• [EDITED BY : Uday] PUBLISH DATE: ; 16 March, 2019 04:53 PM | Total Read Count 199
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कुलाचें भरता मेहनताना

पिछले कुछ सालों में सितारों की पौ बारह हो गई है। करोड़ों में उन्हें तोला जाने लगा है। कमाई के कई रास्ते उनके लिए खुल गए हैं। सिर्फ यह भरोसा जमने की देर है कि किसी सितारे पर एक रुपया  लगाने से पांच रुपए मिल जाएंगे, बस उसके वारे न्यारे हो जाते हैं। कुछ सितारे अपना भाव खुद तय करने लगे हैं। टी सीरिज की एक फिल्म के लिए अक्षय कुमार ने 56 करोड़ रुपए मांग लिए। जॉली ‘एलएलबी’ के सीक्वल के लिए 42 दिन की शूटिंग के लिए उन्होंने 42 करोड़ रुपए लिए यानी एक दिन के एक करोड़ रुपए। पीछे कोई नहीं है। ‘रोबोट’ में रजनीकांत ने जहां 35 करोड़ रुपए कथित रूप से पाए थे, वहीं फिल्म की हीरोइन ऐश्वर्य राय को छह करोड़ रुपए मिले थे। तब एक फिल्म के लिए किसी हीरोइन को मिलने वाली यह सबसे ज्यादा रकम थी। बाद में इसे करीना कपूर ने तोड़ा।

मधुर भंडारकर की फिल्म ‘हीरोइन’ के लिए उन्हें सात करोड़ रुपए दिए बताए गए। ‘कंगना’ के ग्यारह करोड़ रुपए मांगने में अनूठा कुछ नहीं है। लगातार सफलता के बाद अगर उन्होंने अपने काम का वाजिब या मनचाहा दाम मांगा तो इसमें गलत क्या है? जिस तरह का डंका कुछ समय उनका बजा उसी तरह की स्थिति में कुछ साल पहले विद्या बालन थीं। लगातार कई महिला प्रधान फिल्मों की सफलता ने उन्हें ढेरों पुरस्कार दिलाए। ‘द डर्टी पिक्चर्स’ के बाद उन्होंने अपना मेहनताना आठ करोड़ रुपए कर दिया। फिल्मी सितारे कितना मेहनताना लेते हैं, यह अधिकृत रूप से कोई नहीं बता सकता। इसे लेकर अक्सर सिर्फ कयास ही लगाए जाते हैं। फिल्म इंडस्ट्री में यह प्रचलित धारणा रही है सितारे आयकर बचाने के लिए मेहनताने का बड़ा हिस्सा काले धन के रूप में लेते हैं।

जाहिर है इसका खुलासा नहीं हो सकता। पिछले कुछ सालों से कुछ बड़े स्टार आय कर का एडवांस भुगतान कर रहे हैं, इससे तस्वीर थोड़ी बहुत साफ होने लगी है। बहरहाल, सितारों को अगर छप्पर फाड़ पैसा मिलता है तो यह स्वाभाविक ही है। कुछेक अपवादों को छोड़ दिया जाए तो स्टार ही ज्यादातर फिल्मों की सफलता का मुख्य आधार रहे हैं। सितारों का मेहनताना इसी हिसाब से बढ़ता घटता है। फिल्म की सफलता से लोकप्रियता मिलती है और यह लोकप्रियता स्टार वैल्यू बनाती है। एक बार धाक जम जाए तो पौ बारह। हालांकि जब हैसियत घट जाती है तो कोई कौड़ी के भाव नहीं पूछता। मूक युग में सुलोचना उर्फ रूबी मायर्स को एक फिल्म का पांच हजार रुपया मिलता था।

हिंदी न बोल पाने की वजह से फिल्मों को आवाज मिलने के बाद वे तालमेल नहीं बैठा सकीं तो दैनिक भत्ते पर उन्हें एक्स्ट्रा की तरह काम करना पड़ा। भगवान दादा का जब जलवा था तो एक फिल्म के लिए उन्हें मुंह मांगी रकम मिल जाती थी। दिन बिगड़े तो रोज के दो-दो सौ रुपए पर उन्हें काम करना पड़ा। सितारों की लोकप्रियता को भुनाने की निर्माताओं में मचने वाली होड़ भी अक्सर सितारों को माला माल कर देती है। साठ के दशक में राजेंद्र कुमार से जब पूछा गया कि उन्होंने ‘सूरज’ जैसी राजसी फिल्म करना क्यों स्वीकार किया तो उनका सीधा सा जवाब था- ‘मैं क्या करता। निर्माता आया। उसे टरकाने के लिए मैंने ज्यादा मेहनताना बोल दिया।

उसने तत्काल सूटकेस मेरे सामने खोल कर रख दिया। जितना मैंने मांगा था उससे ज्यादा रकम उसमें थी।’ ‘राम और श्याम’ में काम करने के बदले दिलीप कुमार को दस लाख दिए गए। यह पचास साल पहले की बात है। ‘आराधना’ से सुपर स्टार बने राजेश खन्ना ने एक फिल्म के लिए बारह लाख रुपए लेकर दिलीप कुमार का रिकार्ड तोड़ा। यह वाकया भी काफी दिलचस्प है। सड़क पर बंदरों का तमाशा दिखाने वाले सैंडो एमएमए चिनप्पा देवर धीरे-धीरे सर्कस मालिक के रूप में स्थापित हो गए। जानवरों पर केंद्रित  ‘हाथी मेरे साथी’ में काम करने के लिए उन्होंने राजेश खन्ना से संपर्क किया। राजेश खन्ना ने कोई रूचि नहीं दिखाई। देवर ने दाम बढ़ाना शुरू कर दिया।

प्रस्ताव जब बारह लाख रुपए तक पहुंच गया तो राजेश खन्ना को हां करना पड़ा। देखते ही देखते बारह लाख का मेहनताना कब एक करोड़ और फिर एक करोड़ से ज्यादा बढ़ गया। आज तो स्थिति यह हो गई है कि सिर्फ आइटम नंबर करने के लिए स्टार हीरोइन को करोड़ों तक मिल जाते हैं।  सितारों की कमाई का अंदाजा इसलिए नहीं हो पाता क्योंकि अरसे तक लगभग सभी बड़े स्टार एक विशेष फार्मूले को अपनाए रहे। सत्तर के दशक में इस फार्मूले का चलन शुरू हुआ। इसमें सितारे नाम मात्र का मेहनताना लेते थे लेकिन एक वितरण क्षेत्र का अधिकार अपने नाम करा लेते थे। फिल्मों का बाजार सात-आठ वितरण केंद्रों में सिमटा है।

सत्तर के दशक में बड़ी फिल्म के लिए एक वितरण क्षेत्र का अधिकार बीस से तीस लाख रुपए में बिक जाता था। इसे आगे बेच कर बिना पूंजी लगाए हीरो के हिस्से में एक तरह से यह रकम आ जाती थी। उस पर मुनाफा अलग से। फिल्म के आकार के हिसाब से अब हर वितरण क्षेत्र सात से दस करोड़ रुपए के बीच बैठता है। आज के खान, दत्त, देवगन या रोशन कुछ साल पहले तक इसी से संतुष्ट हो जाते थे। अब उनकी इच्छाएं बढ़ गई हैं। किसी फिल्म का एक क्षेत्र के लिए वितरण अधिकार पाकर उसे कायदे से रिलीज करवाने की माथा पच्ची में कोई उलझना नहीं चाहता। लिहाजा सभी बड़े हीरो या तो अपने स्तर पर फिल्म बना रहे हैं या फिल्म में कुछ टका हिस्सेदारी पा रहे हैं।

फिल्म अगर हिट हो जाए तो यह हिस्सेदारी की रकम 40 से 50 करोड़ रुपए तक बैठ जाती है। भारतीय सितारों की संपत्ति में उछाल सिर्फ अभिनय या फिल्म बनाने से नहीं आया है। कमाई के उन्होंने कई रास्ते तलाश लिए हैं जिनमें इवेंट में हिस्सा लेना, एनडोर्समेंट करना और टीवी शो होस्ट करना शामिल है। सितारे टीवी से काफी पैसा उलीच रहे हैं। ‘बिग बॉस-9’ के एक एपिसोड के लिए सलमान खान को सुना है दस करोड़ रुपए मिल रहे हैं। अमिताभ बच्चन की गाड़ी तो फिल्मों से कम, विज्ञापनबाजी व टीवी शो से ज्यादा चल रही है। अपना चेहरा और लोकप्रियता बेच कर पैसा कमाने के मामले में अपने सितारों का कोई सानी नहीं है।

ऐसे खपती है बेहताशा कमाईः बीतें जमाने के कुछ सितारों की आखिरी समय में हुई दुर्दशा से सबक लेकर आज के सितारे अपनी कमाई का एक हिस्सा अन्य क्षेत्रों में निवेश कर भविष्य सुरक्षित रखने पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। इसी के साथ आलीशान जीवन जीने में भी कोताही नहीं बरत रहे। जिन दिनों रणवीर कपूर व कैटरीना कैफ का रोमांस उफान पर था, रणवीर ने बांद्रा के कार्टर रोड में एक सी फेस पैंट हाउस किराए पर लिया। इसमें दो टैरेस थे। इस पेंट हाउस को उन्होंने विदेशों से खरीदे गए कीमती साजो सामान से सजाया।

पैंट हाउस का मासिक किराया था पंद्रह लाख रुपए। रोमांस की आग ठंडी पड़ी तो रणवीर ने वह फ्लैट छोड़ दिया और 35 करोड़ रुपए में नया फ्लैट खरीद लिया। महंगे से महंगे फ्लैट खरीदना अब सितारों का शगल बनता जा रहा है। इसे कमाई का सबसे सुरक्षित निवेश भी माना जा रहा है। अमिताभ बच्चन के मुंबई में दो बंगले हैं। इसके बावजूद अभिषेक बच्चन ने वरली के एक प्रोजेक्ट में आलीशान अपार्टमेंट बुक कराया जिसकी कीमत है 41 करोड़ 14 लाख रुपए। शाहिद कपूर ने जुलाई 2014 में जुहू तारा रोड पर बीस करोड़ रुपए में अपार्टमेंट खरीदा था। इसमें बगीचा भी है। इसी बिल्डिंग में विद्या बालन का भी फ्लैट है।

2014 में ही इमरान हाशमी ने 15 करोड़ रुपए में पाली हिल्स में फ्लैट खरीदा था। सैफ अली खान व करीना कपूर ने तीन साल पहले खार (पश्चिम) में साढ़े तेइस करोड़ रुपए में फ्लैट लिया था। एक समय था जब बंगले में रहना फिल्मी सितारे प्रतिष्ठा का सवाल मानते थे। आज भी कई सितारे फ्लैट की बजाए बंगले में रहना पसंद करते हैं। शाहरुख खान का विशालकाय बंगला तो टूरिस्ट स्पाट बना हुआ है। आमिर खान ने 2015 में पाली हिल की हाउसिंग सोसायटी को तोड़ कर नए सिरे से फ्लैट बनाने का प्रस्ताव दिया था। उनका इरादा सोसायटी के कुछ हिस्से पर अपना बंगला बनाने का था। लेकिन एक मां-बेटी के अड़ जाने की वजह से उन्हें अपना प्रस्ताव वापस लेना पड़ा।

रियल एस्टेट में निवेश सितारों को ज्यादा फायदेमंद लग रहा है। आवासीय या व्यावसायिक प्रोजेक्ट में वे पैसा लगा रहे हैं। आलीशान पेंटहाउस या फ्लैट खरीद रहे हैं। राकेश रोशन की तरह कुछ तो आवासीय प्रोजेक्ट अपने हाथ में ले रहे हैं। राकेश रोशन और ऋतिक रोशन के पिछले साल अंधेरी लिंक रोड पर 70 करोड़ रुपए में तीन हजार वर्ग मीटर का प्लाट लिया। इस पर वे स्थानीय डेवलपर के साथ मिलकर 26 मंजिला आवासीय टावर बनाएंगे। पिता के निधन के बाद प्रियंका चोपड़ा को पता चला कि उन्होंने उनका भविष्य पूरी तरह सुरक्षित कर दिया है। पिता प्रियंका का सारा हिसाब-किताब देखते थे। शुरू से ही उन्होंने रियल एस्टेट में पैसा लगाना शुरू कर दिया था।

उसी का नतीजा है कि आज प्रियंका के पास कई फ्लैट हैं। जॉन अब्राहम का तो मानना है कि शेयर बाजार में पैसा लगाने की बजाए रियल एस्टेट में निवेश करना ज्यादा सुरक्षित है। बांद्रा व खार में दो इमारतों के मालिक हैं जॉन। 2009 में उन्होंने 22 करोड़ रुपए में एक प्लाट खरीदा था। कुछ सितारों ने होटल व रेस्टोरेंट की श्रृंखला खोलने में भी रुचि ली है। मिठुन चक्रवर्ती ने बरसों पहले ऊटी में होटल खोल लिया था। खेलों की प्रोफेशनल लीग शुरू हो जाने के बाद तो कई सितारे फ्रेंचाइजी टीमों में हिस्सेदार बन गए हैं। 

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