आरके स्टूडियो में बनेंगे फ्लैट्स


[EDITED BY : Super Admin] PUBLISH DATE: ; 07 May, 2019 07:41 AM | Total Read Count 131
आरके स्टूडियो में बनेंगे फ्लैट्स

जब आरके फिल्म्स स्टूडियो को गोदरेज प्रापर्टीज लि. को बेचे जाने और वहां उनके द्वारा महंगे फ्लैट्स बनाए जाने की खबर पढ़ी तो अवाक रह गया। इसकी वजह यह थी कि फिल्मी दुनिया के कपूर परिवार से अपना बहुत लगाव था व उनके इतने प्रिय स्टूडियों को बिल्डर को बेचा जाना कमोबेश वैसा ही था जैसे कि यह खबर पढ़ना मानो ताजमहल में अब रेस्तरां या होटल खोला जाएगा। 

मेरा मानना है कि राजनीति में जो स्थान नेहरू परिवार का रहता आया है, कमोबेश फिल्मी दुनिया में वही स्थान पृथ्वीराज कपूर व उनके परिवार का है। वे इस क्षेत्र की जानी-मानी हस्ती हुआ करते थे। उनके बारे में ज्यादा कुछ कहना या लिखना तो मानो सूरज को दीपक दिखाना है। आजादी के अगले साल ही उनके बेटे राज कपूर ने उस समय मुंबई के लगभग जंगली स्थान माने जाने वाले चेंबूर इलाके में 2.2 एकड़ जमीन में 1946 में आरके फिल्म्स स्टूडियो की स्थापना की थी जोकि ह़ॉलीवुड के स्टूडियो जैसा था। 

इससे पहले वे अपनी फिल्मो की शूटिंग खुले में, सड़को व पार्को में करते थे। शुरू में बिजली की समस्या थी। अतः उनके स्टूडियो को रात में ही बिजली दी जाती थी व रात में ही शूटिंग हुआ करती थी। सन 2017 में अचानक वहां आग लगने से उनकी फिल्मो में इस्तेमाल हुआ तमाम ऐतिहासिक सामान जलकर नष्ट हो गया। इसमें मेरा जूता है जापानी गाने में इस्तेमाल हुआ राजकपूर का जूता व मेरा नाम जोकर में उनके द्वारा इस्तेमाल किया गया गुड्डा भी शामिल था। 

दरअसल यह स्टूडियो परिवार के लिए सफेद हाथी साबित हो रहा था। क्योंकि उसकी बुकिंग काफी कम होने लगी थी व फिल्म निर्माता गोरेगांव, अंधेरी के स्टूडियो में बुकिंग करवाना कहीं बेहतर समझते थे। लोग मुफ्त में पार्किंग की जगह व वातानुकूल भी चाहते थे। स्टूडियो के बाहर आरके फिल्म्स का लोगो लगा हुआ था जोकि राजकपूर द्वारा निर्मित फिल्मों में इस्तेमाल किया जाता था। इसमें एक पुरुष,राजकपूर एक महिला, नरगिस को बाहों में लिए हुआ है। इसे पहली बार बरसात फिल्म के पोस्टर पर छापा गया था। 

अभिनेता मनोज कुमार के मुताबिक यह लोगो शिव सेना के संस्थारपक बाल ठाकरे ने तैयार किया था जोकि जाने-माने कार्टूनिस्ट थे। इस स्टूडिया के मुख्य भवन का निर्माण 1950 में किया गया था इसके पीछे राजकपूर का कमरा था जहां वे अक्सर पारिवारिक समारोह व होली मिलन आयोजन किया करते थे। वहीं पर स्टूडियो ने अपना 25वां स्थापना दिवस मनाया था। वहां एक अजायबघर भी था जिसमें अभिनेत्री नरगिस द्वारा इस्तेमाल किए गए कपड़ें रखे थे जोकि 2017 की आग में जलकर नष्ट हो गए। 

यहां जानी-मानी फिल्मों जैसे बरसात, आवारा, आग, मेरा नाम जोकर, बॉबी आदि के पोस्टर भी रखे हुए थे। बॉबी के गाने हम तुम एक कमरे मं बंद हो के कमरे के अंदर के दृश्यों की शूटिंग यहीं हुई थी जबकि बाहरी शूटिंग कश्मीर में की गई थी। प्यार हुआ इकरार हुआ में इस्तेमाल किया गया काला छाता, अवारा में नरगिस द्वारा पहनी गई लंबी पोशाक, वैजयंती माला द्वारा संग्राम में पहनी गई साड़ी, बॉबी फिल्म मेंडिंपल कपाडि़या द्वारा पहनी गई फ्राक सब यहीं रखे थे जोकि जलकर बर्बाद हो गए। 

इसे बेचने का फैसला राजकपूर के पूरे परिवार ने किया। इनमें उनकी पत्नी श्रीमती कृष्णा राजकपूर, बेटे रणधीर, ऋषि, राजीव बेटिया रीतू नंदा, रीमा जैन शामिल थे। इसकी कीमत करीब 500 करोड रुपए बताई जाती हैं।

इस स्टूडियो में बनाई गई राजकपूर की फिल्म आग को वह शोहरत नहीं मिली जिसकी उन्हें अपेक्षा थी। हालांकि बाद में बनाई गई फिल्मो बरसात व आवारा काफी सफल रही। स्टूडियो का लोगो उनकी फिल्म बरसात के एक दृश्य से लिया गया था। जिसमें राजकपूर ने नरगिस को अपनी बाहों में लिया हुआ था व उनके हाथ में वायलिन था। राजकपूर अपने यहां आयोजित होने वाले समारोहों में कभी मीडिया के लोगों को नहीं बुलाते थे। हालांकि जब ऋषि कपूर की शादी हुई तो नीतू सिंह से होने वाली शादी का समारोह 18 दिनों तक यहीं मनाया गया था जिसमें बालीवुड की तमाम हस्तियां शामिल हुई थी। 

यहां मनाए जाने वाली होली व गणेशोत्सव काफी चर्चित हुई थे और इन उत्सवों में नरगिस, शत्रुध्न सिन्हा, अमिताभ बच्चन आदि आया करते थे। जैसे अमेरिका में हॉलीवुड में फिल्मो के ही स्टूडिया व लोगों के घर बसाए गए हैं वैसा हमारे बॉलीवुड में नहीं है। यहां मुंबई के तमाम स्टूडियो व अभिनेताओं-अभिनेत्रियों के दूर-दूर घर है। 

गोदरेज कंपनी के मालिक फिरोजशाह गोदरेज का कहना है कि हम इस जगह की परंपरा को बनाए रखेंगे। वहीं रणधीर कपूर का कहना है कि हम लोग इसे संभाल कर रख सकने में असमर्थ थे व यह जगह अब सही हाथों में है। किसी ने कहा है कि एक पीढ़ी निर्माण करती है दूसरी उसे बनाए रखती है व तीसरी उसको निपटा देती है। यहां तो सबकुछ दूसरी व तीसरी पीढ़ी मिल कर हीकर रही है। 

फिर लगता है कि हम लोग भला इससे कहां अलग है। हमारे बाबा, पिता आदि ने अपने शहरो में जो हमारे लिए संपत्ति छोड़ी थी हम में से कितनो ने उसे संभालकर रखा और सबने उसे अंततः बेचकर दिल्ली में अपना आशियाना बना लिया। फिर भी पता नहीं क्यों इस स्टूडियो के बेचे जाने का मुझे दिलो दुख है। हालांकि मैंने कभी खुद उसे नहीं देखा था। शायद यह हमारी परंपरा का ही असर है।

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