सैम पित्रोदा ने ‘नजर’ लगा दी!


[EDITED BY : Vivek Saxena] PUBLISH DATE: ; 13 May, 2019 08:53 AM | Total Read Count 117
सैम पित्रोदा ने ‘नजर’ लगा दी!

हमारे देश में ‘नजर’ की बहुत अहमियत है। हर धर्म, जाति व वर्ग के लोग इस नजर की अहमियत को मानते हैं। जब घर में बच्चा पैदा होता है तो उसे लोगों की बुरी नजर से बचाने के लिए मां-दादी-नानी उसको काली करधनी पहनाती है। नहलाने के बाद उसके माथे पर काला टीका लगाते हैं जोकि आंखों में काजल लगाने के बाद लगाया जाता है। जब कभी रात को बच्चा लगातार रोता है तो बड़ी बुढि़या उसे नजर लगाने की बात कहते हुए नजर उतारती है। 

ट्रको के पीछे लिखा होता है कि बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला। वहीं जब कोई नया मकान बनवाता है तो उसको नजर से बचाने के लिए कुम्हार की दुकान पर मिलने वाला दैत्य सरीखी शक्ल वाला काला 'बज्जर' बट्टू खरीद कर लाते हैं। ऐसे ही हमारे जीवन के हर क्षेत्र में देखने को मिलता है। 

मेरा मानना है कि भारतीय राजनीति में भी हर दल के अंदर कुछ-न-कुछ ऐसे नजरबट्टू हैं जिन्हें जब लगता है कि अब उनकी पार्टी कुछ अच्छा करने वाली है तो उसे नजर लगने से बचाने के लिए अपने मुंह से कुछ ऐसी काली बात उगलते हैं जिससे पार्टी का किया धरा सब चौपट हो जाता है व उसकी सुंदरता पर दाग व धब्बे लग जाते हैं। मेरा मानना है कि पहले कांग्रेस में मणिशंकर अय्यर व दिग्विजय सिंह ही ऐसे नजरबट्टू होते थे जोकि अपनी बदजुबानी से सत्यानाश करके पार्टी को नुकसान पहुंचाते थे। 

जैसे मणिशंकर अय्यर ने तो कांग्रेस मुख्यालय में प्रेस कांफ्रेंस करके तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को नालायक प्रधानमंत्री कहा था। दिग्विजय सिंह आतंकवादियों का नाम लेने के पहले उनके नाम के साथ सम्मानसूचक 'जी' जैसे बिन लादेनजी लगाते थे जिसका जनता पर उल्टा असर पड़ता था और अब इस कड़ी में नया नाम सैम पित्रोदा का जुड़ गया है। जिन्हें कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का गुरू बनाया जा रहा है। वे इस परिवार के काफी करीब है व जब भी कांग्रेस की सरकार सत्ता में आई तो इन्होंने जमकर मौज की। 

सबसे पहले तो उनके नाम को जान लें। जैसे आतिशी मर्लीनी का ईसाई धर्म व विदेश से कुछ लेना-देना नहीं है वैसा ही सैम पित्रोदा के साथ हे। उनके नाम को देखकर अपने बचपन के एक सहपाठी रमचना की याद आ गई जिसको हम लोग रमचबा के नाम से बुलाते थे। मगर वे दिल्ली आकर मिस्टर आर चरन हो गए। इसी तरह मोदी की तरह ही गुजराती सैम पित्रोदा का असली नाम गंगाराम सत्यन पित्रोदा है। वे मूलतः जाति से सुनार है जोकि गुजरात में पित्रोदा कहलाते हैं। 

जैसे कि एक कांग्रेसी ने कभी मुझसे कहा था कि जैसे ही देश के उत्तरी हिंदी राज्यो में बर्तन व पीतल का सामान बनाने वाले को ढढेरा कहते हैं और वे लोग पंजाब जाने पर अपना अपभ्रंश वड्रा नाम रख लेते हैं यही सैम पित्रोदा के साथ हुआ। इसमें कोई शक नहीं कि आज हम उन्हें चाहे कुछ भी क्यों न कहे। वे इस देश में संचार के क्षेत्र में जो क्रांति हुई है  उसके जनक कहे जा सकते हैं। इस क्षेत्र में उन्होंने ही पहल की थी व इंदिरा गांधी व राजीव गांधी से अपनी निकटता का फायदा उठाते हुए हालात इतने बदल डाले कि जिस देश में टेलीफोन बहुत बड़ी चीज मानी जाती थी व राजधानी दिल्ली के यमुनापार इलाके में फोन लेने के लिए लोगों को 25 साल तक इंतजार करना पड़ता था। वहीं उन्होंने ऐसे हालात बनाने की पहल की जिससे आज रिक्शेवाला तक पान की दुकान से अपना फोन ले रहा है व उसे सरकार पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है।

सैम पित्रोदा का जन्म गुजरात में हुआ। उनके पिता गंगाराम नौकरी की तलाश में गुजरात से ओडि़सा आ गए थे व वहां उन्होंने कीले तैयार करने का अपना खानदानी धंधा किया। उनके आठ बच्चों में से एक बेटा सैम पित्रोदा भी था जोकि पढ़ने में तेज था और पढ़ाई लिखाई करने के लिए विदेश अमेरिका गया। वहां जाकर जब उसने भारत की संचार व्यवस्था व वहां के हालात में अंतर महसूस किया तो उसने अपने देश में इसमें बदलाव लाने का फैसला किया। वह पहली बार 1981 में भारत आया मगर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से नहीं मिल सका। फिर उसने अपने ससुर के एक कांग्रेसी मित्र की मदद से उनसे मिलने के लिए समय लिया और इंदिरा गांधी के घर पर पूरी केबिनेट के सामने यह बताया कि भारत में किस तरह से संचार के क्षेत्र में क्रांति लाकर उसे जनता तक पहुंचने व शक्तिशाली माध्यम बनाया जा सकता है।

वे राजीव गांधी व इंदिरा गांधी के काफी करीब हो गए। उन दोनों ने उन्हें मनचाहा करने की पूरी छूट दी। सैम पित्रोदा ने सीडॉट सरीखी संस्थाओं की स्थापना की। उन्होंने अमेरिका में रहते हुए 50 नए पेटेंट हासिल किए और वहां की नौकरी छोड़कर भारत आ गए। वे इस समय ओवरसीज कांग्रेस के अध्यक्ष है। एक समय उनकी गिनती देश के सबसे शक्तिशाली लोगों में की जाती थी। समय का फेर देखिए कि आज कांग्रेस पार्टी के नेता ही उनके इस बयान से नाराज है जिसमें उन्होंने 1984 सिख विरांधी दंगों के बारे में क्या कहा कि अगर ऐसा हुआ तो क्या हुआ। राहुल गांधी ने उन्हें इसके लिए माफी मांगने को कहा तो नरेंद्र मोदी ने इसे प्रचार का मुद्दा बना लिया।  अब वे कह रहे हैं कि उन्हेांने ऐसा जान बूझकर नहीं कहा था। वे तो अपनी हिंदी ज्यादा अच्छी नहीं होने के कारण ऐसा बोल गए थे। इसे कहते हैं समय का फेर।

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