• [EDITED BY : Vivek Saxena] PUBLISH DATE: ; 10 May, 2019 07:20 AM | Total Read Count 150
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येती है या नहीं हमें क्या लेना?

हमारे देश में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में अगर उड़न तश्तरियों के बाद किसी अज्ञात चीज में लोगों की सबसे ज्यादा रूचि  है तो वे हिम मानव याकि 'येती' को ले कर हैं। हाल में यह एक बार फिर यह चर्चा में आ गए हैं। एक पर्वतीय अभियान पर नेपाल गई भारतीय सेना की टीम को 9 अप्रैल को मकालूबेसकैंपके पास येती के तमाम सारे पदचिन्ह मिलने की खबर व उसकी तस्वीरे अखबारों में छपी हुई थी। 

जहां येती में विश्वास रखने वाले लोग सोशल मीडिया व संबंधित खोजी दल को बधाईयां दे रहे हैं वहीं तमाम लोग इसका मजाक भी उड़ा रहे हैं। इस खबर के बाद हिम मानवो के अस्तितव पर फिर चर्चाएं शुरू हो गई है। लोग यह जानना चाहते हैं कि फोटो छापने के लिए भेजने के पूर्व क्या पर्वतारोहणियों ने इस बारे में किसी विशेषज्ञ की राय लेने की कोशिश की थी? हालांकि तस्वीर में सिर्फ एक ही पैर होने के कारण उसकी वास्तविकता व विश्वसनीयता पर मेरे मन में भी संदेह पैदा हो रहा है। 

कुछ लोगों ने जानना चाहा कि क्या वह एक पैर पर उछल कर चलता है? कुछ उसकी तुलना कार्टून फीचर टिनटिन से कर रहे हैं। मकालू बेस कैंप में पाई गई इस पांव के आकार की आकृति 32बाई 15 इंच की है। नेपाल की दंत कथाओं में येती का जिक्र अक्सर आता रहता है। बर्फ मानव कहे जाने वाले इस जीव को लोग बहुत विशालकाय बानर सरीखा मानते हैं। इसके लिए मेह तेह ताम का इस्तेमाल भी किया जाता है। पहली बार इसे देखे जाने का जिक्र 1832 में हुआ था और माना जाता है कि यह ज्यादा हिमालय में मिलता है। 

हालांकि भारत, रूस, चीन, नेपाल, भूटान, तिब्बत, मंगोलिया व साइबेरिया में भी इसके देखे जाने की खबरें व दावे किए जाते रहे हैं। यह माना जाता है कि बंदर से काफी बड़ा यह हिम मानव या येती खड़ा होकर पैरों पर चलता है जबकि वैज्ञानिक इसे मिथक ही मानते आए हैं।

येती शब्द भारतीय नहीं है। वह तिब्बती शब्द यामी काउपशब्द है जिसका मतलब विशालकाय भालू। इसे पहले एडोमिनेबल स्नोमैन के नाम से भी जानते हैं। उसे यह नाम 1921 में ब्रिटिश बर्फ पर्वतारोही ले. कर्नल चार्ल्स डावर्ड बरो ने दिया था। उन्होंने अपने अभियान के दौरान 21000 फुट की ऊंचाई पर कुछ काफी बड़े पद चिन्ह देखे थे। उनका अनुमान था कि ये निशान लंगड़ा कर चलते हुए भालू के होंगे। 

उनकी टीम में शामिल नेपाली लोगों ने इसे मीतोह कांगमी (मीतोह-इंसानी भालू) कागमी बर्फीला पुरुष का नाम दिया। कहा जाता है बौद्ध लोगों का पहले विश्वास था कि वे ग्लेशियर के एक भगवान की पूजा करते हैं जो कि बड़े भालू जैसा होता था व अपने हाथ में बड़ा सा पत्थर लेकर चलता था व शू शू की आवाज करता था।1832 में जेम्स ने लिखा थानकि उनके दल ने उत्तरी नेपाल के पर्वतों पर एक विशालकाय ओरंगउटान देखा था जोकि उन लोगों से डर कर भाग गया। 20वीं सदी में येती को लेकर पश्चिमी देशों की जिज्ञासा काफी बढ़ गई और उनकी खोज के लिए अभियान शुरू किए जाने लगे। पहले 1925 में एनए तोबंजी नामक रायल जियोग्राफिकल सोसायटी के फोटोग्राफर ने जेम ग्लेशियर के पास 15000 फुट की ऊंचाई पर एक बहुत बड़े आकार के मानव को करीब 200 फीट तक चलते हुए देखने का दावा किया था। वह इंसान से काफी बड़ा था व उसके शरीर पर बाल थे। 

उन्होंने कहा था कि उसके पैरो का आकार 6-7 इंच का था। जब 1950 के दशक में हिमालय पर चढ़ने के अभियान शुरू हुए तो 1951 में एटिक शिपटन ने करीब 20000 फीट की ऊंचाई पर मिले बड़े आकार के पैरो के निशानों के फोटो लिए। इन पर काफी समय तक शोध होता रहा। फिर1953 में सर एडमंड हिलेरी व तेनजिंग नोर्गे अभियान के दौरान बहुत बड़े आकार के पैरो के निशान देखे जाने की बातें कहीं।

नोर्गे ने अपनी बायोग्राफी में भी इस घटना का जिक्र किया था। वहीं 9 मार्च 1954 को डेली मेल ने एक लेख में दावा किया किएक अभियान दल पांगबीची मानेस्ट्री में रखे येति के सिर के अवशेष व बाल लेकर आया था जो काले व भूरे रंग के थे। प्रोफेसर फैडरिक वुड जोंस ने उनका अध्ययन किया। वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि यह बाल भालू या बंदर के नहीं थे। अमेरिका ने भी इस बारे में खास रूचि ली, 1957 में अमेरिकी नागरिक वैज्ञानिक टॉम स्लिक ने येती की खोज अभियान शुरू किया। बाद में अमेरिकी सरकार ने अभियान बनाया कि वह येती की खोज के लिए अभियान चलाएगा व आत्मरक्षा के लिए उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाएंगे। 

बाद में जेम्स स्टीवर्ट पांगबोची मानेस्ट्री में रखा येति का कथित हाथ चुराकर भारत आया और यहां से लंदन चला गया। बीसवीं सदी में येती काफी चर्चित था व 1966 में भूटान में येती के सम्मान में एक डाक टिकट तक जारी किया। रूस में भी दिसंबर 2011 में एक शिकारी ने येती द्वारा अपनी भेड़ो पर हमला करने के बाद उसे गोली मारने की बात कहीं थी जोकि बाद में महज किस्सा साबित हुई। येती पर दर्जनों किताबें लिखी गई व इसकी लोकप्रियता देखते हुए डिजनीवर्ल्ड ने एक्सपीडीशन एवरेस्ट व डिजनी एनीमल किंगडम के लिए एक 25 फट ऊंचा येती भी बनवाया जोकि वहां की सैर के दौरान कुछ देर के लिए दर्शकों को दिखाई पड़ता है। 

हालांकि खुद नेपाल सरकार ने पैरो को येती का पैर मानने से इंकार कर दिया है। फिर भी दुनिया भर में शगूफा तो छिड़ ही गया है। येती है या नहीं यह तो नहीं पता पर इसके होने या ना हाने से हमें क्या फायदा या नुकसान है। इसकी चर्चा कोई नहीं करता है।

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