़ में हुआ। मिस इंडिया रह चुकी गुल पनाग ने आम आदमी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा तो उनके मुकाबले भाजपा ने चरित्र अत्रिनेत्री किरण खेर को मैदान में उतार दिया। बाजी किरण के हाथ रही। 

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