भारत की राजनीति में सब जायज!


[EDITED BY : Vivek Saxena] PUBLISH DATE: ; 30 April, 2019 07:24 AM | Total Read Count 121
भारत की राजनीति में सब जायज!

पुरानी कहावत है कि प्यार और युद्ध में सब जायज होता है। पिछले कुछ समय से राजनीति में जो कुछ देख रहा हूं उससे लगता है कि इस कहावत में एक शब्द राजनीति भी जोड़ दिया जाना चाहिए। भारतीय राजनीति में जिस तरह से इस बार के आम चुनावों में दशको से घोर विरोधी रहे नेता साथ आए है उसे देखकर यही लगता है कि राजनीति में भी सब जायज है। 

सबसे बड़ा उदाहरण उत्तर प्रदेश का है। जहां दशको से कट्टर दुश्मन रहे बहुजन समाज पार्टी व समाजवादी पार्टी ने साथ आकर लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन बना लिया और कभी लखनऊ के गेस्ट हाउस कांड में समाजवादी पार्टी नेताओं पर अपनी हत्या का आरोप लगाती आई बसपा सुप्रीमो मायावती सपा नेता मुलायम सिंह यादव के मंच से उनके हक में चुनाव प्रचार करते हुए उन्हें वोट देने की मांग कर रही है। 

दोनों ही दलो का आकलन है कि उनका गठजोड़ राजनीति में सीटो की दृष्टि से सबसे अहम उत्तर प्रदेश की ज्यादातर सीटे जीतने में कामयाब होगा। इसे दोनों दलों की राजनीतिक मजबूरी व लोकसभा व विधानसभा के चुनावो में हुई उनकी दुर्गति भी मान सकते हैं। वे कहां तक सही थे यह तो आने वालो समय ही बताएगा। यह सिलसिला रूका नहीं है। 

जहां दशको के दुश्मन दोस्त बन रहे हैं वहीं बचपन के दोस्त एक दूसरे को निपटाने की तैयारी कर रहे हैं। यह उदाहरण उत्तर प्रदेश का है। मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव जो कभी उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होते थे व उनकी राजनीति संभालते थे वे सपा से अलग हो गए हैं। और उनका नया दल समाजवादी प्रगतिशील पार्टी लोकसभा के चुनाव लड़ रहा है। 

उन्होंने अपने सगे भतीजे व भाई रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय यादव को ही इस चुनाव में चुनौती देने का फैसला किया है। वे फिरोजाबाद लोकसभा सीट से उसके खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं। माना जा रहा है कि उनके चुनाव लड़ने से नरेंद्र मोदी को ही फायदा पहुंचेगा। क्योंकि वे यादव बाहुल्य इलाको के वोट बैंक में सेंध लगाएंगे। 

यही स्थिति बिहार में लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल में है। वहां उत्तराधिकार की लड़ाई को लेकर उनके दो बेटों तेजस्वी व तेज प्रताप यादव में चल रहा विवाद खुलकर सामने आ गया है। बड़े बेटे तेज प्रताप यादव का आरोप है कि टिकट वितरण में उन्हें एकदम अलग-थलग कर दिया गया। वे अपने परिवार से अलग रहते हैं व अपनी पत्नी के पिता को सुपौल से उम्मीदवार बनाए जाने से काफी नाराज है। पिछले दिनों तो उन्होंने सार्वजनिक रूप से आरोप तक लगाया कि उनका छोटा भाई तेजस्वी उनका फोन तक नहीं उठाता है। 

इस चुनाव के नतीजे यह तय करेंगे कि लालू यादव का असली उत्तराधिकारी कौन है व तेज प्रताप किस हद तक उन्हें नुकसान पहुंचाने में कामयाब रहते हैं। उन्होंने अपना अलग दल प्रगतिशील समाजवादी पार्टी बना लिया है व अपनी मनपसंद के उम्मीदवार खड़े कर रहे हैं। महाराष्ट्र में तो यह मामला शिव सेना के अंदर काफी पहले ही शुरू हो गया था। यहा तो लालू यादव के जीवनकाल में ही उनके परिवार के सदस्यो ने उनकी विरासत को बिखरेना शुरू कर दिया है। पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में कभी यही स्थिति केंद्र में मंत्री रही अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल व उनका मां कृष्णा पटेल के बीच पिछले लोकसभा चुनाव में ही शुरू हुई थी। देखते है कि इस बार इस परिवार में क्या होता है।

पंजाब में यही बदलाव जाने-माने अकाली नेता जगमीत सिंह बराड़ व पिछली बार सत्ता में रहे अकाली दल के बीच देखने को मिला। जगमीत बराड़ व बादल परिवार के बीच कुत्ते-बिल्ली का बैर था। इसकी वजह यह थी कि अकाली दल सरकार में मंत्री व बड़े पद पर रहे उनके पिता  को अकाली दल ने पार्टी के एक वरिष्ठ नेता द्वारा खाली की गई लोकसभा सीट से होने वाले उपचुनाव में उम्मीदवार बनाने से मना कर दिया था। इससे उन्हें काफी सदमा पहुंचा व ह्रदय गति रूकने से उनकी मौत हो गई। उनकी इस मौत के लिए बराड़ बादल को दोषी मानते थे। 

जगमीत सिंह बराड़ से मेरी दोस्ती इसलिए हुई क्योंकि उन्होंने लोकसभा चुनाव जीतने पर अपने पहले भाषण में 1984 के सिख विरोधी दंगों के जिम्मेदार पार्टी नेताओं की जमकर आलोचना की थी और वे सिखों के हीरो बन गए थे। उन्होंने 1999 के लोकसभा चुनाव में सुखबीर बादल को फरीदकोट से हराया था। अगले चुनाव में बादल ने उन्हें हरा दिया। पंजाब के मुद्दे राष्ट्रीय स्तर पर उठाने के कारण पंजाब में उन्हें आवाज-ए-पंजाब की पदवी दी गई। उन्होंने 1992 मं प्रकाश सिंह बादल को हरा कर पूरे पंजाब में धूम मचा दी। वे कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य रहे, पर बाद में पार्टी के साथ उनका मतभेद हो गया व 2016 में कांग्रेस ने उन्हें अपने दल से निकाल दिया। 

वे तृणमूल कांग्रेस में शामिल होकर उसके प्रदेश अध्यक्ष बने। मगर उनका एक भी उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत सका। हाल ही में जब उसने पंजाब के हित में अकाली दल में शामिल होने का ऐलान किया तो इस मौके पर मौजूद प्रकाश सिंह बादल समेत पूरे अकाली नेताओं ने उसके सम्मान में कसीदे कढ़े। हमारे देश का यह इतिहास रहा है कि हमेशा विरोधियों की जगह अपनो से ज्यादा नुकसान हुआ। रामायण में रावण की मौत की वजह सगा भाई विभीषण बना तो महाभारत में तो भाई पांडव और कौरव ही एक दूसरे के सर्वनाश के लिए उतारू हो गए। ऐसे में इस देश की राजनीति को उससे अछूता रह जाने की उम्मीद कैसे की जा सकती है।

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