• [EDITED BY : Vivek Saxena] PUBLISH DATE: ; 01 May, 2019 07:41 AM | Total Read Count 189
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डायरी आफ ए यंग गर्ल

इन दिनों दिल्ली के चर्चित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में एन फ्रैंक हाउस एम्सटर्डम व नीदरलैंड दूतावास की मदद से एक प्रदर्शनी लगी है। यह द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कुख्यात तानाशाह हिटलर के उस पर हुए अत्याचारों का जिदंगीनामा है। एन फ्रैंक पहले जर्मनी में रहती थी। यहूदी थी। जब प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी हार गया व मित्र देशों ने उसे युद्ध के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए उस पर अनेक जुर्माने लगाएं।  इससे वहां बेरोजगारी, महंगाई बढ़ने लगी और नागरिकों का जीना दूभर हो गया तो हिटलर ने इस सबके लिए यहूदियो को जिम्मेदार ठहराया। अतः एन फ्रैंक का परिवार जर्मनी छोड़कर एम्सर्टडम में रहने लगा। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उस देश पर भी हिटलर का राज हो गया।

एन फ्रैंक के पिता ओटो हेनरिका मूलतः जर्मनी के निवासी एक यहूदी व्यापारी थे जो बाद में अपने व परिवार की जान बचाने के लिए नीदरलैंड व स्विट्जरलैंड चले गए। उनकी दूसरी बेटी का नाम मारगेट फ्रैंक  व पत्नी का नाम एडिथ फ्रैंक था। उसका जन्म 12 जून 1929 में हुआ था व पूरा नाम एनीलोज मैरी फ्रैंक था। वह जब महज चार साल की थी तब उसका परिवार तानाशाह हिटलर के अत्याचारो से बचने के लिए नीदरलैंड की राजधानी एक्सटर्डम के निकट छुपकर रहने लगा। 

वह जन्म से जर्मनी की नागरिक थी पर यहूदी होने के कारण हिटलर ने उसकी नागरिकता छीन ली थी। जर्मनी ने नीदरलैंड पर अपना कब्जा कर लिया व उसका पूरा परिवार उसके जघन्य नरसंहार से बचने के लिए एक घर में छिप कर रहने लगा। उसके घर में उसके पिता की किताबों का एक बड़ा संकलन था जोकि अलमारी में रखा हुआ था। वह और उसका परिवार उस अलमारी के पीछे छुप कर रहते। वे लोग अपने घर में कैद होकर रह गए थे। क्योंकि बाहर निकलने पर हिटलर की गुप्तचर सेना गेस्टापो द्वारा उनके पकड़े जाने का खतरा था। 

उसे अपने जन्मदिन पर एक डायरी उपहार में मिली थी जिससे उसे बेहद लगाव था और वह उसे नियमित रूप से लिखती थी। वह पत्रकार बनना चाहती थी। उसने अपनी इस डायरी में हिटलर के अत्याचारों के बारे में खुल कर लिखा। आतंक के साये में जीते हुए खुद व अपने परिवार के लोगों की मनोदशा का बहुत व्यवहारिक एव सुंदर चित्रण किया। 

उसकी बड़ी बहन का नाम मारग्रेट था। वह कट्टर यहूदी नहीं थी और आसपास के समुदाय में मिल-जुल कर रहती थी। यह बात तब की है जब तक वह लापता होकर अपनी जान बचाने के लिए छिपकर नहीं रहने लगी थी। उसके पिता को पढ़ने लिखने का काफी शौक था और वे अपने बच्चो को भी ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करते थे। उन्होंने अपने घर में एक बड़ी लाइब्रेरी बनाई थी। उनकी जिदंगी में बदलाव तब आया जब एडोल्फ हिटलर 1933 में अपने देश के संघीय चुनाव जीत गया। 

एडिथ फ्रैंक अपने दोनों बच्चों के साथ अपनी मां के पास रहने चली गई। जबकि पिता ओटो फ्रैंक एम्सटर्डम में जा कर व्यापार करने लगी। उन्होंने घर किराए पर लेकर उसमें रहने के लिए अपने परिवार को भी बुला लिया। वे जिस कंपनी में काम करते थे वह फलो का रस बेचने का काम करते थे। वह 1933 से 1939 के बीच जर्मनी छोड़ने वाले उन तीन लाख यहूदियों में शामिल थे जो अपनी जिदंगी बचाने के लिए वहां से भागे थे। वहां आकर दोनों लड़कियां स्कूल में पढ़ने लगी। उसको बचपन से ही लिखने का शौक था मगर वह किसी से इस बारे में चर्चा नहीं करती थी। 

मई 1940 में जर्मनी ने नीदरलैंड पर कब्जा किया और हिटलर वहां अपना यहूदी दमन चलाने लगा। यहूदी लोगों को दूसरो से अलग-थलग करके उनका पंजीकरण किया गया। बसों पर उनको यात्रा करने पर रोक लगा दी गई। अपनी पहचान बताने के लिए उन्हें पीला बैच लगाना अनिवार्य कर दिया गया। उस परिवार ने अमेरिका भागने की कोशिश की मगर वे लोग सफल नहीं हो सके क्योंकि अमेरिकी दूतावास बंद हो गया व उनके कागजात खो गए। यहूदी बच्चे केवल यहूदी स्कूल में ही जा सकते थे।

अप्रैल 1941 में ओटो की कंपनी को जब्त करने की कोशिश की गई मगर उसने कंपनी के अपने शेयर एक जर्मन नागरिक व अपने दोस्त के नाम कर दिए। उसकी कमाई काफी कम हो गई व वह किसी तरह अपने परिवार का खर्च चला पाता था। फ्रैंक के पिता ओटो ने उसके 13वें जन्मदिन 12 जून 1942 को उसे एक डायरी भेंट में दी जोकि वास्तव में एक आटोग्राफ डायरी थी। मगर एन ने उसका इस्तेमाल डायरी की तनह करना शुरू कर दिया। उसने उसमें लिखना शुरू कर दिया। इसमें हिटलर की ज्यादतियो और यहूदी पर होने वाले अत्याचारों व उन पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों का जिक्र था। 

जब 5 जुलाई को उसकी बहन को जर्मनी की ओर से यहूदी पंजीकरण दफ्तर में पेश होने का नोटिस मिला तो पूरा परिवार वहां छिपकर रहने लगा। वे लोग अपने पिता की फैक्टरी में ही छिप गए। वहां के कुछ विश्वासपात्र मजदूरो के साथ रहते थे। मकान को इस तरह से रखा गया जैसे कि उन लागों ने उसे जल्दी में खाली किया हो। ओटो ने सबको बताया कि वह लोग स्विट्जरलैंड जा रहे हैं। वे कामगार ही उनके लिए बाहर से खाने का सामान लाते। उन्हें बाहर की खबर देते थे। अगर वे लोग पकड़े जाते तो यहूदियों की शरण देने के अपराध में उन्हें मौत की सजा मिलना तय था। 

उसने अपनी डायरी में अपने परिवार के सदस्यों के साथ अपने संबंधों का जिक्र भी किया। वह अपने पिता के काफी करीब थी और मां की आलोचक थी। कुछ दिनों बाद वहां एक परिवार ओर छिपकर रहने आ गया। यह स्थिति बहुत दिनों तक नहीं चली और 4 अगस्त 1944 की सुबह जर्मन पुलिस ने उन सब लोगों को गिरफ्तार कर लिया। ऐसा माना जाता है कि उनकी गिरफ्तारी किसी की मुखबरी के कारण हुई थी। बाद में 3 सितंबर 1944 को उन सबको आशविट़्ज के यातना कैंप में भेज दिया गया। वहां पहुंचने पर पुरुषों को महिलाओं व बच्चों से अलग कर दिया गया। जो स्वस्थ थे उन्हें काम करवाने के लिए कैंप में भेज दिया गया व बाकी को जहरीली गैस के चैंबर में भेज कर मार दिया गया। उसको भी अपने पिता के साथ काम करने के लिए भेज दिया गया। 

तब वह महज 15 साल की थी। उसको निर्वस्त्र कर उस पर दवाएं लगाई गई ताकि वह बीमार न पड़े। उस पर उसकी पहचान का नंबर खोदा गया व उसके बाल काट दिए गए। उनके शिविर में चूहे व कीड़े-मकौड़े रहते थे व भरपेट खाने को भी नहीं मिलता था। उसे टायफाइड हो गया। पहले उसकी बहन व फिर उसकी मौत हो गई। बीमारी और न फैले इसलिए उसके कैंप में आग लगा दी गई व वहां मरने वाले 17000 लोगों की लाशों को कहीं गाड़ दिया। मोरो फ्रैंक के एक दोस्त ने एन की डायरी छिपाकर रखी थी व उनके आजाद होने पर डायरी उन्हें दे दी। 

वह चाहती थी कि उसके अलावा उसकी डायरी को कोई और न पढ़े। पहले इसका जर्मन भाषा में व फिर फ्रैंच भाषा में प्रकाशन हुआ। अमेरिका में 1952 एन फ्रैंकः द डायरी आफ ए यंग गर्ल' नाम से पुस्तक प्रकाशित हुई। यह डायरी बहुत लोकप्रिय हुई व अब तक 60 भाषाओं में इसकी करोड़ो प्रतियां छप चुकी है व दर्जनों फिल्में भी बनी है। जिस घर में उसने खुद को कैद किया था। वह आज भी मौजूद है।

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